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बीकानेर -चुम्बक चिकित्सा भी असाध्य रोगों में उपयोगी है।जानिए योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा के साथ।

न्यूज रिपोर्टर मीडिया प्रभारी मनोज मूंधड़ा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़

चुम्बक चिकित्सा भी असाध्य रोगों में उपयोगी है।जानिए योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा के साथ।

श्रीडूंगरगढ़ कस्बे की ओम योग सेवा संस्था के निदेशक योग प्रशिक्षक ओम प्रकाश कालवा ने सत्यार्थ न्यूज चैनल पर 49 वां अंक प्रकाशित करते हुए चुंबक चिकित्सा के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया।

चुम्बकीय चिकित्सा ( Magnetic Therapy ) –

प्राचीन काल के आर्य लोग चुंबक को आशमा या अश्म या सिक्तावली कहते थे और इसके विशेष गुण लोहे को आकर्षित करने वाली शक्ति से भलीभांति परिचित थे । इसके अतिरिक्त वे मानते थे कि अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने की शक्ति भी इसमें है । तभी तो अथर्ववेद के भाग 1 खण्ड- 1. सुक्त 17 के मंत्र 3 और 4 में उल्लेख है कि शरीर में रक्त बहने का इलाज किस प्रकार बालू से बनी वस्तु मितावली की सहायता से किया जाता है!अथर्ववेद के ही भाग 1,खंड -7 सूक्त – 35 , के मंत्र – 2 और 3 मैं इस बात का उल्लेख है कि विशेष पत्थरों अश्म की सहायता से किस प्रकार दुखियों के रोगों का निदान संभव है । चिकित्सा शास्त्र के ही प्राचीनतम् ग्रंथ आयुर्वेद के साहित्य में चुंबक के लिए लोह कांत शब्द लिखा है आधुनिक युग में चुंबक की खोज ईसा से कई वर्षों पहले हुई जैसे आज से लगभग 2500 वर्ष पहले मैग्रेज नामक एक गडरिये ने माउंट पर घूमते हुए देखा कि उसकी लाठी जिसके सिरे पर लोहे की टोपी लगी थी एक पत्थर से चिपक गई और उसके जूते के नीचे लगी कीलें भी पत्थर से चिपक गई है फलस्वरूप उसका चलना मुश्किल हो गया उस समय इस पत्थर को लोड स्टोन के नाम से जानते थे । मैग्रेज द्वारा इसकी लौह आकर्षण शक्ति का पता लगाने के कारण इस पत्थर का नाम मैग्रेट रख दिया गया!दूसरा कथन है कि बहुत समय पहले एशिया माइनर के क्षेत्र में मैग्रीशिया में गहरे रंग का कच्चा लोहा मिलता था जिसमें मुख्य रुप से लोहा और ऑक्सीजन होता था चूंकि गहरे रंग के लोहे में सामान्य लोहे को खींच लेने की या उसमें चिपकने की शक्ति बी फलस्वरूप उस प्रदेश के नाम पर इसका नाम मैग्नेटाइज कर दिया गया 800 वर्ष ईसा पूर्व यूनान के लोग मैग्रेट को चकमक पत्थर के नाम से पुकारते थे!महान दार्शनिक अरस्तु,अफलातून और होमर के ग्रंथ में भी इसकी चर्चा है!अब चीन के नाविकों को इस बात का पता चला की प्रकृति में पाए जाने वाले इस पत्थर से दिशा निर्देश का भी काम ले सकते हैं,तो उन्होंने अथक परिश्रम के पश्चात एक दिशा सूचक यंत्र बना डाला जिसकी सहायता से वे समुद्र में अपना रास्ता खोज लेते थे! इसलिए इन्होंने इसका नाम दिशा निर्देशन पत्थर रखा स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध कोमियागार डॉक्टर और रहस्यवादी , फिलिपन,औरेथोलोम,पैरासेल्स ( 1493- 1541 ) ने चुंबक के इतिहास में बड़ा नाम कमाया!उन्होंने चुंबक की विशेष शक्तियों से रोग दूर करने की शक्ति का पहली बार वर्णन किया उन्होंने लिखा है कि चुंबक विशेष रूप से सूजन एवं त्वचा के छिलने में अंतडियों एवं गर्भाशय के रोगों में और इसके अतिरिक्त शरीर के बाहरी और अंदरूनी अनेक व्याधियों को दूर करने में सहायता देता है!आधुनिक चुंबक चिकित्सकों ने कई शताब्दी पूर्व लिखी उनकी यह बातें अक्सर सही पायी अपने समय के प्रसिद्ध डॉक्टर विलियम गिल्बर्ट ( 1540 1603 ) जो महारानी एलिजा बेथ प्रथम के डॉक्टर भी थे वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विद्युत और चुंबकत्व का वैज्ञानिक अध्ययन किया उन्होंने सबसे पहले बताया कि पृथ्वी एक बहुत बड़े चुंबक के समान है जिसको प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कई प्रयोग किये जैसे उन्होंने एक लोहे की छड़ भूमि में गाड दी जिसका एक सिरा उत्तर की और एक दूसरा सिरा दक्षिण की ओर था और उस पर हथौड़े लगाएं फल स्वरुप पृथ्वी के प्रभाव से उसमें चुंबकत्व आ गया आदि प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे ( 1867-1971 ) की उपलब्धियां महत्वपूर्ण है । उनकी पहली उपलब्धि यह है कि उन्होंने इस बात का प्रमाण दिया कि बिजली करेंट के आसपास चुंबकत्व होता है!शोध रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने चुंबक विज्ञान पर 16000 से अधिक प्रयोग किये । अपने देश भारत में चुंबकत्व रसायन शाख के सिद्धांतों और उसके प्रयोग के बारे में सबसे पहला ग्रंथ 1935 में डॉक्टर शांति स्वरूप भटनागर एवं डॉक्टर के . एन . माथुर ने लिखा उन्हें इस काम पर एक पुरस्कार भी दिया गया था । जीव चुंबकत्व के सिद्धांत अनुसार खोजी गई चुंबक चिकित्सा प्रणाली द्वारा विभिन्न रोगों पर अनेक सफल प्रयोग आज न केवल अमेरिका,रूस एवं जापान जैसे देशों में बड़े पैमाने पर किये जा चुके हैं । अब अपने देश में भी अनेक वैज्ञानिक डॉक्टर,योगी एवं प्राकृतिक चिकित्सक भी इसका उपयोग चिकित्सा हेतु करने लगे हैं ।

