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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लोककला सांझी की प्रतियोगिता का आयोजन।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरातन और समृद्ध लोककला सांझी कला को प्रोत्साहित करने के लिए विरासत, यूनिवर्सिटी हेरिटेज रिसर्च सेंटर, शोभित विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिवर्ष की भांति सांझी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। सांझी लोककला पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण कलापक्ष है। पुरातन काल की यह कला केवल ग्रामीण अंचल के चंद घरों तक सीमित रह गई है। ऐसे में इस कला के प्रति जागरूक करने के लिए विरासत द्वारा प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्राचीन कुरु महाजनपद का केन्द्रीय भाग है। महाभारतकाल से भी इसका नाता जुड़ा हुआ है। सांझी लोककला पुरातन परम्पराओं में से एक ऐसी परम्परा है जो धीरे-धीरे हमारे बीच से लुप्त होती जा रही है। विरासत यूनिर्सिटी हेरिटेज रिसर्च सेंटर प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी सांझी प्रतियोगिता का आयोजन कर रहा है। इस प्रतियोगिता में सांझी के के परम्परागत तत्वों को ही प्रोत्साहित किया जाता है। सांझी प्रतियोगिता के लिए प्रतिभागियों को विश्वविद्यालय द्वारा जारी सम्पर्क सूत्र पर वाट्सएप अपनी सांझी के चित्र पहले या दूसरे नवरात्र तक भेजने होंगे। अपना नाम, क्षेत्र इत्यादि की जानकारी भी वाट्सएप के माध्यम से प्रेषित करनी होगी। विरासत यूनिवर्सिटी हेरिटेज रिसर्च सेंटर के समन्वयक राजीव उपाध्याय यायावर ने बताया कि सांझी एक महत्वपूर्ण लोककला है। जिस प्रकार अन्य प्रदेशों की कलाएं राष्ट्रीय फलक पर अपना स्थान बना चुकी हैं, ठीक इसी प्रकार लोककला सांझी को भी उस स्थान तक ले जाने की आवश्यकता है। किसी भी क्षेत्र की परम्परागत कलाएं उसका गौरव होती हैं, हमें अपने सांझी रूपी इस गौरव को सहेजना होगा।

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सांझी बनाने के लिए सांझी में माता के साथ टिकड़ी, तोते, चांद, तारे इत्यादि बनाए जाने की अनिवार्यता को सुनिश्चित किया गया है क्योंकि ये सब सदियों से सांझी माता के अभिन्न अंग रहे हैं। चांद तारे असीम ऊँचाई एवं स्थायित्व के प्रतीक हैं तो तोते जीवन में समृद्धता को प्रदर्शित करते हैं। ऐसे लोककला को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।

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