बढ़ती आर्थिक असमानता: लोकतंत्र के लिए गहराता खतरा
*हरि शंकर पराशर

देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई दिन-ब-दिन चौड़ी होती जा रही है। हाल ही में जारी वर्ल्ड इनइक्वेलिटी रिपोर्ट 2026 (वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब) के आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपदा का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं, सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में कुल संपदा का 65 प्रतिशत केंद्रित हो चुका है। इसका मतलब साफ है कि बाकी बचे 90 प्रतिशत लोगों के पास सिर्फ 35 प्रतिशत संपदा रह गई है।
आय के मामले में भी तस्वीर कम चिंताजनक नहीं है। देश की कुल आय का 58 प्रतिशत हिस्सा सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों की जेब में जा रहा है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोग – यानी आधी आबादी – को महज 15 प्रतिशत आय पर गुजारा करना पड़ रहा है। ये आंकड़े बताते हैं कि आम आदमी की मेहनत का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने लोगों तक पहुंच रहा है।
यह असमानता नई नहीं है, लेकिन यह तेजी से बढ़ रही है। कुछ साल पहले, 2022 की रिपोर्ट में सबसे अमीर 10 प्रतिशत के पास कुल आय का 57 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 58 प्रतिशत हो गया। संपदा के मामले में भी यही ट्रेंड दिखता है – अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि गरीबों का हिस्सा सिमटता जा रहा है।
यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। जब इतनी बड़ी संपदा और आय कुछ हाथों में केंद्रित हो जाती है, तो यह सिर्फ आर्थिक असमानता नहीं रह जाती। ये अमीर लोग अपनी दौलत की ताकत से राजनीति, मीडिया, नौकरशाही और यहां तक कि बौद्धिक जगत को भी प्रभावित करने लगते हैं। पैसे के दम पर वे मनचाही पार्टियों को चुनाव जितवाते हैं, सरकारें बनवाते हैं और नीतियां अपने हित में बदलवाते हैं। नतीजा यह होता है कि आम जनता की आवाज दब जाती है।
संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ठीक यही चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रही, तो राजनीतिक लोकतंत्र को यह निगल जाएगी। आज देश में सामाजिक असमानता तो जस की तस है, और आर्थिक असमानता इतनी बढ़ गई है कि यह हमारे लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा बन चुकी है। एक तरफ मुट्ठी भर लोग अरबों-खरबों की संपत्ति जोड़ रहे हैं, दूसरी तरफ करोड़ों लोग बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह असमानता सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी विभाजन पैदा कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों तक पहुंच भी इसी खाई से प्रभावित होती है। अगर हमने अब भी इसे रोका नहीं, तो आने वाली पीढ़ियां और गहरे संकट में फंस जाएंगी।
समय आ गया है कि सरकारें और समाज मिलकर इस पर गंभीरता से विचार करें। कर नीतियां, संपदा कर, विरासत कर जैसे उपायों पर बहस होनी चाहिए। साथ ही, शिक्षा और रोजगार के अवसर सब तक पहुंचें, ताकि यह खाई कम हो सके। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब हर नागरिक को बराबरी का हक मिले। अन्यथा, आंबेडकर की चेतावनी साकार हो जाएगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
















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