कटनी में पुलिस की मनमानी और भाजपा शासन की बदनामी: पंचक-योग की बलि चढ़े पांच पुलिसकर्मियों के करियर*
सत्यार्थ न्यूज़ संवाददाता, कटनी

कटनी में पुलिस अधीक्षक (एसपी) अभिजीत रंजन की कथित मनमानी और विवादास्पद कार्यशैली ने न केवल स्थानीय स्तर पर हंगामा मचाया, बल्कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी के कटघरे में खड़ा कर दिया। जनवरी 2025 में शुरू हुई यह कहानी मई 2025 तक इतनी तूल पकड़ चुकी थी कि इसका असर न सिर्फ स्थानीय पुलिस विभाग, बल्कि प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गया। इस पूरे घटनाक्रम में पांच पुलिसकर्मियों—तीन थाना प्रभारियों (टीआई) अंकित मिश्रा, नीरज दुबे, अनूप सिंह और अब डीएसपी प्रभात शुक्ला और महिला थाना प्रभारी मंजू मिश्रा—के करियर की बलि चढ़ गई। इसे स्थानीय मीडिया ने “पंचक-योग” की संज्ञा दी है, जो बड़े नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों की “महायुति” का दुष्परिणाम बताई जा रही है।

### *घटनाक्रम की शुरुआत: जनवरी 2025 में आंदोलन और बदनामी का बीज*
जनवरी 2025 में कटनी के चार विधायकों ने एसपी अभिजीत रंजन की कार्यशैली के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। उनकी शिकायत थी कि एसपी की मनमानी और गलत नीतियों से जिले में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है। हालांकि, उस समय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा के कथित हस्तक्षेप के कारण विधायकों का यह आंदोलन दबा दिया गया। नतीजतन, तीन थाना प्रभारियों—अंकित मिश्रा, नीरज दुबे और अनूप सिंह—का तबादला कर दिया गया, लेकिन एसपी को उनके पद से हटाने की कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि उस समय एसपी को हटा दिया जाता, तो मई 2025 में होने वाली राष्ट्रीय स्तर की बदनामी को टाला जा सकता था।
*मई 2025: विवाद का चरम और राष्ट्रीय सुर्खियां*
मई 2025 में एक और गंभीर घटना ने कटनी को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। 28 मई को सीएसपी ख्याति मिश्रा के बंगले पर उनके सास-ससुर, पिता और अबोध बच्चे के साथ कथित तौर पर पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार किया गया। आरोप है कि पुलिस फोर्स को उनके परिवारजनों को “धुनाई” करने के लिए भेजा गया था। इस घटना की जानकारी जब स्थानीय मीडिया को मिली, तो पत्रकार थाने पहुंचे, जहां थाने का चैनल गेट पहली बार बंद पाया गया। इस दौरान पुलिस और पत्रकारों के बीच तीखी बहस हुई, जिसमें पुलिस ने पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया। बाद में पुलिस ने माफी मांगी, लेकिन तब तक मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन चुका था।

इस घटना ने पत्रकारों और स्थानीय विधायक संदीप जायसवाल को आंदोलन के लिए प्रेरित किया। पत्रकारों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से न्याय की मांग की और सुभाष चौक पर धरना शुरू कर दिया। कटनी के सांसद और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा को भी इसकी सूचना दी गई। राष्ट्रीय मीडिया में भाजपा शासन की लगातार हो रही बदनामी के दबाव में आखिरकार मुख्यमंत्री ने एक्स पर घोषणा की कि डीएसपी प्रभात शुक्ला और महिला थाना प्रभारी मंजू मिश्रा को जबलपुर डीआईजी कार्यालय में लाइन अटैच किया जा रहा है। इसके बाद धरना समाप्त हुआ, लेकिन इस कार्रवाई को केवल “सफाई का प्रयास” माना जा रहा है, क्योंकि असली जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
*पंचक-योग: पांच पुलिसकर्मियों का करियर दांव पर*
इस पूरे प्रकरण में पांच पुलिसकर्मियों का करियर बलि का बकरा बन चुका है। पहले तीन थाना प्रभारियों—अंकित मिश्रा, नीरज दुबे और अनूप सिंह—को तबादले का दंड भुगतना पड़ा। अब डीएसपी प्रभात शुक्ला और टीआई मंजू मिश्रा को लाइन अटैच कर दिया गया। सवाल यह उठता है कि इन सभी को आदेश देने वाला “बड़का-अफसर” कौन था? स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सीएसपी ख्याति मिश्रा के बंगले पर उनके परिवार के साथ दुर्व्यवहार के लिए पुलिस को निर्देश देने वाला वही वरिष्ठ अधिकारी है, जिसका नाम “अंधेरे में छिपा” है। इस अधिकारी को बचाने के लिए निचले स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
### *पत्रकारों और विधायक जायसवाल की भूमिका*
इस पूरे घटनाक्रम में पत्रकारों के संघर्ष ने एक बार फिर साबित किया कि वे जनता के प्रति होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम हैं। विधायक संदीप जायसवाल ने भी इस मामले में जनता का साथ देते हुए मुख्यमंत्री तक बात पहुंचाई। जायसवाल ने यह भी साबित किया कि वे भविष्य में भी अन्याय के खिलाफ खड़े रहेंगे, भले ही इसका नुकसान उनके राजनीतिक करियर को हो।
### *सबक: अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के लिए चेतावनी*
यह घटनाक्रम अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के लिए एक बड़ा सबक है। स्थानीय लोगों और पत्रकारों का मानना है कि यदि भविष्य में पुलिसकर्मी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के गलत और गैरकानूनी आदेशों का अंधभक्ति में पालन करते रहे, तो उनका करियर खतरे में पड़ सकता है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े नेता और वरिष्ठ अधिकारियों की “महायुति” छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाने में संकोच नहीं करती। इसलिए पुलिसकर्मियों को चाहिए कि वे गलत आदेशों की अवज्ञा करने का साहस दिखाएं, ताकि भविष्य में उनके करियर को “पंचक-योग” की बलि न चढ़ना पड़े।
### *निष्कर्ष*
कटनी में हुई इस घटना ने न केवल पुलिस विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाए, बल्कि भाजपा शासन की छवि को भी धूमिल किया। यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि सत्ता और प्रशासन की गलत नीतियों का खामियाजा अंततः निचले स्तर के कर्मचारियों को भुगतना पड़ता है। अब देखना यह है कि इस मामले में असली जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या यह केवल दिखावटी सफाई तक सीमित रह जाएगा।















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