मानव कल्याण की श्रेष्ठ पद्धति अष्टांग योग जानिए योग एक्सपर्ट ओम कालवा के साथ ।
न्यूज़ रिपोर्टर मनोज मूंधड़ा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़
श्री डूंगरगढ़। राजस्थान योग शिक्षक संघर्ष समिति के प्रदेश संरक्षक योगाचार्य ओम प्रकाश कालवा ने जानकारी देते हुए बताया। योग ऋषि महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग योग के आठ अंग इस प्रकार है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। इन आठ अंगों की सिद्धि ऋषि मुनि ही कर सकते हैं। परंतु प्रथम चार अंगों के पालना मनुष्य सरलता से कर सकता है।
1. यम (अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः) वह बातें जिनका पालन करने से व्यक्ति सुखी जीवन व्यतीत करता है, यम कहलाता है। यम के पांच भेद किए गये हैं। अहिंसा (सारे प्राणियों के हित के लिए मन वचन तथा कर्म द्वारा पवित्र मनोवृतियों से कार्य करना।) सत्य (जैसा देखा, सुना, पढ़ा एवं लिखा वैसा ही मन व वाणी में रखना) अस्तेय (दूसरों के पदार्थ को बिना पूछे न लेना वाणी से लेने के लिए न कहना व मन में भी लेने की इच्छा न रखना) ब्रह्मचर्य (मन वचन व शरीर के गुप्त इंद्रिय (जननेंद्रिय) का संयम रखना) अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना)।
2. नियम (शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमतः) आचरण संबंधित बातों के पालन को नियम कहते हैं। पातंजल योगदर्शन ने नियम के पांच भेद किए हैं। शौच (शरीर को बाहर, भीतर से शुद्ध एवं पवित्र रखना), संतोष (अपनी योग्यता से पूर्ण पुरुषार्थ करने पर प्राप्त फल में प्रसन्न रहना), तप (सुख-दुख, भूख-प्यास, सर्दी गर्मी, मान अपमान आदि द्वन्दों को शांति व धैर्य से सहन करना), स्वाध्याय (वेद उपनिषद आदि शास्त्रों का अध्ययन करना तथा प्रणव ओम गायत्री मंत्र आदि का जप करना), ईश्वर प्रणिधान (मन, वाणी व शरीर से करने वाले समस्त कर्मों एवं उनके फलों को ईश्वर के प्रति समर्पित करना)।
3. आसन (स्थिरसुखमासनम्) सुख पूर्वक स्थिर होकर बैठने की स्थिति को आसन कहते हैं। आसन ही व्यक्ति को योग प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। आसन चार या पांच प्रकार से करते हैं खड़े होकर, बैठकर, पीठ के बल, पेट के बल, संतुलन के आसन।
4. प्राणायाम (तस्मिन् सतिश्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदःप्राणायामः) सामान्य श्वास प्रक्रिया की गति में भेद करना अर्थात सांस लेने और छोड़ने की गति के अंतर को बढ़ाना प्राणायाम कहलाता है। आसन सिद्ध होने हो जाने पर श्वास पर नियंत्रण करना ही प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य होता है। श्वास – प्रश्वास की दृष्टि से प्राणायाम के तीन स्तर रेचक, पूरक, कुंभक होते हैं। रोग निवारण की दृष्टि से प्राणायाम के आठ भेद किए गये हैं। सूर्यभेदन प्राणायाम उज्जाई प्राणायाम शीतली प्राणायाम सीत्कारी प्राणायाम भस्त्रिका प्राणायाम भ्रामरी प्राणायाम मूर्छा प्राणायाम केवली प्राणायाम
5. प्रत्याहार (स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरुपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः) समस्त ज्ञानेन्द्रियों का अपने-अपने विषयों से विमुख होकर चित्त के स्वरूप के अनुसार बाह्यमुखी से अंतर्मुखी हो जाना प्रत्याहार कहलाता है।
6. धारणा (देशबन्धश्चित्तस्य धारणा) चित्त के एक स्थान पर स्थिरता पूर्वक ठहरने को धारणा कहते हैं यह समाधि की प्रथम सीढ़ी भी कही जाती है चित्त के 12 पल एक स्थान पर ठहरने को धारणा कहते हैं।
7. ध्यान (तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्) धारणा की स्थिति में चित्त के निरंतर स्थिर रहने को ध्यान कहते हैं चित्त एक स्थान पर 2 घंटे तक ठहरता है तो एक ध्यान सिद्ध हो जाता है इसे चार भागों में विभाजित किया जाता है। पदस्थ ध्यान पिडस्थ ध्यान रूपस्थ ध्यान रूपातीत ध्यान
8. समाधि (तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरुपशून्यमिव समाधिः) ईश्वर का निरंतर ध्यान करते करते चित्त जब अपने आकार का ज्ञान बुलाकर वस्तु शुन्य हुआ एक निश्चित समय तक ईश्वर में लीन हो जाता है तथा ईश्वर के समान ही दिखाई देने लगता है तो इस स्थिति को समाधि के नाम से जाना जाता है।
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