शुजालपुर मध्यप्रदेश
शुजालपुर के विकास, आशाओं, संभावनाओं और उलझनों का बहुप्रतीक्षित ओवरब्रिज
सत्यार्थ न्यूज़ संवाददाता अशोक राठौर

शुजालपुर । नगर के हृदयस्थल से गुजरने वाले रेलवे फाटक क्रमांक 79 पर वर्षों से प्रस्तावित ओवरब्रिज अब धरातल पर उतरने को तैयार है। 45 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली यह परियोजना नगर की यातायात व्यवस्था को नया जीवन देने का दावा करती है। ओवरब्रिज के साथ ही शुजालपुर रेलवे स्टेशन का नया आनिक टिके रूप में विकसित हो सकता है। इससे शुजालपुर को एक नया व्यवसायिक चेहरा मिलने की संभावना है। साथ ही फीगंज व अन्य कॉलोनीयो की आबादी का शहर से सीधा जुडाव हो जाएगा जोकि रेलवे फाटक के बंद होने से बाधित था। इस ओवर ब्रिज की लंबाई 700 मीटर, चौड़ाई, 12 मीटर, ऊँचाई 9 मीटर, निर्माण अवधि 18 माह और लागत 45 करोड़ होगी। यह ओवरब्रिज नगर के मध्य से निकलेगा जहां इससे विकास की नई उम्मीदें जुड़ी हैं, वहीं कई स्थानीय उसने कार्य और विरोध की देवरानी
सीमांकन का आधार कितनी ज़मीन जाएगी, पारदर्शिता पर सवाल क्यों?
ओवरब्रिज निर्माण के लिए कुल 27 मीटर चौड़ी भूमि अधिग्रहित की जानी है। जिसमें दोनों ओर से 13.5.13.5 मीटर क्षेत्र सीमांकित किया गया है। सीमांकन में राजस्व विभाग रेलवे की सयुंक्त टीम द्वारा भू.अभिलेख, पटवारी नक्शे, जमाबंदी, तथा ड्रोन सर्वेक्षण का उपयोग किया गया। लाल रंग से अवैध निर्माण, अतिक्रमण, जबकि हरा रंग से अधिकृत निजी संपत्तियों को दर्शाया गया। हालांकि, नगर पालिका द्वारा दिए गए नोटिसों को लेकर स्थानीयों में असंतोष है। नागरिकों का आरोप है कि कुछ सटे हुए मकानों को अलग-अलग मापदंडों से देखा गया है, कहीं बाउंड्री तक सीमांकन है तो कहीं निर्माण के भीतर तक। इससे पारदर्शिता व समानता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
22-23 अप्रैल को कार्रवाई, 140 दुकानें-मकान होंगे प्रभावित

प्रशासन द्वारा जानकारी दी गई है कि 22 और 23 अप्रैल को तोड़फोड़ की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी। लगभग 140 से अधिक मकान-दुकानें इसकी जद में आ सकती हैं। इससे प्रभावित व्यापारियों ने मुआवज़ा, पुनर्वास, और योजना को पारदर्शिता को लेकर खुलकर पुनर्विचार की मांग की है।
क्या यहां ब्रिज़ जनता को फायदा पहुंचाएगा या किसी वर्ग विशेष को
स्थानीय नागरिकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि यह ब्रिज जनता की सुविधा के लिए है या किसी वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने की योजना। छोटे दुकानदारों और किराना व्यवसायियों का कहना है कि जिनके पास विकल्प नहीं हैं, उनकी अनदेखी हो रही है। वहीं कुछ प्रभावशाली प्रतिष्ठानों के पास अधिक विकल्प और पहुंच दोनों हैं।
क्या ओवरब्रिज से उजड़ जाएगा पुराना बाजार?
ओवरब्रिज का सबसे बड़ा प्रभाव नगर के पुराने बाजार पर पड़ने की संभावना है। यह वही बाजार है जो दशकों से शुजालपुर की पहचान रहा है। ब्रिज के रूट में आने वाली दुकानों और मकानों को हटाए जाने की प्रक्रिया से यहाँ के व्यापारियों में भय का माहौल है। लोगों का कहना है कि जो बाजार वर्षों से नगर की आर्थिक धुरी रहा है। वह अब विकास के नाम पर उजड़ सकता है।
दबी जुबान में व्यापारी कर रहे हैं ब्रिज का विरोध
खुले मंच से विरोध भले ही न हो रहा होए लेकिन भीतर ही भीतर व्यापारी वर्ग में असंतोष गहराता जा रहा है। कई व्यापारियों का कहना है कि वे तो योजना के समर्थन में हैं, पर योजना में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की कमी है। प्रशासन ने यदि कमलिया बायपास जैसा विकल्प होते हुए भी यह ब्रिज नगर के मध्य बाजार से निकाला है, तो इससे यह आशंका बलवती होती है कि लाभ कुछ खास लोगों को पहुँचाया जा रहा है, जबकि नुकसान आमजन को उठाना पड़ेगा। इसका परिणाम यह है कि व्यापारियों के समूह अब दबी जुबान में सवाल उठा रहे हैं क्या ब्रिज जरूरी है, या इसकी दिशा गलत है?
जब कमलिया बायपास था विकल्प, तो बीच बाजार से क्यों निकाला गया ब्रिज
कमलिया बायपास वर्षों से नगर के लिए एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में प्रस्तावित रहा है, जो शहर के बाहरी हिस्से से ट्रैफिक को निकालने का समाधान दे सकता था। लेकिन अब ओवरब्रिज को नगर के मध्य, भीड़भाड़ वाले क्षेत्र से निकाले जाने से सवाल उठ रहे हैं, क्या इससे ट्रैफिक सुलझेगा या और उलझेगा, क्यों भारी वाहन अब शहर के बीचोंबीच से निकलेंगे, क्यों व्यापारिक और आवासीय क्षेत्रों को संकट में डाला जा रहा है, नगरवासी पूछ रहे हैं कि जब बायपास का विकल्प थाए तो उसे प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई।
एक विधायक के चुनाव जितना पेचीदा है ओवर ब्रिज का मुद्दा
स्थानीय लोग इस ब्रिज के निमर्माण को एक विधायक के चुनाव जितना जटिल मान रहे हैं। कारण है जनभावनाओं की गहराई, प्रशासन की संवेदनशीलता की कमी और योजना में स्पष्ट संवाद की कमी। कुछ लोगों का कहना है कि यदि संवाद और प्रक्रिया में समानता व पारदर्शिता नहीं रखी गई, तो यह विकास नहीं बल्कि संघर्ष की जमीन बन सकता है। यह ओवरब्रिज एक ओर शुजालपुर के लिए नवविकास की शुरुआत है, वहीं दूसरी ओर यह सामाजिक, प्रशासनिक और मानवीय उलझनों का केंद्र भी बनता जा रहा है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल निर्माण न करे, बल्कि विश्वास का सेतु भी बनाए। जनता को सिर्फ अधिग्रहण नहीं, सम्मान, संवाद और समाधान भी चाहिए। यह ब्रिज वर्तमान सरकार की किस्मत पलट भी सकता है तो बना भी सकता है।

















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