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विकास खण्ड मरवाही के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय उषाढ़ के प्राचार्य पुरुषोत्तम दास वैष्णव को सेवानिवृत्ति होने पर छात्र-छात्राओं और पालकों ने दी भावभीनी विदाई,

विकास खण्ड मरवाही के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय उषाढ़ के प्राचार्य पुरुषोत्तम दास वैष्णव को सेवानिवृत्ति होने पर छात्र-छात्राओं और पालकों ने दी भावभीनी विदाई,

सूरज यादव,उषाढ़/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय उषाढ़ का प्रांगण मंगलवार को भावनाओं के ज्वार से भर गया, जब संस्था के स्तंभ माने जाने वाले प्राचार्य पुरुषोत्तम दास वैष्णव को पूरे सम्मान के साथ सेवानिवृत्ति पर विदाई दी गई। शिक्षा के मंदिर में अपना जीवन समर्पित करने वाले वैष्णव सर के सम्मान में आयोजित भव्य समारोह में छात्र-छात्राएं, शिक्षक, पालक और ग्रामीण सभी की आंखें नम थीं। विद्यालय परिवार ने अपने प्रिय प्राचार्य को शॉल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह और भावभीने उपहार भेंट कर उस रिश्ते को सलाम किया, जो केवल गुरु-शिष्य का नहीं बल्कि एक पिता और बच्चों जैसा था।

श्री पुरुषोत्तम दास वैष्णव का कार्यकाल उषाढ स्कूल के लिए किसी स्वर्ण युग से कम नहीं रहा। जिस स्कूल को उन्होंने संभाला, उसे अनुशासन, संस्कार और शैक्षणिक गुणवत्ता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके नेतृत्व में विद्यालय ने बोर्ड परीक्षाओं में शानदार परिणाम दिए तो खेल और सांस्कृतिक मंचों पर भी जिला स्तर पर परचम लहराया। गांव के बुजुर्ग आज भी याद करते हैं कि कैसे वैष्णव सर सुबह स्कूल के गेट पर खुद खड़े होकर देर से आने वाले बच्चों को टोकते थे और छुट्टी के बाद कमजोर बच्चों को रोककर एक्स्ट्रा क्लास लेते थे। उनके लिए शिक्षण कभी नौकरी नहीं बल्कि तपस्या थी। समारोह में एक पूर्व छात्र ने मंच से कहा कि सर की छड़ी का डर और उनके हाथ का आशीर्वाद दोनों ने ही हमारा जीवन बनाया है।

विदाई की इस बेला में उनके साथी शिक्षकों का गला भी रुंध गया। वरिष्ठ शिक्षकों ने मंच से कहा कि प्राचार्य जी का जाना संस्था के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी समय की पाबंदी, काम के प्रति निष्ठा और हर बच्चे को एक समान नजर से देखने का भाव हम सबके लिए पाठशाला था। वे ऑफिस में बॉस थे, लेकिन स्टाफ रूम में बड़े भाई और बच्चों के बीच एक दोस्त की तरह रहते थे। उनके जाने के बाद प्राचार्य कक्ष की कुर्सी ही नहीं, पूरे स्कूल का एक कोना सूना हो जाएगा।

खुद प्राचार्य पुरुषोत्तम दास वैष्णव भी इस प्रेम और सम्मान को देखकर अपने आंसू नहीं रोक पाए। माइक संभालते ही उनका आंख भर आया। उन्होंने कहा कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि शिक्षण को पेशा बनाऊंगा, यह तो मेरा जीवन बन गया। उषाढ़ के इस स्कूल की मिट्टी, यहां के बच्चों की शरारतें और आप सबका प्यार मेरी सबसे बड़ी कमाई है। मैं जा रहा हूं लेकिन मेरी दुआएं हमेशा इस विद्यालय के साथ रहेंगी। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे बाद भी यहां के शिक्षक शिक्षा की इस लौ को और तेज करेंगे। उनके इतना कहते ही पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा और कई छात्राएं सिसकियां लेकर रो पड़ीं।

इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए पूरा उषाढ़ गांव उमड़ पड़ा था। समारोह में जन भागीदारी समिति के अध्यक्ष पंचम दास, उपाध्यक्ष रामदेव, सदस्य राजेश मिश्रा, गौरी प्रसाद, राजू प्रसाद शर्मा, जनपद पंचायत सदस्य रामबाई मरावी, ग्राम सरपंच राजकुमारी पाव विशेष रूप से मौजूद रहे। साथ ही वैष्णव सर के पुराने साथी ए.के. वर्मा और डी.एस.कंवर सहित आसपास के स्कूलों के प्राचार्यों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम का संचालन शिक्षक जगत राम साहू ने बेहद गरिमामयी तरीके से किया, जबकि कमलभान सिंह मरकाम, जयप्रकाश चंद्रा, मनोज पात्रे, प्रियंका विश्वकर्मा, अनदीप बघेल, भागवत जांगड़े, चिरंजीव कोसले, प्रमिला दिवाकर, श्रेयस श्रीवास्तव, नवरीन खान, संतराम बैगा और उमा पाव ने व्यवस्था संभाली।

कार्यक्रम के अंत में जब ढोल-नगाड़ों के साथ प्राचार्य वैष्णव को उनके घर तक विदा किया गया तो रास्ते भर लोग उनके साथ चले। उषाढ ने आज अपने उस गुरु को विदा किया जिसने गांव की तीन पीढ़ियों को पढ़ाया। विद्यालय परिवार और समस्त ग्रामवासियों ने उनके स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना की है। यह विदाई नहीं थी, यह एक युग के प्रति कृतज्ञता का उत्सव था।

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