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बीकानेर-शरीर के तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते है।जानिए योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा के साथ

न्यूज रिपोर्टर मीडिया प्रभारी मनोज मूंधड़ा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़

शरीर के तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते है।जानिए योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा के साथ।

श्रीडूंगरगढ़ कस्बे की ओम योग सेवा संस्था के निदेशक योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा ने सत्यार्थ न्यूज चैनल पर 47 वां अंक प्रकाशित करते हुए ज्वर/बुखार के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया। तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं शरीर के जो शरीर की शुद्धि करने में उपयोगी साबित होते हैं।

ज्वर\बुखार (Fever)

-परिचय-असामान्य रूप से शरीर के बढ़े हुए तापमान को ज्वर या बुखार कहते हैं। सामान्य परिस्थितियों में मानव शरीर का तापमान 98.4 डिग्री फॉरिनहाइट अथवा 37.5 डिग्री सेंटीग्रेड होता है शरीर का तापमान जब 105 डिग्री फॉरिनहाइट तक पहुंच जाता है। तब उसे खतरनाक या घातक माना जाता है इस स्थिति में इसे हाइपरपाइरेक्सिया (Hyperpyrexia) के नाम से जाना जाता है 106-107 डिग्री फॉरेनहाइट तक तापमान पहुंच जाने पर अपरिहार्य रूप से मृत्यु का साया मंडराने लगता है। इस क्रमिक चढ़ाव के साथ बेचैनी, सिर दर्द, हाथ पैरों में जकड़न तथा पूरे बदन में तेज पीड़ा का आभास बढ़ता ही जाता है। आधुनिक आयुर्विज्ञान बुखार का मुख्य कारण रोगाणुओं और जीवाणुओं का आक्रमण ही मानते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा शास्त्र के अनुसार शरीर के अंदर एक साधारण एवं सामान्य परिस्थितियों से अलग हटकर जब मल इकट्ठा होकर पुराना पड़ जाता है। बाहर नहीं निकल पाता तो वह वही सड़ने लगता है उस सडन क्रिया से एक प्रकार की विषैली और गर्म खमीर उठती हैं जो रक्त को विषाक्त और गर्म बना देती है। क्रोध शरीर के रक्त के ताप को बढ़ाता है।

लक्षण

-शरीर के अंदर का तापमान अधिक हो जाने के कारण भूख बंद हो जाती है, प्यास अधिक लगती है, कमजोरी बढ़ जाती है, किसी काम को करने की शक्ति नहीं रहती है, आरंभ में ठंड और कंपकंपी सताती है, बदन में और सिर में दर्द होता है। उचित ढंग से नींद नहीं आती है, जीभ मैली हो जाती है, मिचली आती है, नाड़ी गति तेज हो जाती है, हृदय की धड़कन और सांस की गति भी अपेक्षाकृत तेज हो जाती है। श्वास, पसीना, मल और मूत्र बदबूदार हो जाते हैं। शरीर का तापमान बढ़ने से पाचन तंत्र की क्रिया अत्यंत ढीली पड़ जाती है या फिर बिल्कुल बंद हो जाती है। प्राकृतिक विज्ञान के अनुसार ज्वर के साथ चलने वाली ऊपर से देखने में भले ही कष्टदायक प्रतीत होती है वास्तविक रूप से। यह सारी अत्यंत लाभप्रद और रक्षात्मक होती है।

Example –

ज्वर में भूख बंद होने का अर्थ
होता है। जीवनी शक्ति (Vital Energy) का पूर्णत शरीर की सफाई में लगे रहने के कारण उसे भोजन के पचाने में अवकाश देना, स्पष्ट है ऐसी दशा में ज्वर के रोगी को जबरन भोजन देने का अर्थ होता है। उसे विष ही देना। इसी प्रकार बुखार में निस्तेज होकर बिस्तर पर पड़ जाने का मतलब होता है। प्रकृति का शरीर को पूर्ण आराम देने के लिए बाध्य करना वास्तव में जब शरीर की इकाइयों (Cells) में ऊर्जा का उत्पादन बंद हो जाता है तो अनावश्यक कार्यों या ऐच्छिक कार्यों के लिए ऊर्जा उपलब्ध नहीं हो पाती और शरीर स्वतः ही थक कर पड़ जाता है। कभी- कभी जाड़ा देकर कंपकंपी के साथ भी आता है, उसकी व्याख्या यह है कि जब कभी शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्रा अधिक हो जाती है तो उनके अवरोध के कारण शरीर के दूरदराज के भागों या सीमांत भागों में रक्त का प्रवाह भली-भांति नहीं हो पाता। रक्त भी विषाक्त हो जाता है। इसलिए उसकी अधिकांश मात्रा यकृत और प्लीहा की ओर मुड़ जाती है। जहां कुछ सीमा तक शुद्धिकरण की क्रिया संपादित होती है। फलत शरीर की बाहरी सतह की और रक्त का अभाव होने लगता है और रोगी को कंपकंपी महसूस होती है। अंदर दहन क्रिया चलती रहती है और कुछ समय पश्चात जब गर्म रक्त बाहर की ओर दौड़ने लगता है तब वह ए स्वाभाविक रूप से चर्म को भी गर्म कर देता है और शरीर का तापमान बढ़ने लगता है इसे ही ज्वर चढ़ना कहते हैं ज्वर में पाए जाने वाले उपरोक्त सभी प्रमुख लक्षणों का अर्थ यही होता है कि शरीर में अंदर ही अंदर सफाई और शुद्धता करने का कार्य द्रुत गति से चल रहा है। जिसमें पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, रक्त परिवहन तंत्र एवं अन्य सभी तंत्र अपने अपने ढंग से योगदान दे रहे हैं।

नोट

-जीवन में सदैव जो जिस चीज या विषय का ज्ञाता होता है उसी से राय लेनी चाहिए।

निवेदन

-ओम योग सेवा संस्था श्री डूंगरगढ़ द्वारा जनहित में जारी

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