बच्चियों पर लगातार हो रहे यौन अपराध पूरे समाज को आत्मावलोकन की आवश्यकता -नेहा सूर्यवंशी

रायसेन के गोहरगंज में हुई 6 साल की बच्ची के साथ घटी घटना ने पूरे समाज को एक तरह से झक झोर कर रख दिया है ।
यह पुरुष प्रधान मानसिकता का एक उदाहरण है. रेप सेक्सुअल क्राइम से कहीं ज्यादा है. यह कुछ लोगों के लिए शक्ति प्रदर्शन करने जैसा है. जब पीड़िता को अधीन दिखाने, उसे सबक सिखाने या फिर उस पर आधिपत्य जताने की कोशिश की जाती है तब इस तरह के अपराध होने के चांसेस ज्यादा हैं. रेप जैसे अपराध केवल सेक्स और वासना की वजह से नहीं होते हैं. ये दुर्भाग्य है कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में औरतों पर काबू करने का, उसे नीचा दिखाने का, उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने का क्योंकि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, रेप एक आसान माध्यम बन गया है.
रेप की घटनाओं को रोकने के लिए क्या बदलने की जरूरत है?
कहीं ना कहीं मानसिकता बन गई कि घर की इज्जत औरतों से जुड़ी होती है. और किसी से बदला लेना है तो उनके घरों की औरतों से खिलवाड़ कर सकते हैं. कानून को सख्त करना सिर्फ एक रास्ता हो सकता है. हमें कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है. परिवार, स्कूल, समाज और कानून इन चारों का बराबरी तौर से प्रभावी होना जरूरी है. किसी भी स्तर पर अगर कोताही बरती जाएगी तो कहीं ना कहीं इस तरह के अपराधों पर लगाम लगना मुश्किल हो जाएगा.
अगर हम रेप के मामलों पर बहुत कड़ी सजा प्रणाली को लागू करते हैं. मामले प्राथमिकता के साथ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुने जाते हैं और अपराधी को 6 महिने में सजा देते हैं तो कहीं ना कहीं ये डर जरूर बैठेगा कि अगर आप ऐसा कोई घृणित काम करते हैं तो उसकी आपको जरूर सजा मिलेगी. आप लड़की से शादी करके उसे खत्म करते हैं, उसके परिवार को खत्म करते हैं और जितने भी ऐसे अपराध हैं, वहां पर हम ये साबित कर दें कि सजा मिलती है. तो इससे एक बहुत सख्त संदेश जाएगा.
रेप जैसा कुर्कम कलुषित मानसिकता का प्रमाण है. हमें उस मानसिकता को बदलना होगा. नैतिक शिक्षा को बढ़वा देना होगा. माता-पिता को शिक्षित करने जरूरत है. हम स्कूल में बच्चों क्या शिक्षा दे रहे हैं? घर का माहौल कैसा है? इन सब चीजों पर भी ध्यान देने की जरूरत है. और सबसे जरूरी ये है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है कि तो उसके पूरे परिवार का समाज से बहिष्कार होना चाहिए ताकि मां-बाप को भी ये डर होगा की उनके बेटे की गलती के कारण से समाज में असम्मान होगा तो शायद वो अपने बच्चों को सही रास्ता दिखाएं.
माता-पिता को अपने बच्चों को ऐसी घटनाओं से बचाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है?
लड़कियां चाहे कितनी भी वैल मीनिंग क्यों ना हों अभी तक हमारा फोकस उनको सावधान करने पर ही है. बाहर मत जाओ, बात मत करो, कैसे कपड़े पहनो ? ऐसे काम करो ? सारे किंतु-परंतु अभी तक हमने लड़कियों के लिए ही बनाते आए हैं. हमने कभी लड़कों पर इस बात दायित्व ही नहीं डाला की क्राइम जो है वो आपके कारण से हो रहा है ना कि सामने वाले के कारण से हो रहा है. ऐसा करके लड़कों को हम उत्तरादित्व ही हटा देते हैं कि उनकी कोई गलती है
माता-पिता के लिए लड़के-लड़कियां दोनों समान होने चाहिए. जब बेटे को ये लगेगा कि अगर मैंने कुछ गलत किया तो मेरे मां-बाप साथ नहीं देंगे. तो हमें एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. पेरेंट्स को इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा कि वो किसी शिक्षा के साथ अपने बच्चों को बड़ा कर रहे हैं. ऐसे मामलों में जो अपराधी हैं उनके घरों में लड़की बहुत दबी हुई रहती हैं, और जहां पर ये लोग अपने से अलग लड़कियां देखते हैं तो उन्हें संभवतः पाता ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है? और कुंठा हो, कलुषित मानसिकता हो या जो भी हो… सबक सिखाने के उदेश्य वो ये काम करते हैं.
माता-पिता उनको ये इंश्योर करें कि डर है तो दोनों में है, अगर फ्रीडम दी गई है तो दोनों को है तो काफी हद तक हम ये क्राइम होने से रोक सकते हैं.
नेहा सूर्यवंशी
समाजसेवी एवं लेखिका


















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