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बीकानेर-आचार्य श्री तुलसी अणुव्रत आंदोलन समाज सुधार का सशक्त माध्यम है। : कालवा

सवांददाता मीडिया प्रभारी मनोज मूंधड़ा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़

आचार्य श्री तुलसी अणुव्रत आंदोलन समाज सुधार का सशक्त माध्यम है। : कालवा

श्रीडूंगरगढ़ कस्बे की ओम योग सेवा संस्था के निदेशक योगाचार्य ओम प्रकाश कालवा ने सत्यार्थ न्यूज चैनल पर 74 वां अंक प्रकाशित करते हुए आचार्य श्री तुलसी के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया। आचार्य तुलसी का जन्म 1914 में लाडनूं (राजस्थान) में हुआ था, वे 1925 में साधु बने और 1936 में तेरापंथ संप्रदाय के आचार्य बने। उन्होंने 776 से अधिक साधुओं/साध्वियों को दीक्षा दी। वे एक कुशल कवि, 100 से अधिक पुस्तकों के लेखक और एक प्रतिष्ठित धार्मिक नेता भी रहे हैं। आचार्य तुलसी ने 1949 में अणुव्रत आंदोलन की शुरुआत की थी।। उनके पिता का नाम झुमरलाल खट्टड़ और माँ का नाम वंदना था। उन्होंने आठ वर्ष की आयु में विद्यालय जाना आरम्भ किया। उनके पाँच भाई तथा तीन बहनें थी जिन में वे सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई चम्पालालजी पहले ही मुनि बन गए थे। उनके पारिवारिक लोग सहज धर्मानुरागी थे। वंदना जी की विशेष प्रेरणा-स्वरूप घर के सभी बच्चे सत्संग आदि में आया करते थे। उनके मन में बचपन से ही सत्संग व साधु-चर्या के प्रति अनुराग था। अष्टम आचार्य श्री कालूगणी का आगमन लाडनूं मे हुआ। पूज्य श्री कालूगणी के दिव्य प्रवचन तथा व्यक्तित्व ने बालक तुलसी के पूर्व अर्जित संस्कारो को जागृत कर दिया। उनके मन में मुनि-जीवन के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ।

अणुव्रत

-अणुव्रत का शाब्दिक का अर्थ होता हैं “लघु संकल्प”। 1 मार्च 1949 को राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में अणुव्रत आंदोलन का प्रारंभ तेरापंथ जैन संघ के आचार्य तुलसी ने किया। आचार्य तुलसी के अनुसार अणुव्रत आंदोलन व्यवहार की शुद्धि, नैतिकता, प्रामाणिकता और संयम का आंदोलन हैं। और ये तत्व समाजवाद की स्थापना के लिए अनिवार्य हैं।
दिवा स्वप्नदृष्टा गणाधिपति तुलसी का संपूर्ण जीवन महान अवदानों का प्रदाता रहा। अनैतिकता, भ्रष्टाचार, हिंसा एवं आतंक जैसी विषमताओं को दूर करने हेतु उनके अवदान वरदान बने। अणुव्रत : भारत की बाह्य स्वतंत्रता को अभिशाप बनने से बचाने के लिए गुरुदेव तुलसी ने ‘अणुव्रत आंदोलन’ का सिंहनाद किया। यह समाज सुधार का सशक्त माध्यम है।

निवेदन

ओम योग सेवा संस्था श्री डूंगरगढ़ द्वारा जनहित में जारी।

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