अंकित कुमार वर्मा ब्यूरो चीफ शाहजहांपुर
तिलहर में धान क्रय घोटाला या “ईमानदारी का नया कीर्तिमान”
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तहसीलदार साहब के डिजिटल खेत से हजारों कुंतल धान डिजिटल तरीके से मिर्जापुर परौर तक होता है सप्लाई
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#शाहजहाँपुर। तिलहर तहसील ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में सरकारी धान खरीद का मतलब है – “जितना डिजिटल दिखाओ, उतना ही असलियत में गायब रखो, और जो बच जाए उसे प्रति कुंतल के हिसाब से ‘सुरक्षा शुल्क’ के नाम पर वसूल लो।” सूत्रों के अनुसार तहसीलदार दीपेंद्र कुमार ने तो कमाल कर दिया। तिलहर मंडी में एजेंसी के आठ क्रय केन्द्रों पर कुल 42,397 कुंटल धान की खरीद दर्ज की गई है, किंतु इसमें से 12744 कुंतल की खरीद फर्जी सत्यापन के द्वारा तैयार किए गए फर्जी किसानों द्वारा की गई थी। इन फर्जी किसानों का पंजीकरण अन्य वास्तविक किसानों के खाता-खतौनी एवं गाटा संख्या चुराकर किया गया है।तहसीलदार साहब द्वारा पहले 10 रु प्रति कुंतल के रेट पर 12,744 कुंतल धान को पूरी तरह “डिजिटल जादू” से पैदा करवाया– यानी भूलेख से गाटा चुराओ, फर्जी किसान बनाओ, पोर्टल पर अपलोड करो, और बस हो गया काम! फिर जब स्टॉक के भौतिक सत्यापन का नंबर आया तो तहसीलदार साहब को पता था कि “जो चीज है ही नहीं, उसे दिखाया कैसे जायेगा?” बस, क्रय केंद्र वालों से 10 रुपये प्रति कुंतल “ईमानदारी प्रीमियम” लिया और स्टॉक को “पूर्णतः सही” घोषित कर दिया।

सत्यापन की कमान थी जनपद स्टॉक चेकिंग के नोडल प्रभारी न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री असलम अहमद साहब के पास। वही श्री असलम अहमद साहब जिनके खाते से कुछ दिन पहले ही एक करोड़ रुपये “गायब” हो गए थे। स्थानीय लोग हँसते-हँसते बताते हैं, “साहब तो इतने ईमानदार हैं कि उनके खाते में जो पैसा आता है, वो भी खुद-ब-खुद गायब हो जाता है, फिर दूसरों का धान क्या चीज है!” जब यह सारा मामला सामने आया तो प्रमुख सचिव खाद्य एवं रसद को पत्र लिखकर मांग की है कि जांच किसी दूसरे जिले के अधिकारी से कराई जाए, क्योंकि शाहजहाँपुर में तो “सब अपने हैं”।
या फिर शाहजहांपुर एडीएम अरविन्द कुमार और बोरों की गिनती के महारथी श्री पवन यादव को लगाया जाए,।और क्रास चेकिंग करवाई जाय। और हाँ, जांच के दौरान मुझे भी बुलाया जाए, साथ में दो-चार अंगरक्षक भी दे दिए जाएँ, क्योंकि “जिनके खिलाफ शिकायत की है, वो लोग बहुत नेक हैं, पता नहीं कब दिल पर ले लें!” फिलहाल तहसीलदार साहब व्यस्त हैं – नए “डिजिटल धान” की फसल तैयार करने में। न्यायिक मजिस्ट्रेट साहब अपने खाते में फिर से “ईमानदारी की नई राशि” आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और असली किसान? वो अभी भी क्रय केंद्र के बाहर लाइन में खड़े हैं, यह सोचते हुए कि “अगर धान ही डिजिटल हो सकता है, तो हमारी मेहनत भी डिजिटल क्यों नहीं हो जाती?” जारी है… तिलहर का “डिजिटल धान महोत्सव-2025”
















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