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जालोर के लेटा गांव में आज भी चलता है चरखा, ठंड़ियों में गर्म रहता है सूत से बना खेस

हर्षल रावल
सिरोही/राज.

जालोर के लेटा गांव में आज भी चलता है चरखा, ठंड़ियों में गर्म रहता है सूत से बना खेस


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जालौर। जालोर जिले के लेटा गांव का खेस देशभर में प्रसिद्ध है। ऐसा ही एक गांव है जालोर के लेटा गांव। जालोर शहर से यह गांव 12 किमी दूर पर है। खेस पतले कंबल के प्रकार का कपड़ा होता है, जो चरखे पर काते सूत अथवा पाली मिल के मोटे धागे से बनता है। इस कपड़े की खासियत यह है कि यह सर्दियों में गर्म रहता है। इससे बने जैकेट नेताओं को खास पसंद आते हैं। लेटा में अभी भी कुछ परिवार हाथ से चरखा चलाकर सूत तैयार करते हैं।
आज से 50 वर्ष पूर्व यहां प्रत्येक घर में चरखा चलता था। घर-घर में सूत तैयार किया जाता था। उससे हथकरघा की 200 इकाइयां चल रही थीं, जिन पर खेस तैयार किया जाता था। समय के साथ चरखा और हथकरघा का स्थान तैयार कपड़े और वस्त्र मिलों ने ले लिया। लेटा गांव में आज भी दो परिवार ऐसे हैं जो चरखा चलाते हैं और हथकरघा पर खेस तैयार करते हैं।

100% प्रतिशत शुद्ध कपास से होता है तैयार:-
यह जालोर का विशेष हस्तशिल्प उद्योग है। खेस एक प्रकार का पतला कंबल है। जिसे हाथ से बनाया जाता है। इसमें किसी भी प्रकार का केमिकल अथवा मशीनरी का उपयोग नहीं किया जाता। स्थानीय भाषा में इसे खेस या खेसला कहते हैं। यह सालों साल चलता है। मुख्य बात यह है कि यह 100% शुद्ध कपास से तैयार होता है। यह कपड़ा सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। इसका उपयोग प्रत्येक मौसम में किया जा सकता है। इसके लिए पहले गांव में ही चरखे से सूत प्राप्त हो जाता था। लेकिन चरखे अब ना के बराबर हो चुके हैं। ऐसे में इसके लिए धागा पाली की प्रसिद्ध महाराजा श्री उम्मेद मिल से मंगवाया जाता है। पक्के रंग के धागों की रील हथकरघे में फिट की जाती है। तारों को बुना जाता है। डिजाइन सेट किया जाता है और घंटों हथकरघे पर बैठकर कई दिन में एक खेस तैयार होता है। इसमें किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग नहीं करते। हाथों से ही सारी प्रक्रिया होती है।

1500 से धागे एक साथ लगाए जाते हैं:-
बुनाई मशीन में 1500 धागे एक साथ लगाए जाते हैं। कारीगर कई घंटों के परिश्रम से खेस तैयार करता है। एक जोड़ी खेस की कीमत 500 रुपए तक होती है। इन्हें अब ऑनलाइन भी खरीदा जाने लगा है। यह खेल 8 फीट लंबा और साढ़े 4 फीट चौड़ा होता है। यह कार्य वंशानुगत करते आ रहे हैं। लेकिन अब पढ़ाई और दूसरे रोजगार करने लगे हैं। यहां कई लोग मोबाइल के जरिए बिजनेस करना सीख गये है। इसलिए वह लोग ऑनलाइन ऑर्डर ले लेते है। 40 वर्ष पहले तक लेटा गांव में हथकरघे की 200 इकाइयां थीं, जिन पर खेस तैयार होता था। अब केवल दो रह गई हैं।

विधायक व सांसद पहनते हैं खेस से बनी जैकेट:-
विधायक व सांसद को खेस से बने कपड़े खासतौर पर जैकेट मुख्य पसंद है। लेटा गांव के हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान किए जाने के वक्त शॉल ओढ़ाने के स्थान खेस का उपयोग करने के निर्देश भी दे रखे हैं।
वे स्वयं खेस के जैकेट पहनते हैं। जालोर लोकसभा चुनाव के दौरान भीनमाल में प्रधानमंत्री मोदी प्रचार के लिए तो जोगेश्वर गर्ग ने खेस से बना जैकेट भेंट किया था। प्रदेश के नए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भी उन्होंने खेस से बनी जैकेट भेंट की है।

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