” एक वृक्ष मां के नाम “ अभियान के अन्तर्गत धरती पर वृक्ष लगाकर पर्यावरण को कैसे बचाना है एक कविता के माध्यम से कवि ने वृक्षों के महत्व को समझाने का प्रयास किया है।
कविता ” धरती मां का श्रृंगार “
सुनो भाई सज्जनों, मैं करूं एक जिकर । धरा में तरु कम भये , इसकी करो फिकर ।।
धरा नगिन भई ,नजर डालो अंगार । नन्हे नन्हे पौधे लगाकर, धरती मां का करो श्रृंगार।।
जिस धरा पर जन्म लिया है, उस पर हैं कुछ कर्तव्य हमारे। इस धरती को हरित करो, करके जतन करारे।।
धरती मां कुरुप भई,उसका रूप संवारो। धरनि जहाँ खाली परी, वहाँ तरु लगा डारो ।।
धुंआ और बदबू से, दूषित भई प्राणवायु। ह्रदय रोगी बढ़ रहे, घट गई हमारी आयु।।
बढ़ते प्रदूषण से अंबर नीला न रहा , ढक गए सूरज चांद सितारे । श्वसन को ऑक्सीजन घटी, जिंदगी जीते मास्क के सहारे ।।
प्रदूषण का यदि नियंत्रण नहीं , तो आगे दिन वो आएगा । प्राणवायु सब खत्म होगी , जीव श्वसन को तड़पाएगा ।।
धूल और धुंआ फैलाकर, लोग बिगाड़ रहे पर्यावरण । प्रकृति यदि रूठ गई , तो जाओगे किसकी शरण ।।
कथन पढ़ो जेसी बोस को , वनस्पति सजीव- संजीव रहने दो । मत काटो इन वृक्षन को , जियो और जीने दो ।।
वृक्षों की कटाई रोको, धरा का हरित वसन रहने दो । तरु खीचते मेघों को, वसुधा की प्यास बुझाने दो।।
ये नभचर प्राणी देखो , इनको कलरव करने दो। मत काटो इन वृक्षन को , उन्हें घोसले की जगह रहने दो।।
इन वन्य जीवो को देखो, उनको दहाड़ लगाने दो। मत उजाड़ो बनों को, उन्हें छिपने की जगह रहने दो।।
वृक्षों से पर्यावरण सुधरे ,और होगी खूब वर्षा । चहु दिश हरियाली छाए, हर मानुष दिल होगा हर्षा।।
मानव ने प्रकृति को छेड़, संतुलन बिगाड़ा भारी । इसको सुधारना है, हम सब की जिम्मेदारी।।
धरती मां का श्रृंगार करो, लगा लगाकर वृक्ष। तब ये पर्यावरण हो जाएगा, पहले जैसा स्वच्छ।।
हम दो हमारे दो, पर पेड़ लगाओ दस। तो जीवन भर लोगे, मीठे फलों का रस।।
वृक्ष लगाओ फलदार, काँटे लगाना ठीक नहीं। कश्मीर में तो है ही, अब धरती का बनाओ स्वर्ग यहीं।।
वृक्ष वूटी दे लकड़ी दे, और दे फल- फूल । जो इन्हें काट रहा, वो करे बड़ी भूल।।
ये वृक्ष वृक्ष ही नहीं, ये है धरती मां का आभूषण। ये जहाँ जहाँ भी होगे, वहाँ से भागेगा प्रदूषण।।
वन मेघो को खींच, कराये खूब वर्षा। देख धरा में पानी को, सकल जीव हर्षा।।
वृक्ष घन घर छाया दे , और दे प्राणवायु। यदि इन्हें लगाते रहे, तो बढ़ेगी तुम्हारी आयु।।
पहले कोयला काला सोना था ,अब तरु हरित सोना है ।कोयला बिन तो गुजर है , पर तरु बिन गुजर न होना है ।।
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