हसदेव अरण्य: प्रकृति, संस्कृति और संकट का इतिहास
लेखक: हरिशंकर पाराशर

हसदेव अरण्य, छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में सरगुजा, कोरबा और सूरजपुर जिलों में फैला एक विशाल और जैव विविधता से समृद्ध वन क्षेत्र है। लगभग 1,70,000 हेक्टेयर में फैला यह जंगल मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और सांस्कृतिक केंद्र है, जिसे “मध्य भारत का फेफड़ा” कहा जाता है। यह न केवल अपनी प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता के लिए जाना जाता है, बल्कि आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत का आधार भी है। हालांकि, हाल के दशकों में कोयला खनन के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई और पर्यावरणीय विनाश ने इस क्षेत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है। यह लेख हसदेव अरण्य के इतिहास, इसकी महत्वपूर्ण विशेषताओं और वर्तमान चुनौतियों को विस्तार से प्रस्तुत करता है, साथ ही शासन-प्रशासन की दोहरी नीतियों की खामियों को उजागर करता है।
हसदेव अरण्य का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
हसदेव अरण्य का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा की सीमाओं से घिरा हुआ है और हसदेव नदी, जो महानदी की प्रमुख सहायक नदी है, इस क्षेत्र की जीवनरेखा है। हसदेव नदी का उद्गम कोरिया जिले की कैमूर पहाड़ियों से होता है और यह कोरबा, जांजगीर-चाम्पा और बिलासपुर जैसे जिलों में कृषि और निस्तार के लिए जल प्रदान करती है। हसदेव बांगो बांध, जिसे मिनीमाता बांध के नाम से भी जाना जाता है, इस नदी पर बना है और यह लगभग 4 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करता है।
हसदेव अरण्य जैव विविधता का खजाना है। यहां लगभग 3,000 प्रजातियों के पेड़-पौधे, 82 प्रकार के पक्षी, दुर्लभ तितलियां और 167 प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं, जिनमें से 18 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। यह क्षेत्र हाथियों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों का भी निवास स्थान है। इसके अलावा, यह जंगल पंडो और कोरवा जैसी आदिवासी जनजातियों के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है, जो इसे महाभारत के पांडवों और कौरवों से जोड़कर देखते हैं। इन समुदायों का जीवन जंगलों पर पूरी तरह निर्भर है, जहां से वे भोजन, औषधीय पौधे और अन्य संसाधन प्राप्त करते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, हसदेव अरण्य क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का हिस्सा रहा है। कोरबा के पास सर्वमंगला मंदिर और मड़वारानी मंदिर जैसे स्थल इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाते हैं। यह क्षेत्र ब्रिटिश काल में भी महत्वपूर्ण रहा, जब स्थानीय जमींदारों ने इसे संरक्षित रखा। हालांकि, आधुनिक समय में कोयला खनन ने इसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को खतरे में डाल दिया है।
कोयला खनन और पर्यावरणीय संकट
हसदेव अरण्य के नीचे लगभग 550 करोड़ टन कोयले का भंडार होने का अनुमान है, जिसके कारण यह क्षेत्र खनन कंपनियों और सरकारों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। विशेष रूप से ‘परसा ईस्ट केते बासेन’ (पीईकेबी) खनन परियोजना, जो अदानी समूह द्वारा संचालित राज्य विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित है, ने इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई को बढ़ावा दिया है। अब तक, विभिन्न चरणों में लगभग 1 लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं, और आने वाले वर्षों में 2.73 लाख से अधिक पेड़ काटे जाने की योजना है।
2010 में पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने हसदेव अरण्य को “नो-गो जोन” घोषित करने की सिफारिश की थी, क्योंकि यह क्षेत्र जैव विविधता, जल स्रोतों और आदिवासी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालांकि, 2011 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पीईकेबी ब्लॉक को खनन की अनुमति दी, यह दावा करते हुए कि यह हसदेव के मुख्य जंगलों को प्रभावित नहीं करेगा। इसके बाद, 2014 में केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार ने “नो-गो” नीति को कमजोर कर कमर्शियल माइनिंग को बढ़ावा दिया, जिससे खनन गतिविधियां तेज हो गईं।

