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सोनभद्र -शोषित चेतना का उदय : स्वामी प्रसाद मौर्य की वैचारिक यात्रा – अंशुमान मौर्य

शोषित चेतना का उदय : स्वामी प्रसाद मौर्य की वैचारिक यात्रा – अंशुमान मौर्य

 

 

(सोनभद्र) सत्यनारायण मौर्य/संतेश्वर सिंह

स्वामी प्रसाद मौर्य भारतीय राजनीति के ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण सार्वजनिक जीवन शोषित समाज—विशेषकर दलित, पिछड़े, आदिवासी और वंचित वर्गों—के अधिकारों, सम्मान और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित किया। वे केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को जाग्रत करने वाले विचारक और शोषित हितैषी नेता के रूप में भी जाने जाते हैं। उनकी राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर खड़े लोगों का उत्थान रहा है।स्वामी प्रसाद मौर्य का जन्म उत्तर प्रदेश के एक साधारण किसान परिवार में 2 जनवरी 1954 जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने समाज की विषमताओं, गरीबी, जातिगत भेदभाव और शोषण को बहुत करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन की दिशा तय करते हैं। शिक्षा के माध्यम से उन्होंने न केवल आत्मविकास किया, बल्कि समाज में फैली कुरीतियों को समझने की क्षमता भी अर्जित की। राजनीति में प्रवेश के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य ने शोषित समाज के मुद्दों को मुखरता से उठाया। उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक अधिकार, अवसर और सम्मान पहुँचेगा। उनके भाषणों और विचारों में सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा फुले और पेरियार जैसे समाज सुधारकों के विचारों से प्रभावित रहे हैं और उन्हीं के मार्ग पर चलने का दावा करते हैं। इनके राजनीति की एक विशेषता यह रही है कि उन्होंने सामाजिक मुद्दों को धार्मिक और सांस्कृतिक विमर्श से जोड़कर शोषित समाज में आत्मसम्मान की भावना को मजबूत किया। वे खुलकर रूढ़िवाद, अंधविश्वास और जाति आधारित भेदभाव का विरोध करते रहे हैं। इसी कारण कई बार उन्हें विवादों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने विचारों से पीछे हटना उचित नहीं समझा। उनके अनुसार, समाज में वास्तविक परिवर्तन के लिए साहसिक और स्पष्ट विचारों की आवश्यकता होती है। शोषित हितैषी के रूप में स्वामी प्रसाद मौर्य ने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना। वे मानते हैं कि शिक्षा के बिना शोषित समाज न तो अपने अधिकारों को समझ सकता है और न ही शोषण के विरुद्ध संगठित हो सकता है। इसलिए उन्होंने शिक्षा में समान अवसर, आरक्षण की रक्षा और सरकारी संस्थानों में शोषित वर्गों के प्रतिनिधित्व की निरंतर वकालत की। उनके अनुसार, आरक्षण कोई दया नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का संवैधानिक अधिकार है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने सामाजिक समानता के साथ-साथ आर्थिक न्याय पर भी जोर दिया। वे किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की समस्याओं को संसद और विधानसभा में उठाते रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी और निजीकरण के खिलाफ उनकी आवाज शोषित समाज की सामूहिक पीड़ा को व्यक्त करती है। उनका मानना है कि जब तक आर्थिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण नहीं होगा, तब तक सामाजिक समानता अधूरी रहेगी। राजनीतिक जीवन में उन्होंने विभिन्न दलों में कार्य किया, लेकिन उनकी मूल विचारधारा—शोषित समाज का सशक्तिकरण—हमेशा स्थिर रही। वे सत्ता से अधिक विचार को महत्व देने वाले नेता माने जाते हैं। यही कारण है कि उनके निर्णयों और बयानों में वैचारिक स्पष्टता दिखाई देती है, भले ही वह तत्काल राजनीतिक लाभ के अनुकूल न हो। स्वामी प्रसाद मौर्य का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। वे सामाजिक संवाद और वैचारिक बहस के माध्यम से समाज को जागरूक करने का कार्य भी करते हैं। उनके लेखन और वक्तव्यों में शोषित समाज के इतिहास, संघर्ष और भविष्य की चिंता झलकती है। वे चाहते हैं कि शोषित समाज अपने गौरवशाली इतिहास को पहचाने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े।स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक यात्रा सामाजिक न्याय की धारा में निरंतर परिवर्तन और संघर्ष की कहानी है। उन्होंने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी से की और लगभग 1990 के दशक से 2016 तक पार्टी में रहकर विधायक, मंत्री और विधान परिषद सदस्य के रूप में कार्य किया। जून 2016 में वे बहुजन समाज पार्टी से अलग हुए और उसी समय भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया, जहाँ उन्होंने श्रम, रोजगार और पिछड़ा वर्ग कल्याण से जुड़े विभाग संभाले। भाजपा सरकार की नीतियों से वैचारिक असहमति के चलते उन्होंने जनवरी 2021 को मंत्री पद से इस्तीफा दिया और इसके बाद वे समाजवादी पार्टी से जुड़े, परंतु कम ही समय में वह समाजवादी पार्टी से अलग हो गए और 20 फरवरी 2024 को पार्टी साथ ही विधान परिषद की सदस्यता दोनों से इस्तीफा दिया, क्योंकि उन्हें नेतृत्व से वैचारिक असहमति और समर्थन न मिलने का मत था। इसके बाद 22 फरवरी 2024 को उन्होंने राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी केनाम से अपना नया राजनीतिक दल गठन किए।राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के गठन के कुछ समय बाद ही इसका नाम व ढांचा अपनी जनता पार्टी में समायोजन हुआ। जिसका उद्देश्य शोषित, पिछड़े और वंचित वर्गों की वैचारिक एकता था। इस प्रयास के तहत देश-प्रदेश की दर्जनों छोटी सामाजिक-राजनीतिक पार्टियों और संगठनों का विलय कर एक व्यापक मोर्चा खड़ा किया गया। इसी वैचारिक और सांगठनिक प्रक्रिया का परिणाम आगे चलकर अपनी जनता पार्टी के रूप में सामने आया।वर्तमान में स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और शोषित समाज की स्वतंत्र, वैकल्पिक राजनीति को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

 

आज 2 जनवरी को माननीय जी को जन्मदिन की बहुत बहुत मंगलकामनाएं।

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