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कैसी होगी इक्कीसवीं सदी? युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की भविष्यवाणियां।

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• कैसी होगी इक्कीसवीं सदी? युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की भविष्यवाणियां

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अब तक लाखों वर्षों का लम्बा समय मनुष्य ने इस पृथ्वी पर रहते हुए, ज्यों-त्यों करके गुजार लिए। भले बुरे दिन भी काट लिए। उत्थान और पतन के कड़ुए-मीठे स्वाद भी चख लिए, किन्तु अगली २१ वीं शताब्दी मनुष्य जीवन के इतिहास में अभूतपूर्व होगी। उसकी झलक झाँकी प्रात कर लेना हम सभी के लिए हितकर होगा। भवितव्यता का पूर्वाभास होना बुरा नहीं अच्छा है। सर्दी, गर्मी और वर्षा के दिन निश्चित होने के कारण मनुष्य पूर्व तैयारी कर लेता है और आकस्मिक हानियों से बचकर नफे में रहता है। अगली शताब्दी अपने साथ अगणित विशेषताएँ लेकर आ रही है। वे ऐसी होंगी, जिन्हें धरती के अद्यावधि इतिहास में सर्वथा भिन्न कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।जिस परमाणु युद्ध की चर्चा इन दिनों होती रहती है, जिसकी तैयारी में समर्थ देश अपनी पूँजी खपाते चले जा रहे हैं। यदि वह कार्यान्वित हुआ तो मानवी अस्तित्व एक प्रकार से समाप्त हो जायेगा। हवा, पानी और वनस्पति में प्रदूषण और विकिरण का जहर भर जाने से इस युग के मनुष्यों और पशु-पक्षियों में से एक भी जीवित न रहेगा। सृष्टा को यदि यह सृष्टि आगे भी चालू रखने की इच्छा हुई तो ऐसे प्राणी और वनस्पति उत्पन्न होंगे, जो विष से भरे हों और विष खाने और पीने की प्रकृति बना लें। अभी आक्सीजन गैस के ऊपर जीवन निर्भर है। कार्बन को मारक माना जाता है। तब हो सकता है कि कार्बन ही जीवन बने और आक्सीजन जो समाप्त हो चुकी होगी, विष वर्ग में गिनी जाय। उन विष पायी प्राणियों और वनस्पतियों की आकृति प्रकृति कैसी होगी और वे किस स्तर की सभ्यता अपनायेंगे, यह ठीक से नहीं कहा जा सकता। सर्प, बिच्छू आदि विषैले प्राणी और कुचला, अफीम, तम्बाकू जैसे विषैले वनस्पति काम आने लगे। धरती भाप बनकर हवा में उड़ गई तब तो कहना ही क्या? इस प्रकार की संभावना और चिन्ता का कोई कारण ही न रहेगा, जिसकी चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है।

हमारा अनुमान है कि अणुयुद्ध यदि हुआ, तो वह सार्वभौम नहीं, क्षेत्रीय होगा। उतनी ही भूमि प्राणियों से रहित होगी, जिसकी पूर्ति अन्यत्र बसे हुए प्राणी कर लेंगे।

इसके बाद दूसरा खतरा वर्तमान बड़े उद्योगों, कल-कारखानों और वाहनों का है। यह सब खनिजों के सहारे चलते हैं। इनमें कोयला, तेल का ईंधन जलता है। बिजली घरों में भी इसी ईंधन की जरूरत पड़ती है। यह वर्तमान गति से खर्च होता रहा तो पचास वर्ष के भीतर ही समाप्त हो जायेगा। तब मोटरें, रेलें, कारखाने सभी बन्द होंगे। धातुओं में लोहा प्रमुख है। जिस क्रम से धातुएँ खोदी और खर्च की जाती हैं, उस अनुपात के चलते यह भी पचास वर्ष से अधिक के लायक इस धरती की परतों में नहीं है। खनिजों का विकल्प अभी नहीं सोचा जा सका। ईंधन की पूर्ति के लिए सूर्य किरणों एवं समुद्र की लहरों से ऊर्जा बनाने की बात सोची जा रही है, पर अभी उस सम्बन्ध में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। चूल्हा जलाने और खाना पकाने के लायक ईंधन किसी प्रकार उपलब्ध हो सके, तो बहुत। ऐसी होगी इक्कीसवीं शताब्दी।

