संवाददाता:-हर्षल रावल
सिरोही/राज.
रावल ब्राह्मण वर्ग के युवा राजू रावल ने प्रयागराज के महाकुंभ में संन्यास लिया, राजू से श्री रामगिरी महाराज बने।

समाज के युवा संत श्री रामगिरी महाराज सूरजकुंडवाले श्री श्री अवधेशानंद दाता के सानिध्य में प्रयागराज में दीक्षा ग्रहण कर संन्यासी बने।
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सिरोही। ‘भक्ति में ही शक्ति है!” भक्ति के ज़रिए ईश्वरीय शक्ति का अनुभव होता है और इससे व्यक्ति को शक्ति मिलती है। भक्ति से मन शांत होता है और आनंद की प्राप्ति होती है। भक्ति के ज़रिए व्यक्ति को जीवनमुक्ति का मार्ग मिलता है।
आधुनिक समय में, जब युवा तकनीक और आकर्षण के संसार में करियर बनाने का स्वप्न देखता हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने अपनी पेशेवर पहचान को त्यागकर सनातन धर्म को अपनाया है। महाकुंभ 2025 में नई पीढ़ी का सनातन संस्कृति की ओर बढ़ता रुझान स्पष्ट रूप से देखने को मिला हैं। इस महाकुंभ में देश और विदेश से कई उदाहरण समक्ष आए। मोह-माया का संसार को त्याग कर सिरोही जिले के मुंडारा निवासी राजूभाई ने आध्यात्मिक मार्ग को चुना।
ऐसे ही भक्ति पर विश्वास रखनेवाले और भक्ति के मार्ग पर चलनेवाले राजूभाई मुंडारा निवासी ने प्रयागराज के “महाकुंभ” मेले में अपने गुरु श्री श्री अवधेशानंद दाता महाराज के सानिध्य में संन्यासी बनने का निर्णय करके अपने आपको इस मायाजाल के चक्र से मुक्त किया। इससे रावल ब्राह्मण समाज का नाम गर्व से रोशन हुआ कि समाज को भक्ति और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलेगी।
श्री रामगिरी महाराज बाल्यावस्था से ही सूरजकुंडवाले दाता श्री श्री अवधेशानंद महाराज के सानिध्य में भक्ति का मार्ग पकड़ लिया और अपने आपको इसमें रंगों दिया था। श्री रामगिरी महाराज को यह ज्ञात हो गया था कि इस मोह-माया वाले संसार के दल-दल में केवल फंसते जाना है। इससे अपने जीवन का कल्याण नहीं होगा। यदि जीव को इस अनेक भव से मुक्ति चाहिए तो केवल मनुष्य जन्म में ही संभव है। क्योंकि मनुष्य में हम वह समस्त ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। जिसके लिए हमें “मोक्ष” की प्राप्ति हो सके और समाज कल्याण के लिए भगवान से प्रार्थना कर सकते हैं।

श्री रामगिरी महाराज का कहना हैं:-
श्री रामगिरी महाराज ने कहा कि यह मेरा सौभाग्य है कि “महाकुंभ की पवित्र मेला में दीक्षा प्राप्त हुई। बाल्यावस्था से ही गुरू अवधेशानंद महाराज के सानिध्य में भगवान के प्रति भक्ति का रंग लग गया था। आज संपूर्ण प्रकार से संसार का लोभ त्याग कर संन्यासी बना हुं। मनुष्य को इस अनेक भव से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को एकमात्र अवसर मिलता है। वह केवल मनुष्य जन्म में ही संभव हैं और इस संसार रूपी माया जाल में यह संभव नहीं था। इसलिए मैंने संन्यास लेने का निर्णय लिया।
उन्होंने कहा कि महाकुम्भ में सनातन धर्म की दीक्षा ग्रहण की। उनका कहना है कि पेशेवर जीवन में दिखावे और आडंबर से भरे जीवन ने उन्हें थका दिया है। मैंने महसूस किया कि वास्तविक सुख और शांति केवल भगवान और सनातन धर्म की शरण में ही है। मेरे गुरु श्री श्री अवधेशानंद गिरि से दीक्षा लेने के पश्चात मैंने जीवन का नया अर्थ समझा है।


















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