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झोपड़ी में चल रही आंगनबाड़ी: निड़दे में दस साल से भवन विहीन केंद्र, अधूरे निर्माण पर उठे सवाल

विशेष संवाददाता पुनीत मरकाम कांकेर                                                                                     झोपड़ी में चल रही आंगनबाड़ी: निड़दे में दस साल से भवन विहीन केंद्र, अधूरे निर्माण पर उठे सवाल

कांकेर/कोयलीबेड़ा ब्लॉक के लक्ष्मीपुर पंचायत अंतर्गत आश्रित गांव निड़दे की आंगनबाड़ी केंद्र शासन की योजनाओं की जमीनी हकीकत बयां कर रही है। जहां सरकार बच्चों के पोषण, शिक्षा और विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं निड़दे में यह केंद्र पिछले दस वर्षों से बिना भवन के सहायिका के घर में त्रिपाल के नीचे संचालित हो रहा है।

पुराना भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है, जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी। तब से लेकर अब तक स्थायी भवन का इंतजार जारी है। केंद्र में दर्ज 35 बच्चों को शिक्षा और पोषण की सुविधाएं अस्थायी और असुरक्षित माहौल में दी जा रही हैं। सहायिका और कार्यकर्ता सीमित संसाधनों के बीच बच्चों की देखभाल और भोजन वितरण का कार्य निरंतर कर रही हैं।

निर्माण कार्य दो साल से अधूरा
ग्रामीणों की मानें तो नया भवन दो वर्ष पूर्व बनना शुरू हुआ था, लेकिन निर्माण कार्य अब तक अधूरा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि भवन निर्माण में शासन के निर्देशों की अनदेखी करते हुए लाल ईंटों का प्रयोग किया गया है, जबकि नियमों के अनुसार भवनों में प्लाई ऐश ईंट का उपयोग अनिवार्य है। विभागीय उदासीनता और तकनीकी मानकों की अनदेखी के बीच निर्माण कार्य बीच में ही रोक दिया गया है ।

शिकायतों के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि कई बार संबंधित अधिकारियों को इस संबंध में अवगत कराया गया, लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उनका कहना है कि यह न केवल सिस्टम की लाचारी को उजागर करता है, बल्कि ग्रामीण बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है।

ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि निड़दे आंगनबाड़ी का निर्माण कार्य जल्द पूर्ण कराया जाए। साथ ही, नियमों की अनदेखी कर निर्माण कार्य में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और सरपंच सचिव के खिलाफ कार्रवाई की जाए, ताकि इस प्रकार की स्थिति भविष्य में अन्य क्षेत्रों में न दोहराई जाए।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रूपो बाई साहू बताती हैं, भवन पूरी तरह खराब हो गया, इसलिए पिछले पांच साल से घर के आंगन में ही बच्चों को पढ़ा रही हूं। पहले पांच साल दूसरे जगह पर संचालित किए । नया भवन अब भी अधूरा है, हमें नहीं पता कब तैयार होगा।

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