बढ़ते हुए तापमान से ध्रुव प्रदेश की बर्फ गलने लगेगी और समुद्र उफनेंगे। इतने पर भी आज, जो मीठे पानी का संकट उत्पन्न हो रहा है, वह टल जायेगा। पिघली हुई बर्फ की कोई धारा मनुष्य को मिल जायेगी। सूर्य ताप घटेगा। कारण कि धुआँ ऊपर चलकर सूर्य ताप को रोकेगा। ऐसी दशा में यह भी हो सकता है, बादल कम बने और कम बरसें। ऐसी दशा में मनुष्यों को खाद्य के लिए धरती के उत्पादन से काम न चलेगा। समुद्र का पल्ला पकड़ना पड़ेगा। समुद्री घास शैवाल और जलचर मनुष्य के खाद्य का एक अंश पूरा करेंगे। समुद्रों के ऊपर तैरती हुई बस्तियाँ भी बसाई जा सकती हैं।

अणु आयुध और कारखानों का बढ़ता प्रदूषण यह दोनों मिलकर इतनी समस्याएँ पैदा करेंगे तो उन्हें सुलझाने में मनुष्य को इतनी बुद्धि खर्च करनी पड़ेगी, जितनी कि सृष्टि के आदि से लेकर अब तक मनुष्य ने कमाई और खर्च की है। उत्पादक कारखाने और दौड़ने वाले वाहन, ईंधन के अभाव में बन्द हो जाने के कारण लोग शहरों को छोड़कर देहातों की ओर भागेंगे। गृह उद्योगों से पेट भरने लायक कमा लिया जायेगा। अन्न के स्थान पर लोग आलू, शकरकन्द, प्याज जैसे कन्दों का और कद्दू, तोरई, लौकी जैसे अधिक वजन वाले शाकों का उत्पादन अधिक करेंगे। अन्न कम और शाक अधिक खाया जायेगा। कुछ घासें इस किस्म की हो सकती हैं, जो पालक, मेथी, बथुआ की तरह मनुष्य के खाने के काम आ सकें।खाने की बात इसलिए कही जा रही है कि बढ़ती हुई जनसंख्या आगे भी रुकेगी नहीं। समझदार आदमी परिवार नियोजन के तरीके अपनायेंगे भी, पर अनगढ़ और पिछड़े लोगों पर कोई असर न पड़ेगा। वे अन्धाधुन्ध बच्चे पैदा करते ही चले जायेंगे। समुचित आहार न मिलने से प्रसव काल में स्त्रियाँ और कुपोषणग्रस्त बच्चे, बेतहाशा मरेंगे। इतने पर भी जनसंख्या बढ़ती ही जायेगी। वृक्ष काटने पर प्रतिबन्ध लगेगा। इसलिए ज्यों-त्यों करके चूल्हें जलाने लायक ईंधन की ही समस्या हल हो पायेगी।बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए निवास की छाया तो चाहिए ही। यह अन्न उगाने वाली जमीन में से ही कटौती होगी। मनुष्य कन्द, शाक और घास के साथ थोड़ा अन्न मिलाकर ही पेट भरने की तरकीब निकालेंगे। जनसंख्या संसार की अभी ५०० करोड़ है। सन् २००० ई. समाप्त होते होते यह १००० करोड़ और इसके ५० वर्षों बाद ५००० करोड़ हो जायेगी। अर्थात् अब की दस गुनी बढ़ जायेगी। इस बढ़ी हुई आबादी के जीवन निर्वाह की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए पशुओं का आदि से अन्त तक सफाया होगा। न भैंस बचने वाली है न बकरी। न कहीं दूध के दर्शन होंगे और न ही पशु श्रम से खेती या परिवहन का काम लिया जा सकेगा।