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100 बिस्तरीय अस्पताल वाड्रफनगर की भोजन निविदा पर गंभीर प्रशासनिक आपत्तियाँ, संभावित हित-साधन की आशंका गहराई

100 बिस्तरीय अस्पताल वाड्रफनगर की भोजन निविदा पर गंभीर प्रशासनिक आपत्तियाँ, संभावित हित-साधन की आशंका गहराई

बलरामपुर/वाड्राफनगर 24 जनवरी 2026/ 100 बिस्तरीय शासकीय अस्पताल वाड्रफनगर में भर्ती सामान्य मरीजों एवं गर्भवती प्रसूताओं हेतु भोजन व्यवस्था के लिए खंड चिकित्सा अधिकारी वाड्रफनगर डॉ. हेमंत दीक्षित द्वारा आमंत्रित की गई निविदा प्रक्रिया गंभीर प्रशासनिक आपत्तियों के दायरे में आ गई है। निविदा शर्तों, वित्तीय नियमों तथा सुशासन के सिद्धांतों से विचलन के आरोपों के कारण प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं उद्देश्यपरकता पर गहन संदेह उत्पन्न हुआ है।
निविदा नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि तीन अथवा उससे अधिक पात्र निविदाकारों की उपलब्धता की स्थिति में निविदा खोली जाना अनिवार्य है। इसके विपरीत, इस प्रकरण में तीन से अधिक पात्र निविदाकार उपलब्ध होने के उपरांत भी निविदा न खोलते हुए उसे एकपक्षीय रूप से निरस्त कर दिया गया। बिना पर्याप्त कारणों का समुचित अभिलेखीकरण किए लिया गया यह निर्णय प्रशासनिक विवेक के दुरुपयोग की श्रेणी में आता प्रतीत होता है।
निविदा के दौरान शपथपत्र संबंधी तकनीकी आधारों का चयनात्मक उपयोग कर प्रक्रिया को निष्प्रभावी किया गया। जहाँ एक ओर विधि-सम्मत नोटरीकृत शपथपत्र प्रस्तुत किए गए, वहीं दूसरी ओर बिना नोटरी के दस्तावेजों को भी समान स्तर पर रखकर नोटरीकृत शपथपत्रों को भी अपात्र ठहराया गया। जबकि निविदा शर्तों में “शपथपत्र” शब्द का स्पष्ट उल्लेख है और विधिक दृष्टि से बिना नोटरी किया गया दस्तावेज घोषणापत्र मात्र होता है। यह स्थिति नियमों की मनमानी व्याख्या को दर्शाती है।
विशेष रूप से यह तथ्य अत्यंत गंभीर है कि पात्र निविदाकारों की उपलब्धता के बावजूद निविदा निरस्त कर दी गई। इससे यह प्रबल आशंका उत्पन्न हो रही है कि यह निर्णय किसी विशिष्ट अथवा चहेते निविदाकार को भविष्य में लाभ पहुँचाने हेतु परिस्थितियाँ अनुकूल बनाने के उद्देश्य से लिया गया हो सकता है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा है कि जब अपेक्षित पक्ष तकनीकी कारणों से पात्र नहीं रह पाया, तब पूरी निविदा प्रक्रिया को ही समाप्त कर पुनः जारी करने का मार्ग अपनाया गया।
निविदा को निरस्त कर पुनः नई निविदा जारी करना अनावश्यक प्रशासनिक एवं वित्तीय व्यय को जन्म देता है, जिसका प्रत्यक्ष भार शासन के राजस्व पर पड़ता है। यह स्थिति वित्तीय अनुशासन, सार्वजनिक धन के विवेकपूर्ण उपयोग तथा पारदर्शी शासन व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल प्रतीत होती है।
उपरोक्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए निविदाकारों एवं जागरूक नागरिकों द्वारा यह मांग तीव्र हो गई है कि संपूर्ण निविदा प्रक्रिया की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र एवं समयबद्ध जांच कराई जाए तथा यह निर्धारित किया जाए कि निविदा निरस्तीकरण का निर्णय नियमसम्मत प्रशासनिक आवश्यकता था अथवा किसी विशेष हित के संरक्षण हेतु लिया गया। साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि उत्तरदायित्व निर्धारित कर दोषी अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में शासकीय निविदा प्रक्रियाओं में इस प्रकार की स्थिति की पुनरावृत्ति न हो।
इस सम्बन्ध में CMHO डॉ विजय कुमार सिंह से कॉल कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई किन्तु उनके द्वारा कॉल रिसीव नहीं की गई इस वजह से CMHO सर का पक्ष नहीं लिया जा सका l
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