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अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस: भारत में बाघों की स्थिति, संरक्षण के प्रयास और चुनौतियां

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस: भारत में बाघों की स्थिति, संरक्षण के प्रयास और चुनौतियां

लेखक: हरिशंकर पाराशर

हर साल 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस (International Tiger Day) के रूप में मनाया जाता है, जो न केवल बाघों के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है, बल्कि उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर देता है। भारत, जो विश्व की लगभग 75% जंगली बाघ आबादी का घर है, बाघ संरक्षण के क्षेत्र में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरा है। यह लेख भारत में बाघों की वर्तमान स्थिति, उनकी संख्या, सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए जा रहे संरक्षण प्रयासों, और इन प्रयासों के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर गहराई से प्रकाश डालता है। साथ ही, यह बाघों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका और भविष्य की रणनीतियों पर भी विचार करता है।

### भारत में बाघों की स्थिति और उनकी संख्या
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) द्वारा 2022 में प्रकाशित नवीनतम बाघ गणना के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 3,167 (2018) से बढ़कर औसतन 3,682 हो गई है, जो वैश्विक बाघ आबादी का लगभग 75% है। यह वृद्धि पिछले चार वर्षों में 6.1% की वार्षिक दर से दर्ज की गई है, जो भारत के संरक्षण प्रयासों की सफलता को रेखांकित करती है। बाघों की यह आबादी देश के 54 टाइगर रिजर्व और विभिन्न राज्यों में फैली हुई है।

#### प्रमुख राज्यों में बाघों की स्थिति:
1. *मध्य प्रदेश*: मध्य प्रदेश ने “टाइगर स्टेट” का दर्जा बरकरार रखा है, जहां 2022 में 785 बाघ दर्ज किए गए, जो 2018 के 526 की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व इस सफलता के प्रमुख केंद्र हैं।
2. *कर्नाटक*: 563 बाघों के साथ कर्नाटक दूसरे स्थान पर है। बांदीपुर, नागरहोल, और दांडेली-अंजलि टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में स्थिर वृद्धि देखी गई है।
3. *उत्तराखंड*: उत्तराखंड में 560 बाघ हैं, जिनमें कॉर्बेट टाइगर रिजर्व अकेले 260 बाघों का घर है, जो इसे देश का सबसे घना बाघ आवास बनाता है।
4. *महाराष्ट्र*: 444 बाघों के साथ यह चौथे स्थान पर है। ताडोबा-अंधारी और मेलघाट टाइगर रिजर्व इसकी सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
5. *अन्य राज्य*: तमिलनाडु (306), असम (227), केरल (213), और उत्तर प्रदेश (205) में भी बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। हालांकि, मिजोरम, नागालैंड, झारखंड, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बाघों की आबादी में कमी चिंता का विषय है।

हालांकि, कुछ क्षेत्रों जैसे पश्चिमी घाट के वायनाड, बिलीगिरिरंगा पहाड़ियों, और भद्रा वन्यजीव अभयारण्य में बाघों की संख्या में कमी देखी गई है। यह कमी मुख्य रूप से आवास विनाश, खनन गतिविधियों, और मानव-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते दबाव के कारण है।

### बाघ संरक्षण के लिए भारत सरकार के प्रयास
भारत सरकार ने बाघों के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम उठाए हैं, जिन्होंने बाघों की आबादी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें से कुछ प्रमुख प्रयास निम्नलिखित हैं:

1. *प्रोजेक्ट टाइगर*: 1973 में शुरू किया गया प्रोजेक्ट टाइगर भारत का सबसे महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक संरक्षण कार्यक्रम है। यह वर्तमान में 54 टाइगर रिजर्व को कवर करता है, जो 75,796 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जो देश के 2.3% भू-भाग का प्रतिनिधित्व करता है। इस परियोजना ने 1960 के दशक में 268 बाघों की संख्या को 2022 में 3,682 तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

2. *राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA)*: NTCA ने बाघों की निगरानी और संरक्षण के लिए उन्नत तकनीकों को अपनाया है, जैसे कैमरा ट्रैपिंग, रेडियोटेलीमेट्री, और जीआईएस मैपिंग। 2022 की गणना में 47,081,881 तस्वीरें और 32,588 स्थानों पर कैमरा ट्रैप का उपयोग किया गया, जिसने बाघों की सटीक गणना में मदद की।

3. *अंतरराष्ट्रीय सहयोग*: भारत ने बाघों के सीमा पार संरक्षण के लिए बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, और कंबोडिया के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं। हाल ही में स्थापित इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) बाघों सहित बड़ी बिल्लियों के संरक्षण के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान करता है।

4. *आर्थिक और सामुदायिक प्रोत्साहन*: बाघों के आवासों के आसपास रहने वाले स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करने के लिए कई पहल की गई हैं। इनमें इको-टूरिज्म से होने वाली आय का हिस्सा समुदायों को देना, मानव-वन्यजीव संघर्ष में नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा, और वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान करना शामिल है। उदाहरण के लिए, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में स्थानीय लोगों को गाइड और संरक्षण कर्मचारी के रूप में प्रशिक्षित किया गया है।

