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चारों तरफ से मार झेल रहा किसान, खुशहाली की बात बेमानी

चारों तरफ से मार झेल रहा किसान, खुशहाली की बात बेमानी

बरेली रायसेन मध्य प्रदेश

संवाददाता तखत सिंह परिहार सिलवाह


भारत एक कृषि प्रधान देश है यह बच्चे को बचपन में ही स्कूल में पढ़ा दिया जाता है लेकिन देश के हुक्मरान इस चीज को समझ पाते हैं कि नहीं यह आम किसान की समझ से परे है ।
आज किस की खुशहाली की बात होती है लेकिन ना तो उसको फसल का बाजिब मूल्य मिलता है और ना ही समय पर खाद ,यूरिया,बिजली, पानी ।
किसान अपनी मौलिक जरूरत के लिए भी कई दिनों तक लाइन में लगा रहता है ।
बढ़ती लागत और घटती कीमतों ने किसान की कमर तोड़ दिया ।
और किसान की ही कमर नहीं तोड़ी उससे लगे हुए व्यापारियों की एवं मजदूरों की भी बहुत अच्छी स्थिति नहीं है ।
जो धान पिछले वर्ष 4500 से लेकर 5000 तक बिकी थी आज उसकी कीमत 2200 से 2600 तक है ।
डीएपी यूरिया की किल्लत पूरे मध्य प्रदेश में हर जगह पर मुद्दा बनी हुई है ।
रेवड़ी कल्चर के कारण मजदूरी भी बड़ गई है और कृषि उपकरण से लेकर कीटनाशक बीज बिजली की कीमतों में भी बहुत उछाल आया ।
कम रेट के कारण किसान धान नहीं बेच पा रहा है जिससे उसे कई जगह पर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ।
इस स्थिति पर सामान्य किसान भगवान भरोसे किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहा है ।
पूरा किसान समाज आज पीड़ा और परेशानी से जूझ रहा है ।
किसान को सम्मान निधि नहीं बाजिब दाम और संसाधनो की आवश्यकता है ।
हर राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा पत्र में किसान को लेकर तरह-तरह के बादे किए जाते हैं और हर भाषण में किसान को खुशहाल करने एवं लागत से दोगुना मूल्य देने की बात की जाती है लेकिन किसी भी पार्टी की सत्ता आती है बह अपना घोषणा पत्र और चुनावी बादे पूरी तरीके से भूल जाती है ऐसा पिछले 75 सालों से चला आ रहा है किसान भोला भाला है जो राजनीतिक दलों की बातों में आकर लगातार घाटा खा रहा है एवं कर्ज के बोझ से दबा जा रहा है अनुमानित प्रति एकड़ किसान पर लगभग ₹200000 का कर्ज है । वह कर्ज और घाटे के चंगुल से कब मुक्त होगा यह कह पाना मुश्किल है ।
आचार्य रजनीश द्विवेदी
चिंतक एवं लेखक
यह लेखक के निजी विचार है

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