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“मेडिकल कॉलेज में सरकारी पर्ची पर लिखी जा रही बाहर की दवा व जांच, कमीशन बाजी के खेल में गरीबों की जेब पर डाला जा रहा डाका, जिम्मेदार मौन”

गंगेश कुमार पाण्डेय
(ब्यूरोचीफ) सत्यार्थ न्यूज़ सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश

“मेडिकल कॉलेज में सरकारी पर्ची पर लिखी जा रही बाहर की दवा व जांच, कमीशन बाजी के खेल में गरीबों की जेब पर डाला जा रहा डाका, जिम्मेदार मौन”

सत्यार्थ न्यूज़ सुलतानपुर:
(सुलतानपुर) मेडिकल कॉलेज में एक रुपये का सरकारी परचा तो मिल जाता है, लेकिन इलाज करवाने निकले मरीजों की जेब से जांच व दवा के नाम पर 500 से 800 रुपये तक खर्च हो रहे हैं। सरकारी परचे पर ही डॉक्टर बाहर की महंगी दवाएं लिख रहे हैं। पैथालॉजी जांच के नाम पर भी यही खेल जारी है।
अस्पताल में बाकायदा मरीजों और तीमारदारों को निजी पैथालॉजी का नाम, पता लिखी परची थमा दी जाती है। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन की निगरानी और सस्ते इलाज के वायदे पर सवाल उठ रहे है।
मरीजों को मेडिकल कॉलेज के सरकारी पर्चे पर फार्मूला के बजाय कंपनी का ब्रांड नेम की महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। किसी दूसरी कंपनी की दवा लेने पर चिकित्सक उसे बेकार बताकर वापस करा देते हैं। अस्पताल गेट के बगल मेडिकल स्टोरों पर मरीजों की लगी भीड़ बाहरी दवाएं लिखने की हकीकत बता रही हैं। सरकार व प्राचार्य की ओर से निर्देश है कि वह सरकारी परचे पर दवाओं का ब्रांड नेम न लिखकर फार्मूला लिखें। परिसर में ही जन औषधि की दुकान भी खुली है, लेकिन यहां से दवा ले जाने के बाद चिकित्सक मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने की सलाह देते हैं।
“तीन दवाएं ब्रांड नेम की लिखी है”
-सरकारी परचे पर अस्पताल में लिखी दवाओं के अलावा तीन दवाएं ब्रांड नेम की लिख दी गईं। एक रुपये के परचे पर दो दवाएं तो अस्पताल से मिल गईं, लेकिन अन्य दवाओं के लिए 550 रुपये खर्च करना पड़ा।-राजेंद्र प्रसाद

“इलाज में अधिक पैसा खर्च करना पड़ा”

– परचे पर तीन दवा सरकारी लिखने के बाद चिकित्सक ने दो दवाएं बाहर की लिख दी हैं। वह बाहर से दवाएं 350 रुपये से अधिक की मिलीं। एक रुपये में इलाज कराने की मंशा लेकर आने के बाद अधिक पैसा खर्च करना पड़ गया।-रोली पांडेय
छह दवाओं में से तीन ब्रांड नेम की
– मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने के बाद परचे पर छह दवाएं लिखी गईं, लेकिन इसमें तीन दवाएं फार्मूला के बजाय ब्रांड नेम की रहीं। इससे 800 रुपये से अधिक की दवा लेना मजबूरी हो गई।- कोमल
-खांसी आ रही है, छाती में तकलीफ है। चिकित्सक को दिखाया तो उन्होंने एक दवा सरकारी के अलावा दो दवाएं ब्रांड नेम की लिख दीं। जो बाहर के मेडिकल स्टोर पर 500 से अधिक की मिलीं।- राम अवतार
परेशानी का समाधान:
1-अस्पताल प्रशासन को सभी परचो की साप्ताहिक मॉनिटरिंग करानी चाहिए, ताकि कोई चिकित्सक फार्मूला के बजाय ब्रांड नेम न लिखे।
2. जन औषधि लिंक सिस्टम के जरिये परचे से सीधे जन औषधि केंद्र को जोड़ा जाए, ताकि मरीजों को वहीं से दवा मिले।
3- ऑनलाइन परचा ट्रैकिंग के तहत ई-परचा सिस्टम शुरू किया जाए, जिससे लिखा गया दवा फार्मूला या ब्रांड नेम, दोनों का डिजिटल रिकॉर्ड रहे।
4-कमीशनखोरी पर सख्त कार्रवाई हो, बाहर की दवाएं लिखने वाले चिकित्सकों पर आर्थिक दंड या निलंबन की कार्रवाई की जाए।
5- मरीज जागरूकता पर काम हो, अस्पताल में बोर्ड पर स्पष्ट लिखा जाय कि डॉक्टर केवल फार्मूला दवा ही लिख सकते हैं और मरीज जन औषधि केंद्र से दवा ले सकते हैं।

“जांच कर कार्रवाई की जाएगी”
मेडिकल कॉलेज के स्टोर में ज्यादातर दवाएं उपलब्ध हैं, कोई दवा नहीं रहती तो चिकित्सकों को उसका फार्मूला लिखने या जन औषधि की दवाएं लिखने के लिए निर्देश दिया गया है, इसके बाद भी बाहर की दवा लिखने वाले चिकित्सकों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
– डॉ. सलिल श्रीवास्तव, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
– सत्यार्थ ब्यूरो न्यूज़ सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश

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