5. *नए संरक्षित क्षेत्रों का निर्माण*: सरकार ने बाघों के लिए नए आवासों को विकसित करने के लिए गुरु घासीदास-तमोर पिंगला (छत्तीसगढ़) और रानीपुर (उत्तर प्रदेश) जैसे नए टाइगर रिजर्व स्थापित किए हैं।

### संरक्षण प्रयासों के समक्ष चुनौतियां और दुरुपयोग
हालांकि भारत ने बाघ संरक्षण में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी कई चुनौतियां और दुरुपयोग इस प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं:

1. *अवैध शिकार और तस्करी*: अवैध शिकार और बाघों के अंगों की तस्करी एक गंभीर खतरा बनी हुई है। 2022 में मध्य प्रदेश में 10 बाघों का शिकार दर्ज किया गया, और 2020-2022 के बीच 72 बाघों और 43 तेंदुओं की मृत्यु विभिन्न कारणों से हुई। सरिस्का टाइगर रिजर्व में 2005 में बाघों का स्थानीय स्तर पर विलुप्त होना इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

2. *मानव-वन्यजीव संघर्ष*: बाघों की बढ़ती आबादी और सिकुड़ते वन क्षेत्रों के कारण मानव-बाघ संघर्ष में वृद्धि हुई है। हर साल औसतन 35 लोग बाघों के हमलों में मारे जाते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों में असंतोष बढ़ता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के तराई क्षेत्र और महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।

3. *आवास विनाश और खंडीकरण*: खनन, सड़क निर्माण, और औद्योगिक गतिविधियों के कारण बाघों के आवासों का खंडीकरण हो रहा है। यह बाघों की आबादी के बीच आनुवंशिक विविधता को प्रभावित कर रहा है। पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बाघों की आबादी संतृप्त हो चुकी है, जिससे नए आवासों की आवश्यकता बढ़ रही है।

4. *अपर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण*: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में केंद्र सरकार से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और अवैध शिकार को रोकने के लिए अधिक संसाधनों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की मांग की है। कई टाइगर रिजर्व में वन रक्षकों की कमी और अपर्याप्त उपकरण संरक्षण प्रयासों को कमजोर कर रहे हैं।

5. *आंकड़ों की पारदर्शिता और वैज्ञानिक सहभागिता*: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की गणना के आंकड़ों को वैज्ञानिक समुदाय और स्वतंत्र शोधकर्ताओं के साथ अधिक पारदर्शी तरीके से साझा करने की आवश्यकता है। इससे संरक्षण नीतियों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

6. *पर्यटन का दुरुपयोग*: कुछ टाइगर रिजर्व में अनियंत्रित पर्यटन के कारण बाघों के प्राकृतिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, रणथंभौर और बांधवगढ़ में अत्यधिक पर्यटक वाहनों की मौजूदगी से बाघों के तनाव में वृद्धि देखी गई है।

### भविष्य की दिशा और समाधान
बाघ संरक्षण को और सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देना आवश्यक है:

1. *आवास गलियारों का विकास*: बाघों की आबादी को जोड़ने के लिए वन गलियारों का निर्माण और संरक्षण महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, कान्हा-पेंच और कॉर्बेट-राजाजी गलियारों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

2. *स्थानीय समुदायों की भागीदारी*: स्थानीय समुदायों को संरक्षण में सक्रिय रूप से शामिल करने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, और आर्थिक प्रोत्साहन को बढ़ावा देना होगा। सामुदायिक आधारित संरक्षण मॉडल, जैसे पेरियार टाइगर रिजर्व में लागू किए गए, को अन्य क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।

3. *प्रौद्योगिकी का उपयोग*: ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी प्रणालियों का उपयोग अवैध शिकार और आवास निगरानी में प्रभावी हो सकता है।

4. *सख्त कानूनी कार्रवाई*: अवैध शिकार और तस्करी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और तेजी से न्याय सुनिश्चित करना होगा।

5. *नियंत्रित पर्यटन*: टाइगर रिजर्व में पर्यटन को नियंत्रित करने के लिए सख्त दिशानिर्देश लागू किए जाने चाहिए ताकि बाघों के प्राकृतिक व्यवहार पर कम से कम प्रभाव पड़े।

### निष्कर्ष
भारत ने प्रोजेक्ट टाइगर के 50 वर्षों की यात्रा में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बाघों की संख्या में वृद्धि और टाइगर रिजर्व के नेटवर्क का विस्तार इसकी जीवंत गवाही है। फिर भी, अवैध शिकार, मानव-वन्यजीव संघर्ष, और आवास विनाश जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। बाघ न केवल भारत का राष्ट्रीय पशु है, बल्कि यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी है। इनकी दहाड़ को बनाए रखने के लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठनों, वैज्ञानिक समुदाय, और स्थानीय लोगों के सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हमें याद दिलाता है कि बाघों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह हमारी धरती के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने की एक जिम्मेदारी है। यदि हम एकजुट होकर कार्य करें, तो हमारी भावी पीढ़ियां भी इस शानदार प्राणी को इसके प्राकृतिक आवास में देख सकेंगी।

लेखक: हरिशंकर पाराशर, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में स्वतंत्र लेखक और शोधकर्ता।
नोट: यह लेख अखबार में प्रकाशन हेतु प्रेषित किया गया है।

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