बुजुर्ग परिवार की शान और पहचान हैं ,,वह घर-द्वार अत्यंत शोभायमान होता है जहां बुजुर्ग माता-पिता विराजमान होते हैं,,
टीकमगढ़ म प्र से कविन्द पटैरिया पत्रकार की रिपोर्ट
जब हमारे मन में “मातृ पितृ छाया वृद्धआश्रम” स्थापित करने का विचार आया तो ,, निराश्रित बुजुर्गों को आश्रय देने का ही विचार था,,,
मातृशक्ति संगठन टीकमगढ़ का प्रथम प्रयास तो यही रहता है कि जिन बुजुर्गों को उनके बच्चों ने रखने से इंकार कर दिया है ,, उन्हें समझा-बुझाकर ससम्मान अपने माता या पिता को घर वापिस ले जाएं।

इस तारतम्य में लगभग 22 माता-पिताओ को हम उनके परिवार के साथ रहने के लिए घर भेज चुके हैं।
बुजुर्गों को घर भेजते समय भी बुजुर्गों को पूरी तरह से आश्वस्त करते हुए विदाई देते हैं कि ये आश्रम केवल वृद्धाश्रम नहीं है वरन् आपकी बेटियों का घर है आप जब चाहें वापिस आ सकतें हैं ।
बुजुर्गों के घर वापस जाने के बाद भी समय-समय पर मातृशक्ति संगठन की टीम उनके घर जाकर मिलती-जुलती रहती है।
यह बिल्कुल सच है, कभी-कभी ना बुजुर्ग गलत होते हैं ना बच्चे, बस पीढ़ी अंतराल, (जेनरेशन गेप)के कारण विचारों में सिर्फ अंतर होता है,,
अभी कुछ दिन पूर्व माताजी अपने बेटे बहू के साथ आपसी मनमुटाव होने के कारण आश्रम में आ गईं ,,

बेटा और बहू अथक प्रयासरत थे की माताजी घर चलें,, लगातार समझाइसके बाद जन्माष्टमी के दिन माता जी घर पहुंची,,
हम लोगों ने उनके बेटे को बुलाया और दोनों पक्षों की बातों को गंभीरता से सुनकर समझौता करवाया,,,अब माताजी हंसी खुशी अपने परिवार के साथ रह रहीं हैं,,
जब उनके हाल-चाल जानने हम लोग उनके घर पहुंचे,, माताजी प्रसन्न थी क्योंकि हम लोग उन्हें कितनी भी सुविधाएं दे दे, हर माता-पिता के लिए उनके बच्चे उनका जीवन होते हैं,,

माताजी ने यह कहा कि वह वृद्ध आश्रम नहीं ,, हमारी बेटियों का घर है, उनका यह आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ है,,,
आप सभी से हमारा निवेदन है कि जिन्होंने हमारे पालन-पोषण में अपना जीवन निछावर किया हमारा भी कर्तव्य बनता है उनके जीवन की सांध्य-बेला में उजियाली भर दें।
अपने माता-पिताओं की सेवा पुण्य भागीरथी में स्नान करने बराबर ही पुण्यदाई है।


















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