• आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति चिंतनीय एवं विचारणीय: डॉ संजीव शर्मा।
ललितपुर । मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान,नेहरू महाविद्यालय ललितपुर के संयोजक एवं मनोविज्ञान विभाग प्रभारी डॉ संजीव कुमार शर्मा ने बताया कि प्रतिवर्ष 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। यह दिवस विश्व में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोकथाम लगाने एवं इस समस्या के प्रति लोगों में जागरुकरता लाने के उद्देश्य से शुरु किया गया था। अक्सर बदलती लाइफस्टाइल और खुद के लिए समय की कमी लोगों में अवसाद का कारण बन रही है। कई बार बढ़ते अवसाद के कारण लोग आत्महत्या कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी है।आत्महत्या के दुःखद प्रभाव दुनिया भर मे हर किसी को प्रभावित करते हैं, चाहे आप कही भी रहते हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। प्रत्येक वर्ष 700000 लोग अलग-अलग कारणों के चलते मौत को गले लगा लेते हैं। विश्वस्तर पर 15-29 वर्ष आयु वर्ग के लोगो मे आत्महत्या मौत का चौथा प्रमुख कारक है। विश्व मे प्रत्येक 100 में से एक से अधिक मृत्यु आत्महत्या के कारण हुई है। वैश्विक आत्महत्या दर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में दोगुनी है। आत्महत्या का पूर्व प्रयास आत्महत्या से होने वाली मौतोंका सबसे बड़ा जोखिम कारक है।इस प्रकार, आत्महत्या एक बड़ी सार्वजनिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसके लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। हमें इस विषय पर गहन चिंतन करना चाहिए। समाज को युवाओं और सभी वर्गों को इस अवसाद से निकलने में मदद करनी चाहिए। आम जनमानस में धैर्य एवं सहनशीलता की कमी देखने को मिल रही है, जिसके चलते लोग आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। जब व्यक्ति जीवन में घोर निराशा एवं उदासी महसूस करता है तो इस जोखिम की सम्भावना बढ़ जाती हैं । व्यक्ति को लगने लगता है कि जीने का कोई कारण नहीं बचा है, जीवन उद्देश्यहीन हो गया है।आत्महत्या के प्रमुख कारकों मे बेरोजगारी ,आर्थिक संकट, गंभीर मानसिक या शारीरिक बीमारी , जीवन में तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना, पारिवारिक क्लेश ,मादक द्रव्यों का सेवन, आदि मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारको की अहम भूमिका होती है।
यदि कोई व्यक्ति हताशा एवं निराशा महसूस कर रहा है और उसके मन में आत्महत्या करने के विचार बार-बार आ रहे हैं अथवा आत्महत्या करने की सोच रहा है तो यह बेहतर होगा कि पीड़ित के परिवार के लोगों एवं इष्ट मित्रगणों को इस विषय पर बातचीत करनी चाहिए। हौसला बढ़ाना चाहिए और उसे सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए ,उसकी समस्या समाधान में मदद करें ,जीवन के प्रति आशा का भाव विकसित करने एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करे। यदि जरूरी हो तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।मानसिक रोगी को स्वयं भी इस स्थिति से उबरने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। आत्महत्या से ना केवल आत्महत्या करने वाला प्रभावित होता है, बल्कि उसके दोस्तों, प्रियजनों ,सहकर्मियों, समुदाय को भी बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जब लोग आत्महत्या करके मरते हैं तो उनके परिवार के सदस्यों, दोस्तों को लंबे समय तक अवसाद, तनाव, चिंता, दुख, सदमा, गुस्सा अपराध बोध का का सामना करना पड़ता है। आत्महत्या के विचार से पीड़ित व्यक्ति को यह समझना चाहिए की आत्महत्या समस्या है समाधान नहीं। जीवन बहुमूल्य हैं ,जीवन के महत्व को समझें, जीवन के प्रति प्रेम पैदा करें। अपने आप को खुश रखना व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है।
सत्यार्थ न्यूज से बानपुर संवाददाता “ललित नामदेव” की रिपोर्ट
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