पशुओं के रहने के लिए और उनके लिए चारा उगाने के लिए जितनी जमीन घिरती है, उतनी में नौ आदमी गुजर कर सकते हैं। माँस खा सकना संभव न होगा और न ही दूध खा सकना। जो चारा पशु खाते हैं, उसे कूटकर लकड़ी बन जायेगी। उससे फर्नीचर ईंधन आदि का काम चलेगा। चमड़ा नकली बनने लगा है। ऐसी दशा में मनुष्य की प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता पशुओं से होगी। इस लड़ाई में पशु हार जाएगा और उसका अस्तित्व कहीं चिड़ियाघरों में ही देखने को मिलेगा। जमीन पर से उसे बेदखल कर दिया जायेगा।चाय आदि के लिए, बच्चों के लिए दूध की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके लिए तिल, मूँगफली, सोयाबीन जैसी सफेद रंग की तिलहनों को पानी में पीस लिया जाया करेगा। माँसाहारियों के लिए जलचर ही उस हालत में मिल सकेंगे, जबकि प्रदूषण के कारण जल भी जहरीला होने से बच जाय और वे उस पानी में जी सकें। पक्षियों की आयु अभी एक शताब्दी और आगे तक चल सकती है।रहने के मकान हलकी सीमेन्ट सीटों से ऐसे बनेंगे जो एक जगह से उठाकर दूसरी जगह ले जाया जा सके। कीमती, भारी और अधिक जगह घेरने वाले मकान सरकारी इमारतों या किन्हीं बड़े दफ्तरों के रूप में ही रहेंगे। शेष टेन्टनुमा मकानों में गुजारा करेंगे।खाने पकाने में चपाती किस्म की रोटी बहुत ईंधन जलाती है और बहुत समय खराब करती है, इसलिए ईंधन की कमी को ध्यान में रखते हुए भाप से उबले प्रेशर कुकर स्तर के चूल्हें बनेंगे और मनुष्य भी उसी प्रकार का भोजन करने की आदत डाल लेगा।जमीन कम पड़ती जाने के कारण हलके मकान भी दुमंजिले, तिमंजिले बनेंगे और खेती बाड़ी के लिए भी यही पद्धति अपनाई जायेगी। अभी भी बुद्धिमान लोग घरेलू शाक वाटिका लगाते हैं। आँगन बाड़ी, छत बाड़ी लगाकर बेलें तथा दूसरी खाद्य वस्तुएँ उगाते हैं। आजकल यह शौकिया होता है। अगली शताब्दी में यह अनिवार्य आवश्यकता समझी जायेगी।शिक्षा के लिए उतने विद्यालयों की जरूरत न पड़ेगी। बच्चा पैदा करने का लाइसेन्स उन्हीं माता पिताओं को मिलेगा, जो उनका भरण पोषण ही वयस्क होने तक न करें, वरन् शिक्षा भी प्राथमिक स्तर की घर पर ही दिया करें। चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, कारीगर स्तर की विशेष शिक्षा के लिए ही सरकारी विद्यालय रहेंगे। वे भी किस्तों में चलेंगे, एक वर्ष या दो वर्ष के पाठ्यक्रम होंगे। सुविधानुसार एक के बाद दूसरी कक्षा उत्तीर्ण की जा सकेगी। इस बीच अध्ययन आदि के लिए पढ़ने के बीच-बीच में कुछ कमाया भी जा सकेगा।

