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250 वर्ष पुराने जगदीश स्वामी मंदिर की अमर गाथा: 1857 की क्रांति के बलिदानी रामप्रसाद दुबे की स्मृति आज भी जीवित

250 वर्ष पुराने जगदीश स्वामी मंदिर की अमर गाथा: 1857 की क्रांति के बलिदानी रामप्रसाद दुबे की स्मृति आज भी जीवित


विजयराघवगढ़ (कटनी, मध्य प्रदेश) – मध्य प्रदेश के कटनी जिले के विजयराघवगढ़ क्षेत्र में बसा नन्हवारा कला गांव न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां स्थित 250 वर्ष पुराना जगदीश स्वामी मंदिर इतिहास, आस्था और देशभक्ति का अनुपम संगम है। यह मंदिर मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े एक वीर के परिजन की स्थापना है, जिसकी गौरवशाली विरासत आज भी श्रद्धालुओं को प्रेरित करती है।
मंदिर की स्थापना: रामप्रसाद दुबे (नन्हे ठाकुर) की दूरदर्शिता
इस प्राचीन मंदिर की नींव लगभग 1770 के आसपास (लगभग 250 वर्ष पूर्व) रखी गई थी। स्थापना का श्रेय जाता है ग्राम नन्हवारा कला के निवासी रामप्रसाद दुबे को, जिन्हें नन्हे ठाकुर के नाम से भी जाना जाता था। उनके नाम पर ही इस गांव का नाम नन्हवारा कला पड़ा, जो आज भी उनकी स्मृति को जीवित रखता है।
रामप्रसाद दुबे उस समय विजयराघवगढ़ रियासत के राजा प्रयाग दास के अधीन थाना प्रभारी के महत्वपूर्ण पद पर आसीन थे। वे न केवल प्रशासनिक दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे, बल्कि देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत भी थे। 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर बगावत की। ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह (जिन्हें सरजू प्रसाद सिंह भी कहा जाता है) के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने विद्रोह में भाग लिया।


1857 की क्रांति में विजयराघवगढ़ का योगदान
विजयराघवगढ़ रियासत 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख केंद्र बनी। मात्र 17 वर्ष की उम्र में युवा राजा सरयू प्रसाद सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का बिगुल फूंका। उन्होंने अंग्रेजी तहसीलदार को मार गिराया, डाकघर पर कब्जा किया और स्थानीय क्रांतिकारियों को संगठित किया। इस विद्रोह में रामप्रसाद दुबे जैसे वफादार अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
क्रांति के दमन के बाद अंग्रेजों ने कठोर कार्रवाई की। ठाकुर सरयू प्रसाद सिंह और उनके साथियों को दंडित किया गया। रामप्रसाद दुबे को भी फांसी की सजा सुनाई गई, और वे इस बलिदान में अमर हो गए। उनकी वीरता और त्याग ने न केवल परिवार को गौरवान्वित किया, बल्कि इस मंदिर को स्वतंत्रता संग्राम की एक जीवंत स्मृति बना दिया।
मंदिर का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
मंदिर में भगवान जगन्नाथ (जगदीश स्वामी) की 250 वर्ष पुरानी सतयुगी प्रतिमा आज भी विराजमान है। यह प्रतिमा अपनी प्राचीनता, दिव्यता और आकर्षण के लिए विख्यात है। लगभग 50 वर्ष पूर्व दुबे परिवार ने मंदिर को एक ट्रस्ट के अधीन सौंप दिया और 27 एकड़ भूमि दान में दी, ताकि इसकी व्यवस्था और संरक्षण सुनिश्चित हो सके।


नन्हवारा कला कमेटी द्वारा मंदिर की देखरेख की जाती है। यहां नियमित रूप से निम्नलिखित आयोजन होते हैं:
विधिवत पूजन-अर्चन और आरती
भजन-कीर्तन और कीर्तन सभाएं
रामचरितमानस का सामूहिक पाठ
विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम
पिछले दो वर्षों से मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है, जिसमें पुरानी संरचनाओं की मरम्मत, सौंदर्यीकरण और सुविधाओं का विस्तार शामिल है। इससे मंदिर की भव्यता और आकर्षण में वृद्धि हो रही है।
विजयराघवगढ़ क्षेत्र के अन्य प्राचीन धार्मिक स्थल
यह क्षेत्र धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है। प्रमुख मंदिरों में शामिल हैं:
बंजारी माई मंदिर (विजयराघवगढ़) – लोक देवी का प्रसिद्ध केंद्र
कंकाली मंदिर (निगहरा, काटी बरछेका के निकट) – प्राचीन शक्ति पीठ
ये सभी मंदिर क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत बनाते हैं।
निष्कर्ष: आस्था और स्वतंत्रता का अनमोल संगम
जगदीश स्वामी मंदिर आज भी दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शांति और प्रेरणा का स्रोत है। यह न केवल भगवान जगन्नाथ की भक्ति का केंद्र है, बल्कि रामप्रसाद दुबे जैसे असंख्य गुमनाम वीरों के बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
जब हम इस मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो प्राचीन प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक होते हुए हमें याद आता है कि आस्था और देशभक्ति का यह संगम कितना शक्तिशाली होता है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा वही है, जो बलिदान और सेवा से जुड़ी हो।

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