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भावभीनी श्रद्धांजलि : पसंदीदा लेखक “दुष्यंत कुमार ” को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन।

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आज हमारे पसंदीदा लेखक “दुष्यंत कुमार “का जन्मदिन है और मैं उन्हें स्मरण न करूँ यह संभव नहीं। दुष्यंत कुमार जिनकी समसामयिक रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और नौजवानों से लेकर राजनेताओं के द्वारा भी समय-समय पर सुनाई जाती हैं। आज भी उनके प्रत्येक शेर पर तालियाँ गूँजती हैं। एक ऐसा विद्रोही, बेबाक़ और समय पर चोट करता लेखक बहुत जल्दी ही अलविदा कह गया लेकिन आज भी दुष्यंत कुमार अपनी रचनाओं के माध्यम से हम सबके बीच उपस्थित है। आज उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि और स्मरण🙏

दुष्यंत कुमार की 2 रचनाओं के साथ और स्केच के साथ उन्हें स्मरणंजली 🙏

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए,

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए।

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए,

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है।

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए,

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे।

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए,

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही।

कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए,

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता।

मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए,

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की।

ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए,

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले।

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।।

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए।

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी।

शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में।

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं।

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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