चुम्बक के प्रकार- चुम्बक को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा गया है ।
1.प्राकृतिक चुम्बक

-( लोड स्टोन ) प्रकृति में खनिज के रूप में मिलते हैं जिसकी प्राथमिक पहचान लोहे को आकर्षित करने की शक्ति से की जाती है!उन प्राकृतिक चुंबको की शक्ति क्योंकि एक समान रहती है अर्थात उसे पटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता है । इस कारण चुंबक चिकित्सा में प्राकृतिक चुबकों का प्रयोग युक्ति युक्त ढंग से करना संभव नहीं है । किंतु कृत्रिम चुंबक जिसे मानव ने इस प्रकार से तैयार किया हो कि यह चुंबक विभिन्न शक्ति के और अनेक आकार प्रकार के हो चुंबक चिकित्सा में इन्हीं कृत्रिम चुंबकों का प्रयोग किया जाता है ।

2.कृत्रिम चुम्बक ( आर्टिफीशियल मैग्नेट ) इसे मुख्य दो वर्गों में बांटा गया है ।

1.स्थाई चुंबक ( परमानेंट मैग्रेट ) एक बार बन जाए तो उनकी शक्ति सदा बनी रहती है । इसी कारण इसका नाम स्थाई चुंबक है । यदि इन्हें संभाल कर रखा जाए तो वह 100 वर्ष या उससे अधिक भी चल सकती है ।

2.बिजली के चुम्बक ( टेंपरेरी चुंबक ) उस समय काम करते हैं जब उसमें बिजली का प्रवेश किया जाता है । बिजली के चुंबकों का प्रयोग जहाजों में लोहे का सम्मान लादने वा उतारने के लिए क्रेनों के माध्यम से किया जाता है चुंबक का प्रयोग गाड़ियों में चुंबकीय ब्रेक के अतिरिक्त एंपलीफायर,आर्मेचर,घंटियों,रेडियो,दूरसंचार,ट्रांसफार्मरों में भी होता है ।

नोट

इस चिकित्सा का लाभ लेने के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहारा ले।

निवेदन

ओम योग सेवा संस्था श्री डूंगरगढ़ द्वारा जनहित में जारी।

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