“एक पेड़ मां के नाम” अभियान: प्रतीकात्मकता या खोखला वादा?
“एक पेड़ मां के नाम” अभियान, जिसे भारत सरकार ने विश्व पर्यावरण दिवस 2024 के अवसर पर शुरू किया, पर्यावरण संरक्षण और मातृ सम्मान को जोड़ने का एक प्रयास है। इस अभियान के तहत लोगों को अपनी मां के नाम पर पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी इस अभियान के तहत कई वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। लेकिन जब हसदेव अरण्य जैसे क्षेत्रों में हजारों प्राचीन वृक्षों को काटने की अनुमति दी जा रही है, तो यह अभियान केवल प्रतीकात्मक लगता है। एक पेड़ लगाने का पर्यावरणीय लाभ हजारों पेड़ों की कटाई के सामने नगण्य है।
शासन-प्रशासन की खामियां
ग्राम सभाओं की अनदेखी
वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत, ग्राम सभाओं की सहमति के बिना खनन परियोजनाओं को मंजूरी देना गैरकानूनी है। फिर भी, हसदेव में कथित तौर पर फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों के आधार पर अनुमति दी गई, जिसका आदिवासियों ने विरोध किया है।
पुलिस और प्रशासन का दुरुपयोग:
कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन का उपयोग विरोध को दबाने और खनन कार्यों को सुचारु करने के लिए किया जा रहा है। अक्टूबर 2024 में, सरगुजा में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें दोनों पक्षों को चोटें आईं।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में कमी
खनन परियोजनाओं के लिए EIA में पारदर्शिता की कमी रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और भारतीय वानिकी अनुसंधान परिषद (ICFRE) की रिपोर्ट्स ने चेतावनी दी है कि खनन से जैव विविधता, हसदेव नदी और मानव-हाथी संघर्ष पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
दोहरी नीतियां:
सरकार एक ओर वृक्षारोपण को बढ़ावा देती है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर वन विनाश को मंजूरी दे रही है। यह नीतिगत असंगति पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाती है।
आदिवासी समुदायों पर प्रभाव
हसदेव अरण्य के आसपास रहने वाले गोंड, उरांव, पंडो और कोरवा जैसे आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका, संस्कृति और आध्यात्मिकता के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। खनन के कारण उनकी जमीन और संसाधन छीने जा रहे हैं, और उनकी सांस्कृतिक पहचान खतरे में है। “हसदेव बचाओ” अभियान के तहत, आदिवासियों और कार्यकर्ताओं, जैसे आलोक शुक्ला और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, ने एक दशक से अधिक समय से विरोध किया है। 2021 में, 350 से अधिक ग्रामीणों ने 300 किमी की पदयात्रा कर रायपुर में अपनी मांगें उठाई थीं।
प्रकृति के अनुकूल समाधान
स्थायी विकास मॉडल: नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देकर कोयला खनन पर निर्भरता कम की जाए।
कानूनी प्रक्रियाओं का पालन:
ग्राम सभाओं की सहमति और EIA को पारदर्शी और कठोरता से लागू करना।
वृक्षारोपण की सार्थकता:
काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और उनकी देखभाल सुनिश्चित करना।
आदिवासियों का सशक्तिकरण:
स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना और उनकी आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराना।
जागरूकता और जवाबदेही: स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित कर जनता को पर्यावरणीय मुद्दों पर जागरूक करना।
हसदेव अरण्य का इतिहास प्रकृति और संस्कृति का अनूठा संगम है, जो आदिवासी समुदायों और जैव विविधता के लिए जीवन का आधार रहा है। लेकिन कोयला खनन और “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियानों के बीच सरकार की दोहरी नीतियां इस विरासत को खतरे में डाल रही हैं। यह समय है कि शासन-प्रशासन पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को प्राथमिकता दे। जनता को भी इस मुद्दे पर एकजुट होकर हसदेव अरण्य को बचाने के लिए आवाज उठानी होगी, ताकि यह प्राकृतिक धरोहर भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे।
प्रकाशन हेतु: यह लेख जनता के बीच पर्यावरण संरक्षण और शासन की जवाबदेही के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से समर्पित है।
















Leave a Reply