मां कंकाली धाम तिगंवा : 1500 साल पुरानी गुप्तकालीन विरासत, आस्था, रहस्य और प्राचीन शिल्पकला का अनूठा संगम
चैत्र नवरात्र विशेष रिपोर्ट

कटनी। चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर बहोरीबंद विकासखंड के छोटे से गांव तिगंवा (जिसे तिगवा या तिगवान भी कहा जाता है) इन दिनों धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का प्रमुख केंद्र बन गया है। जिला मुख्यालय कटनी से लगभग 55 किलोमीटर और बहोरीबंद से मात्र 4-5 किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन गांव गुप्तकाल (लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी, यानी करीब 1600 वर्ष पुराना) की विरासत को समेटे हुए है। यहां के मां कंकाली देवी मंदिर को भारत के सबसे प्राचीन जीवित हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहां मां कंकाली के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। सुबह से शाम तक मंदिर परिसर में भक्तों की निरंतर आवाजाही रहती है।

यह मंदिर गुप्तकालीन स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है, जो उस स्वर्ण युग की परिपक्व वास्तुकला, शिल्पकला और धार्मिक सहिष्णुता की कहानी बयां करता है। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित था, लेकिन समय के साथ इसमें देवी पूजा की परंपरा प्रबल हो गई। आज यह मां कंकाली (काली या चामुंडा रूप) के रूप में पूजा जाता है। मंदिर परिसर में बिखरे खंडित अवशेष बताते हैं कि यहां कभी लगभग 36 मंदिरों का विशाल परिसर था, जिनमें से अधिकांश 19वीं शताब्दी में रेलवे निर्माण के लिए तोड़ दिए गए। केवल यह एक मंदिर ही अपेक्षाकृत सुरक्षित बचा है और अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
मंदिर की वास्तुकला और विशेषताएं

मंदिर पत्थरों से निर्मित है। इसका गर्भगृह लगभग 12 फीट 9 इंच (या 12.75 फीट) वर्गाकार है। बाहरी माप लगभग 12.5 फीट x 12.5 फीट और आंतरिक लगभग 8 फीट x 8 फीट है। छत पूरी तरह सपाट है — यह गुप्तकालीन मंदिरों की प्रमुख पहचान है। मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुंह किए है, हालांकि प्रवेश द्वार पूर्व से लगभग 13 डिग्री विचलित है, जो संभवतः किसी नक्षत्र से जुड़ा हो।
मुख्य द्वार के दोनों ओर गंगा और यमुना देवियों की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो गुप्तकालीन शिल्पकला की नजीर हैं। मंदिर के सामने एक खुला मंडप है, जो चार खूबसूरती से नक्काशीदार स्तंभों पर टिका है। इन स्तंभों में वर्गाकार आधार, अष्टकोणीय मध्य भाग, 16 कोनों वाला ऊपरी हिस्सा और पूर्णघट (overflowing vase) जैसी नक्काशी देखी जा सकती है। स्तंभों के शीर्ष पर सिंहों की जोड़ी और मध्य में आम का वृक्ष या अन्य वृक्ष उकेरे गए हैं।
परिसर में मौजूद शिलापट्टों और मूर्तियों पर भगवान विष्णु की विभिन्न मुद्राएं स्पष्ट हैं। विशेष रूप से गर्भगृह के समीप एक शिलापट्ट पर विष्णु की अनंत शेषशायी मुद्रा में प्रतिमा है — नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा विराजमान हैं। दीवारों पर नृसिंह अवतार की कलात्मक आकृति भी अंकित है। इसके अलावा कंकाली देवी और मां काली की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं, जो दर्शाती हैं कि यहां वैष्णव और शाक्त परंपराओं का सुंदर मेल हुआ। यह मंदिर सांची के गुप्तकालीन मंदिर संख्या 17 से काफी मिलता-जुलता है और उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य की प्रारंभिक रूपरेखा को परिभाषित करता है।
मुख्य मंदिर के समीप ही एक अन्य प्राचीन मंदिर है, जहां मां दुर्गा की अष्टभुजी प्रतिमा विराजमान है। स्थानीय लोग इसे मां शारदा के रूप में पूजते हैं। यह मंदिर पुराने भग्नावशेषों से बनाया गया प्रतीत होता है। परिसर में बिखरी हुई खंडित मूर्तियां, स्तंभ और स्थापत्य अवशेष इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत की गवाही देते हैं।
रहस्यमयी परंपरा और आस्था
तिगंवा मंदिर की सबसे आकर्षक बात है उससे जुड़ी लोक मान्यताएं। स्थानीय ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि प्रतिदिन तड़के लगभग 4 बजे मां कंकाली का पूजन और श्रृंगार स्वयं संपन्न हो जाता है। जब सुबह मंदिर के पट खोले जाते हैं, तो देवी सजी-सजाई, पूजी हुई अवस्था में मिलती हैं। कौन पूजा करता है, यह रहस्य आज तक अनसुलझा है। नवरात्र के दौरान यह आस्था और गहरी हो जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां स्वयं अपनी सेवा स्वीकार करती हैं।
कई इतिहासकारों और यात्रियों (जैसे अलेक्जेंडर कनिंघम, जिन्होंने 1873 में यहां का सर्वेक्षण किया) ने इस स्थल को गुप्त साम्राज्य के सांस्कृतिक उत्कर्ष का प्रतीक बताया है। कुछ शिलालेखों में 8वीं शताब्दी का उल्लेख भी मिलता है, जहां कन्नौज के उमादेव जैसे श्रद्धालु यहां दर्शन करने आए थे।
कैसे पहुंचें और महत्व
तिगंवा पहुंचना आसान है — कटनी से सड़क मार्ग उपलब्ध है। नवरात्र में यहां विशेष मेला-महोत्सव लगता है। पास में जैन अतिशय क्षेत्र बहोरीबंद भी है, जो इसे धार्मिक पर्यटन का बेहतरीन गंतव्य बनाता है।
निष्कर्ष में, तिगंवा का मां कंकाली धाम मात्र एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता, गुप्तकालीन कला और अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। चैत्र नवरात्र जैसे पर्व पर यहां आकर भक्त न केवल मां की कृपा प्राप्त करते हैं, बल्कि 1500 साल पुरानी विरासत को भी महसूस करते हैं। यदि कभी कटनी या आसपास हों, तो एक बार अवश्य जाएं। जैसा कि कोई पुराना दोस्त मजाक में कहता है — “हम मुंबई वाले कभी ले गए हैं क्या? लेकर तो तुम ही आए हो… जाकर ले आओ!” — यानी इस अनमोल धरोहर को नजरअंदाज न करें, खुद चलकर देखें।
जय मां कंकाली! जय मां दुर्गा!
















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