• देवाधिदेव महादेव शिव को, सावन (श्रावण) मास क्यों है इतना प्रिय…?
देवाधिदेव महादेव,भोले बाबा,भोले भण्डारी,कैलाशपति शिव को सावन मास प्रिय होने के पीछे अनेकानेक कारण बताए गए हैं-
समुद्र-मंथन के समय जब हलाहल विष समुद्र से निकला। उस समय सृष्टि के रक्षार्थ भगवान शिव ने विष को पी कर अपने कंठ में धारण कर लिया था। यह घटना सावन के महीने में घटित हुई थी |जिससे महादेव शिव का शरीर नीला पड़ गया था,विष के ताप को शांत करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर देवताओं ने शिव जी का जलाभिषेक किया और जड़ी बूटियों का भोग लगाया।इससे शिव जी के शरीर का ताप शांत हुआ।इसके बाद से ही भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाने लगा।इस अद्भुत घटना के कारण ही शिव को सावन का महीना अति प्रिय है,और सावन में जलाभिषेक का अद्भुत फल मिलता है।शिव का शरीर नीला पड़ने तथा हलाहाल विष को कण्ठ में रखने के कारण उनका एक नाम “नीलकंठ” भी पड़ गया।
शास्त्रों के अनुसार सावन मास से ठीक पहले देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव निभाते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव हो जाते हैं। यही कारण है कि सावन में अन्य किसी भी देवता की पूजा से शिव की पूजा का कई गुना फल प्राप्त होता है। इसलिए माना जाता है कि भगवान शिव को सावन सबसे अधिक प्रिय है।शास्त्रों और पुराणों के अनुसार भगवान शिव का सावन मास प्रिय होने का एक कारण यह भी है कि, माता सती के देह (शरीर) त्याग करने के बाद जब, आदिशक्ति ने पार्वती के रुप में जन्म लिया तो,इसी सावन के महीने में तपस्या पूर्ण कर भगवान शिव को पति रुप में पाने का वरदान प्राप्त किया। यानी भगवान शिव और पार्वती का मिलन और विवाह इसी महीने में हुआ था।इसलिए यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
सावन मास में भगवान शिव ने माता पार्वती को सर्वप्रथम रामावतार की कथा सुनाई थी, सुनने को श्रवण कहते हैं।इसी राम कथा के सुनने और सुनाने (श्रावण) की परिपाटी में इस पवित्र माह को “श्रावण” भी कहा गया है और विश्व भर के हिन्दू इस माह में सत्य नारायण की कथा और राम चरित मानस का पाठ करते हैं।
Leave a Reply