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मानवता की कब्र खोदने वाली ब्यूरोक्रेसी: ओडिशा का कंकाल बैंक प्रकरण और सरकारी संवेदनहीनता

मानवता की कब्र खोदने वाली ब्यूरोक्रेसी: ओडिशा का कंकाल बैंक प्रकरण और सरकारी संवेदनहीनता


ओडिशा के केंदुझर (केनझर) जिले के पाटना ब्लॉक के डियानाली गांव में रहने वाले 50 वर्षीय आदिवासी जितु मुंडा ने 27 अप्रैल 2026 को जो किया, वह किसी फिल्मी दृश्य से भी ज्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाला है। अपनी बड़ी बहन कालरा मुंडा (56) की मौत (26 जनवरी 2026) के बाद वह ओडिशा ग्रामीण बैंक की मल्लीपोसी शाखा में उनके खाते से लगभग 19,000-20,000 रुपये निकालने गया। बहन ने मवेशी बेचकर यह रकम जमा की थी।
जितु ने बार-बार बताया कि बहन की मौत हो चुकी है, लेकिन बैंक कर्मचारियों ने बार-बार एक ही बात दोहराई — “खाताधारक को लेकर आओ”। निरक्षर, गरीब और आदिवासी होने के कारण न तो उसे कानूनी प्रक्रिया (डेथ सर्टिफिकेट, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र आदि) की जानकारी थी, न ही कोई मदद मिली। परेशान होकर उसने कब्र खोदकर बहन का कंकाल कंधे पर लादा, तीन किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंचा और उसे बरामदे में रख दिया — “साबित करने” के लिए कि खाताधारक अब इस दुनिया में नहीं है।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की बेबसी नहीं है। यह उस व्यवस्था की क्रूर सच्चाई है जो गरीब, अशिक्षित और हाशिए पर रहने वाले नागरिकों के लिए बनी ही नहीं लगती।
ब्यूरोक्रेसी की कठोरता और मानवीय संवेदना का अभाव
भारतीय बैंकिंग प्रणाली, खासकर ग्रामीण बैंक, सरकारी योजनाओं और जन-धन खातों का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन जब सवाल गरीब की छोटी-सी रकम निकालने का आता है तो अचानक नियम-कानून, दस्तावेज और “प्रक्रिया” का पहाड़ खड़ा हो जाता है। जितु मुंडा जैसे लाखों लोग शहरों की चकाचौंध से दूर गांवों में रहते हैं। उनके पास न स्मार्टफोन है, न इंटरनेट, न वकील, न सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटने का समय और सामर्थ्य।
सरकारें करोड़ों रुपये “डिजिटल इंडिया”, “फाइनेंशियल इंक्लूजन” और “सबका साथ, सबका विकास” के नारों पर खर्च करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि एक डेथ सर्टिफिकेट या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र हासिल करना भी इन गरीबों के लिए सालों की लड़ाई बन जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता, बैंक कर्मचारियों की मशीनी रवैया और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता ने मिलकर एक निरक्षर आदिवासी को इतना मजबूर कर दिया कि उसने अपनी बहन की कब्र खोदनी पड़ी।
यह घटना मानवता को झकझोर देती है। क्या इतना छोटा अमाउंट निकालने के लिए कंकाल लेकर आना पड़ता है? क्या सरकार और बैंक इस बात से शर्मिंदा नहीं होते कि उनके “नियम” एक इंसान को इस हद तक ले जा सकते हैं? जहां अमीरों और प्रभावशाली लोगों के लिए नियम लचीले हो जाते हैं, वहीं गरीब के लिए वे लोहे की सलाखें बन जाते हैं।
प्रशासनिक कसावटों और जागरूकता की कमी पर सवाल
स्थानीय प्रशासन और बैंक प्रबंधन अब “जांच” में जुटे हैं — जैसा कि हमेशा होता है। लेकिन सवाल यह है:
क्या बैंक कर्मचारियों को संवेदनशीलता और गरीबों की मदद के लिए कोई ट्रेनिंग दी जाती है?
क्या ग्रामीण क्षेत्रों में डेथ सर्टिफिकेट, नॉमिनेशन और उत्तराधिकार की प्रक्रिया को सरल, तेज और बिना भ्रष्टाचार के बनाया गया है?
क्या पंचायत स्तर पर ऐसी मदद के लिए कोई तंत्र है, जो जितु जैसे लोगों को दफ्तरों के चक्कर से बचा सके?
जवाब ज्यादातर “नहीं” है। सरकारें बड़े-बड़े प्रोजेक्ट, हाई-टेक ऐप और फोटो-ओप्स पर फोकस करती हैं, लेकिन बुनियादी मानवीय मुद्दों — जैसे मृत्यु के बाद छोटी रकम का निपटारा — पर ध्यान नहीं देतीं। परिणाम? एक भाई को अपनी बहन की हड्डियां कंधे पर उठानी पड़ती हैं।
यह प्रकरण केवल ओडिशा का नहीं, पूरे देश की ग्रामीण वास्तविकता का आईना है। जहां गरीब की मौत भी “प्रक्रिया” का शिकार हो जाती है। जहां 20 हजार रुपये के लिए इंसान को कंकाल बनकर साबित करना पड़ता है कि वह मर चुका है।
समय आ गया है कि सरकारें और बैंक अपनी इस संवेदनहीन ब्यूरोक्रेसी पर गंभीरता से विचार करें। नियम जरूरी हैं, लेकिन वे इंसान के लिए हों, इंसान नियमों के लिए नहीं। जितु मुंडा की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि विकास के आंकड़ों के पीछे कितनी बेबसी, कितनी पीड़ा और कितनी लाचारी छिपी है।
अगर यह घटना हमें नहीं जगाती, तो हमारी “मानवता” भी उसी कब्र में दफन हो चुकी है, जिसे जितु मुंडा ने खोदा।
– एक चिंतित नागरिक

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