विजयादशमी पर्व और शताब्दी वर्ष पर पांढुरना बनेगा अनुशासन और एकता का साक्षी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ संचलन 5 अक्टूबर को
संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे के उदघोष से गूंजेगा पांढुरना नगर
पांढुरना – विजयादशमी का पर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यही वह दिन है जब ठीक 100 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने संगठनात्मक जीवन की शुरुआत की थी। तभी से विजयादशमी पर्व संघ के लिए शक्ति, संकल्प और सेवा का पर्व बन गया है।
इस वर्ष का विजयादशमी पांढुरना नगर के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर पहली बार नगर की छह बस्तियों से एक साथ संचलन निकलेगा।
गगनभेदी घोष और कदमताल
5 अक्टूबर की 1:30 बजे जब राधाकृष्ण बस्ती, संत गुरूदेवक बस्ती, संत रविदास बस्ती, संत तुकाराम बस्ती, चंद्रशेखर आजाद बस्ती और संत जलाराम बस्ती की गलियों से स्वयंसेवकों के कदम एक साथ उठेंगे, तो पूरा नगर अनुशासन और देशभक्ति का जीवंत चित्र बनेगा। ढोल-नगाड़ों की ताल, घोषणाओं की गूंज और स्वयंसेवकों की सुसंगठित पंक्तियाँ हर हृदय में गर्व और उत्साह की ज्वाला प्रज्वलित करेंगी।
विजयादशमी उत्सव और शस्त्र पूजा इस संचलन का हिस्सा होंगे। शस्त्र पूजा केवल परंपरा नहीं, बल्कि यह स्मरण है कि शक्ति का उद्देश्य सदैव रक्षा और धर्म की स्थापना ही होना चाहिए।

शताब्दी वर्ष का महान संकल्प
संघ ने शताब्दी वर्ष को केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि नवीन संकल्पों की साधना का समय माना है। पंच परिवर्तन—कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी—ये पांच दीप समाज को एक नई दिशा देने वाले हैं। हर दीपक राष्ट्रनिर्माण की राह को आलोकित करेगा।
घर-घर का आह्वान
आज स्वयंसेवक घर-घर पहुँचकर समाज को आमंत्रित कर रहे हैं। वे कह रहे हैं—
“आइए, गणवेश धारण कीजिए, कदम से कदम मिलाइए, और इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनिए।”
यह केवल संघ का नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव है। यह आयोजन दिखाता है कि जब समाज एक साथ चलता है तो उसकी शक्ति अपार हो जाती है।
नया इतिहास, नई ऊर्जा

पांढुरना में पहली बार एक ही समय पर छह बस्तियों में संचलन का यह अनूठा प्रयोग केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक नए युग का प्रारंभ है। यह प्रयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। यह बताएगा कि जब अनुशासन, एकता और सेवा एक धारा में बहती है, तो समाज की कोई शक्ति उन्हें रोक नहीं सकती।
जब 5 अक्टूबर को गगनभेदी घोष होंगे, जब गलियों में कदमताल की गूंज उठेगी, और जब विजयादशमी का सूरज उदित होगा—तब पांढुरना केवल एक नगर नहीं रहेगा, बल्कि वह अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और संगठन शक्ति का जीवंत प्रतीक बन जाएगा।


















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