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महराजगंज : मोबाइल के युग में खो गईं “वो चिठ्ठियाँ”,जिसमें दिलों के एहसास,उन काली स्याही में छुपे होते थे।

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• मोबाइल के युग में खो गईं “वो चिठ्ठियाँ”,जिसमें दिलों के एहसास,उन काली स्याही में छुपे होते थे।

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महराजगंज, आज इस आधुनिकता के दौर में,और डिजिटल क्रांति ने एक बूंद काली स्याहियों में छिपी दिल का हर ओ एहसास,हर ओ दास्तां गुम हो गईं।जो बड़ी सादगी,स्नेह और विश्वास से लबरेज हो सिर्फ अपनों के प्यार की मिठास और छोटों को जीवन की शुभकामनाएं एक हल्के नीले से पन्नों में बसाए जाते थे।जिन्हे पाने वाले/पढ़ने वाले बड़ी जतन से घर की आलमारियों के एक कोने में सहेज कर रखते जरूर थे,लेकिन उन काली स्याहियों की एक – एक बूंद से लिखी दिल की एहसास, खास उनके दिलों में एक मिठास की तरह वर्षों भीगती रहती थीं।लेकिन आज इस मॉडर्न युग कहें या मोबाइल युग या यूं कह लें की डिजिटल क्रांति के युग में कहां “खो सी गईं वो हल्के नीले पन्नों वाली चिठ्ठियाँ”,जिसमें “लिखने के सलीके” छुपे होते थे।

“कुशलता” की कामना से शुरू होते थे अक्षर,बडों के “चरण स्पर्श” पर खत्म होते थे।

“और बीच में लिखी होती थी तो सिर्फ और सिर्फ “जिंदगी” की एक लंबी सी दास्तां,चाहे बेटा – बेटी की शादी की चर्चा हो या जिंदगी की तरक्की की हो बात या फिर माता – पिता के अच्छे परवरिस की बात चाहे बूढ़ी अम्मा के दवाई की बात।बस सब एक ही हल्के नीले पन्नों में सिमट कर रह जाती थीं,दिल की एक अधूरी दास्तां जो अंतिम एक लाइनों में जरूर सिमटती – पिता जी/माता जी/बड़े भैया जी आगे क्या लिखूं वक्त नहीं है,बाकी सब ठीक है,आगे ईश्वर की मर्जी,बाकी तो आप सब लोग काफी समझदार हैं।छोटों को दुलार जरूर दीजियेगा और बूढ़ी अम्मा का ख्याल जरूर रखिएगा…

“मिट्टी के दीयों की लौ” की टिमटिमाती लाल रोशनी में चिट्ठी पढ़ते – पढ़ते दिलों की ओ एहसास अपनों की आंसुओं में बूंद – बूंद से दिलों को एहसास कराते अक्षर सिमट कर कहां तक दास्तां को बखानते…?

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नन्हें के आने की “खबर”

“माँ” की तबियत का दर्द

और पैसे भेजने का “अनुनय”

“फसलों” के खराब होने की वजह

कितना कुछ सिमट जाता था बस एक

“हल्के नीले कागज के एक पन्नों में”

जिसे नव विवाहित दुल्हनें चूड़ियों की खन – खनाती,पायलों की छन छनाती मधुर आवाजों संग भाग कर “सीने” से लगातीं उन हल्के नीले पन्नों वाली अपनों की चिट्ठी

और घर के एक कोने में “अकेले” में बैठ आंखो से बहाती अपनों की खातिर मोतियों जैसी आंसुओं की बूंदें…

“माँ” की आस थी “पिता” का संबल था

बच्चों का भविष्य थी और

गाँव की गौरव थीं ये “चिठ्ठियां”

“डाकिया चिठ्ठी” लायेगा कोई बाँच कर जरूर अपनों का हाल सुनायेगा

देख – देख चिठ्ठी को कई – कई बार छू कर चिठ्ठी को अनपढ़ भी अपनों के “एहसासों” को बखूबी पढ़ लेते थे…लेकिन अब तो क्या कहें,स्मार्ट फोन की “स्क्रीन” पर अंगूठा नाचता रहा है…

और अक्सर ही चंद वक्त के लम्हों में दिल तोड़ देता है

“मोबाइल” का स्पेस भर जाए तो

सब कुछ दो मिनट में “डिलीट” भी हो जाता है…

अब तो सब कुछ “सिमट” कर रह गया है मात्र 06 इंच के स्मार्ट फोन के स्क्रीन में

जैसे आज “मकान” सिमट गए हैं फ्लैटों में

जज़्बात सिमट गए हैं “मैसेजों” में

“चूल्हे” सिमट गए L.P.G.गैसों में और

इंसान सिमट गया है आज केवल पैसों में…

एक बार दिल की गहराई से जरूर विचार करें…

सत्यार्थ वेब न्यूज

शिवरतन कुमार गुप्ता “राज़”

Mon.9670089541

महराजगंज 29/07/024

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