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देश में डॉक्टरों की उपलब्धता: स्वास्थ्य मंत्रालय की पहल और भविष्य की राह*

देश में डॉक्टरों की उपलब्धता: स्वास्थ्य मंत्रालय की पहल और भविष्य की राह

लेखक: हरिशंकर पाराशर

नई दिल्ली। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक जटिल चुनौती है। खासकर, डॉक्टरों की उपलब्धता और मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी को दूर करना सरकार के लिए प्राथमिकता का विषय रहा है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यसभा में इस दिशा में किए गए प्रयासों और उपलब्धियों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में एलोपैथिक और आयुष चिकित्सा पद्धतियों को मिलाकर वर्तमान में 811 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। यह अनुपात दिसंबर 2023 के 1:834 की तुलना में सुधरकर 1:811 हो गया है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे सुधारों का सकारात्मक संकेत है।

डॉक्टरों की उपलब्धता: वर्तमान स्थिति
केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री श्रीप्रताप राव जाधव ने राज्यसभा में बताया कि वर्तमान में देश में 13,86,150 रजिस्टर्ड एलोपैथिक डॉक्टर और आयुष मंत्रालय के अंतर्गत 7,51,768 रजिस्टर्ड आयुष डॉक्टर हैं। इनमें से 80% डॉक्टर सक्रिय रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के जून 2022 के आंकड़ों के अनुसार, 13,08,009 एलोपैथिक डॉक्टर NMC और राज्य चिकित्सा परिषदों के साथ पंजीकृत हैं। नर्सिंगकर्मियों की बात करें तो देश में 36.14 लाख नर्सिंगकर्मी हैं, जिसके आधार पर हर 476 नागरिकों पर एक नर्स उपलब्ध है।


यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ रही है, लेकिन ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अभी भी डॉक्टरों और मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी एक गंभीर चुनौती है। खासकर, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों (AIIMS) में फैकल्टी की कमी को लेकर हाल के RTI खुलासों ने इस समस्या को और स्पष्ट किया है। देशभर के 10 AIIMS में फैकल्टी के एक तिहाई पद, 12 AIIMS में प्रोफेसर्स के आधे से ज्यादा पद, और 8 AIIMS में एक तिहाई से ज्यादा एडिशनल प्रोफेसर्स के पद खाली हैं।

सरकार की नीतियां और प्रयास
स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टरों और मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी को दूर करने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत जिला और रेफरल अस्पतालों को अपग्रेड कर नए मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा रहे हैं। अब तक 157 मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से 131 कार्यरत हैं। साथ ही, मौजूदा मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस और पोस्टग्रेजुएट (PG) सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए उनका सुदृढ़ीकरण और अपग्रेडेशन किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत 75 सुपर स्पेशियलिटी प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 71 पूरे हो चुके हैं। यह परियोजनाएं न केवल विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि मेडिकल शिक्षा को भी सशक्त कर रही हैं। इसके अलावा, 22 नए AIIMS की स्थापना के लिए मंजूरी दी गई है, जिनमें से 19 में अंडरग्रेजुएट कोर्स शुरू हो चुके हैं।
मेडिकल फैकल्टी की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने डिप्लोमा इन नेशनल बोर्ड (DNB) योग्यता को फैकल्टी नियुक्तियों के लिए मान्यता दी है और डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा को बढ़ाकर 70 वर्ष कर दिया गया है। यह कदम विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
भविष्य की संभावनाएं
स्वास्थ्य मंत्रालय का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक (1:1000) से बेहतर हो जाएगा। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अनुसार, 2024 के अंत तक देश में पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या 13.86 लाख थी, जिनमें से 80% सक्रिय हैं। इसके अलावा, देश में प्रतिवर्ष 1.20 लाख एमबीबीएस सीटें उपलब्ध हैं, जिसके आधार पर 2024-2030 के बीच 7.20 लाख नए डॉक्टर तैयार होंगे। यदि इस दौरान सीटों की संख्या में और वृद्धि होती है, तो यह आंकड़ा और अधिक हो सकता है। मंत्रालय का अनुमान है कि 2030 तक भारत में सक्रिय डॉक्टरों की संख्या 18 लाख को पार कर जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप 833 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध होगा। यदि आयुष डॉक्टरों को भी शामिल किया जाए, तो यह अनुपात और बेहतर होगा।आमजन के लिए राहत


सरकार की इन नीतियों और योजनाओं का उद्देश्य न केवल डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचाना भी है। आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं आमजन को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके अतिरिक्त, ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली, ई-रक्त कोष, और रक्तदान शिविरों की जानकारी जैसी डिजिटल पहलें मरीजों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच की दूरी को कम कर रही हैं।


स्वास्थ्य मंत्रालय की नीतियां और प्रयास निश्चित रूप से देश में स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात में सुधार, मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि, और सुपर स्पेशियलिटी सुविधाओं का विस्तार इस बात का प्रमाण है कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी और AIIMS जैसे संस्थानों में फैकल्टी के रिक्त पद अभी भी चुनौतियां बने हुए हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार को और अधिक लक्षित नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं पर ध्यान देना होगा, ताकि आमजन को समय पर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हो सकें।

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