स्त्री और पुरुषों का भेद भाव प्रायः समाप्त हो जायेगा। दोनों की हैसियत एक होगी। दोनों उपार्जन करेंगे। लार्जर फैमिली स्तर के बड़े-बड़े कम्यून बने रहेंगे, उसी में एक बढ़े समुदाय के लिए खाना पकाने, कपड़ा धोने, चौकीदारी करने, बच्चे खिलाने आदि के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था रहेगी। आज जैसे एक स्त्री की खाना पकाने, चौकीदारी, सफाई, कपड़ा धोने, बच्चे पालने में जिन्दगी खप जाती है, कम्यून बन जाने पर यह कार्य किसी एक महिला को न करने पड़ेंगे। यह कार्य सामुदायिक होंगे। इनकी व्यवस्था रहने से किसी स्त्री को घर के बंधन में बँध कर न रहना पड़ेगा। जनसंख्या में आधी संख्या महिलाओं की है, वे छोटी गृहस्थी होने पर भी पूरी तरह बँधुआ की तरह घिरी रहती है। तब लार्जर फैमिली में पन्द्रह नर-नारियों के पीछे एक कर्मचारी का औसत पड़ेगा। ईंधन की बचत तो इसमें प्रत्यक्ष ही है। मार्केटिंग करने में सारा दिन गुजर जाता है। जब यदि किसी को किसी वस्तु विशेष की आवश्यकता पड़ी तो सहकारी स्टोर से प्राप्त करने में कुछ ही मिनट लगा करेंगे।बड़ी हुए जनसंख्या पद्धति में केवल साम्यवादी शासन प्रणाली सफल हो सकती है। राजतन्त्र, प्रजातन्त्र आदि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता देने वाले विधान, खींचतान करते रहेंगे और व्यक्तिगत सम्पदा अथवा आधिपत्य होने से अपराधों का वह सिलसिला चलता ही रहेगा, जिससे अनर्थ होते हैं और अवांछनीय व्यक्तियों को पकड़ने के लिए पुलिस, न्यायालय, जेल आदि की खर्चीली व्यवस्था करनी पड़ती है। तब उद्दण्ड व्यक्तियों को ऐसी प्रताड़ना सार्वजनिक स्थानों पर दी जायेगी, जिससे अन्य लोगों को वैसा करने की हिम्मत न पड़े। समाज से बहिष्कृत स्तर के जीवनयापन कुछ समय के लिए कराया जाय, तो वह भी बन्दीगृह की अपेक्षा अधिक कारगर दण्ड होगा।साहित्य लेखन और प्रकाशन विद्वानों का एक तन्त्र करेगा। कोई भी कुछ भी लिखे और पढ़ने वालों का दिमाग खराब करे, यह छूट हर किसी को न मिलेगी। लेखन, विशेषज्ञ करेंगे, प्रकाशन सरकार या सहकारी समिति। ऐसी दशा में लागत से कुछ ही अधिक मूल्य में ज्ञानवर्धक साहित्य हर किसी को सर्वत्र उपलब्ध हो जाया करेगा। संसार भर की एक भाषा होगी। इस प्रकार मनुष्य मात्र को आपस में विचार विनिमय कर सकना सरल पड़ेगा। प्रेस की अत्यन्त सुविधा हो जायेगी। सर्व साधारण को ज्ञानार्जन में तनिक भी कठिनाई न होगी। किसी भी क्षेत्र में उत्पादित हुआ ज्ञान विज्ञान संसार भर में फैलते कुछ भी विलम्ब न लगेगा।

संसार भर में एक ही विश्व शासन व्यवस्था चलेगी। क्षेत्रों को भौगोलिक सुविधा के लिए ही देशों में बाँटा जा सकेगा। उनकी हैसियत आज के जिलों जैसी होगी। लड़ाई-झगड़े तलवार के जोर से नहीं, वरन् न्यायालयों के निर्देशन से तय होंगे। अलग-अलग देश अलग-अलग सेनाएँ न रखेंगे। स्थानीय व्यवस्था के लिए छोटी-छोटी पुलिस भर राज्यों के पास रहेगी। बड़ी सेना मात्र विश्व राष्ट्र के केन्द्रीय शासन के पास ही रहेगी, ताकि कहीं विप्लव जैसी स्थिति हो तो उसे सँभाला जा सकेगा। धर्म भी एक ही रहेगा। उसे नीति शास्त्र समझा जा सकता है। परम्पराएँ जो मानव मात्र के हित में होंगी, वही रहेंगी। पूर्वजों के प्रचलनों को कहीं महत्त्व न दिया जायेगा। प्रथा-परम्पराओं का एक नए सिरे से निर्धारण होगा, ताकि बिखराव के अवसर कम से कम रहें। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोई दावेदारी न करे, नए त्यौहार, नई परम्पराएँ इस आधार पर विनिर्मित होगी, जिनसे बिखराव, भेदभाव को आश्रय न मिले, एकता, समता का ही वातावरण बने।समूचा संसार विश्व राष्ट्र होगा। मनुष्य मात्र को धरती का पुत्र अथवा विश्व नागरिक माना जायेगा। आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं होंगे, पर घनी और विरल आबादी की असमानता न हो, इसका ध्यान रखा जायेगा। धरती के उत्पादनों का उपयोग सभी मनुष्य समान रूप से कर सकेंगे।

