जीव तभी तक रहते हैं जब तक कर्म फल रहता है। फल क्षीण होने पर जन्तु नष्ट हो जाते हैं। अतः जागते रहो।
ऋणानुबन्धरूपेण पशुपत्निसुतादयः।
ऋणक्षये क्षयं यान्ति तस्मात् जाग्रत जाग्रत॥७॥
पशु, पत्नी, सुत (सन्तान) आदि का सम्बन्ध पूर्व ऋण को पूरा करने के बन्धन के कारण है। ऋण पूरा होते ही सम्बन्ध टूट जाता है। अतः जागते रहो।
सम्पदः स्वप्नसङ्काशाः यौवनं कुसुमोपमम्।
विद्युत् चञ्चलं आयुष्यं तस्मात् जाग्रत जाग्रत॥८॥
सम्पत्ति स्वप्न की तरह है, यौवन फूल की तरह है (झड़ जाता है)। आयुष्य (जीवन) विद्युत् की तरह चञ्चल है। अतः जागते रहो।
पक्वानि तरुपर्णानि पतन्ति क्रमशो यथा।
तथैव जन्तवः काले तत्र का परिदेवना॥९॥
जैसे वृक्ष के पत्ते पकने पर क्रमशः झड़ते रहते हैं, उसी तरह जन्तु भी अपना समय आने पर मर जाते हैं। इसमें क्या दुःख करना है?
एकवृक्षसमारूढाः नानाजाति विहङ्गमाः।
प्रभाते क्रमशो यान्ति तत्र का परिदेवना॥१०॥
कई जातियों के पक्षी एक वृक्ष पर बैठे रहते हैं। प्रातः होते ही सभी एक-एक कर चले जाते हैं। इसमें क्या शोक मनाना है?
३. ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय ३३ (पञ्चिका ७, अध्याय ३)
इन्द्र द्वारा रोहित को उपदेश-
नानाश्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम।
पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा॥१॥ चरैवेति।
हे रोहित! परिश्रम न करने वाले व्यक्ति को श्री नहीं मिलती, ऐसा सुना है। एक ही स्थान पर बैठने वाले को विद्वान् लोग हीन मानते हैं। विचरण में लगे जन का ईश्वर साथी होता है। अतः तुम चलते ही रहो।
जो व्यक्ति कार्यशील रहता है, उसकी जंघाओं में फूल खिलते हैं (पल्लव जैसी जंघा = पल्लवन्, पह्लव या पहलवान), और शरीर में फल लग जाते हैं। कर्मठ व्यक्ति के मार्ग की सारी बाधायें नष्ट हो जाती हैं। अतः तुम चलते ही रहो।
आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः।
शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगः॥३॥ चरैवेति।
जो बैठा रहता है, उसका भाग्य (भग = ऐश्वर्य) भी रुका रहता है। जो उठ खड़ा होता है, उसका भाग्य भी उसी प्रकार उठता है। जो सोया रहता है, उसका भाग्य भी सो जाता है। जो विचरण करता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है। अतः तुम चलते ही रहो।
जो सो रहा है, वह कलियुग में है, निद्रा से उठने वाला द्वापर युग में है। उठ कर खड़ा होने वाला त्रेता युग में है और श्रम करने वाला सत्य युग में है। अतः तुम चलते रहो।
यह ४ वर्ष का युग भी बताता है, जिसमें ग्रेगरी कैलेण्डर की तरह १ लीप ईयर प्रति ४ वर्ष में होता है। युगों का नाम १ से ४ तक इसी पर आधारित है। प्रथम वर्ष (कलि = गणना का आरम्भ) की गोधूलि वेला यदि १ जनवरी सन्ध्या ६ बजे से हो, तो वह द्वितीय वर्ष १ जनवरी को रात्रि १२ बजे पूरा होगा। अतः कलि को सोया हुआ कहते हैं (इसकी पूर्णता के समय अर्द्ध रात्रि)। द्वितीय या द्वापर वर्ष तीसरे वर्ष २ जनवरी को प्रातः ६ बजे होगा जब लोग उठने लगेंगे। अतः द्वापर को सञ्जिहान (जागने का समय) कहते हैं। तृतीय वर्ष त्रेता ४ थे वर्ष २ जनवरी दिन १२ बजे पूरा होगा जब लोग खड़े होंगे (या सूर्य ऊपर खड़ा होगा)। चौथा वर्ष कृत (पूर्ण) २ जनवरी सन्ध्या ५ बजे समाप्त होगा जब लोग घर लौटते होंगे। इन ४ वर्षों में १ लीप ईयर होगा जिसमें १ दिन अधिक होगा। अतः ४ वर्ष का युग उसी दिन १ जनवरी को पूर्ण होगा।
चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्॥५॥ चरैवेति।
चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है, चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो जो नित्य चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता। अतः तुम चलते ही रहो।
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