इक्कीसवीं सदी इन सम्भावनाओं से भरी पूरी है। विग्रही यदि चाहें तो रक्तपात कर लें। समझदारी को महत्त्व मिले, तो मिल-जुलकर सहयोगपूर्वक ऐसा विधान बना लें, जिससे देश-देश के बीच आये दिन छिड़ते रहने वाले युद्धों और रक्तपातों की कोई आवश्यकता न रहे। अणु आयुधों से समग्र बर्बादी अथवा हिल मिलकर रहने, मिल बाँटकर खाने और हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने की व्यवस्था सोच विचार कर कर लें।युद्ध टाले जा सकते हैं, पर बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाने में बीसवीं सदी के अन्त तक सम्भावना नहीं दीखती, क्योंकि पिछड़ापन लोगों के दिमागों पर बेतहाशा छाया हुआ है और वे अनुभव करते हैं या नहीं करते कि धरती में बढ़ते हुए लोगों का बोझ वहन करने की क्षमता रह नहीं गई है। इन दिनों में प्रजनन, सौभाग्य का कारण माना जाता है, पर अगली शताब्दी में वह देश द्रोह, मानव द्रोह की गणना में गिना जायेगा, दण्डनीय अपराध माना जायेगा।

यों विकट सम्भावना तो प्राकृतिक कारणों से औद्योगीकरण से, युद्ध की तैयारी से भी हुई है। वातावरण में अनेक कारणों से विषाक्तता भर गई है और मनुष्य की प्रकृति हीन एवं हेय स्तर की बन गई है। इन सबके उपचार हैं तो कठिन, पर दूरदृष्टि बताती है कि उन पर काबू प्राप्त कर लिया जायेगा। सृजन शक्तियाँ उभरी है और उन विडम्बनाओं, विभीषिकाओं से लोहा लेकर सन्तुलन बिठा लेंगी। युद्ध भी शायद बड़े रूप में न हों, कहीं क्षेत्रीय विग्रह होकर रुक जाय, जैसा कि जापान के बाद अब तक दूसरी बार अणु प्रहार नहीं हुआ।बड़ी बात एक ही है, बहुप्रजनन। मनुष्य को इस मूर्खता से विरत करना पड़ेगा। इसके लिए समझाने-बुझाने की विद्या शायद काम न दे और कानूनी प्रतिबंधों से रोकथाम करनी पड़े। व्यक्तिगत जीवन में भी शासन को हस्तक्षेप करना पड़े, यह बुरी बात है। नागरिक कर्तव्यों का हर मनुष्य को ज्ञान होना चाहिए और सोचना चाहिए कि बहुप्रजनन को अपने विवेक से ही रोक दिया जाय, ताकि उस कारण सारा संसार मुसीबत में न फँसे। न मानने पर प्रतिबंधों का हन्टर तो चूतड़ों पर पड़ेगा ही।

इक्कीसवीं सदी में समूची मनुष्य जाति को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, यह जानकारी दूरदर्शिता ने दी है, पर साथ ही यह भी कहा है कि अभी इतना समय बाकी है कि इनका हल करने के लिए अभी से प्रयास आरम्भ कर दिया जाय, तो एक बारगी बड़ी विपत्ति का सामना करने और हड़बड़ी उत्पन्न होने से बचा जा सकता है। अगला समय समूची मानव जाति की यह परीक्षा करेगा कि विकट सम्भावनाओं का सामना और समाधान करने लायक उसमें बुद्धि है या नहीं। यदि वह असफल रह गया, तो सर्वनाश का सामना करना पड़ेगा और मानवीय बुद्धि दिखावटी और ओछी मानी जायेगी।

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