“गुरुकुल से ग्लोबल शिक्षा तक: योग–ध्यान – मंत्र उच्चारण – कला से ही बच्चे का सच्चा विकास”—मोनिका गुप्ता

नोएडा। समाज में एक नई जागरूकता देखने को मिल रही है, जहां माता-पिता और शिक्षण संस्थान फिर से योग, ध्यान और मंत्रोच्चारण को बच्चों के जीवन में शामिल करने की पहल कर रहे हैं। आर्टाकस एकेडमी(Artacus Academy )की निदेशिका मोनिका गुप्ता का मानना है कि भारत की महान परंपराओं में इन प्राचीन विधाओं का विशेष स्थान रहा है और आज की पीढ़ी को इनसे दूर नहीं होना चाहिए।
मोनिका गुप्ता कहती हैं, “प्राचीन गुरुकुलों में शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं थी, बल्कि जीवन जीने की कला थी—शरीर, मन और आत्मा का संतुलन। ऋषि-मुनियों से बच्चे विद्या, संस्कार, योग और आत्मनियंत्रण प्राप्त करते थे।”

वे बताती हैं कि ब्रिटिश शासन ने योजनाबद्ध तरीके से गुरुकुल प्रणाली को खत्म कर दिया और ऐसी शिक्षा लागू की जो बच्चों को सोचने के बजाय सिर्फ वर्कर बनाए। “आज डिग्रियाँ तो हैं, पर जीवन जीने की विद्या गायब है,” मोनिका गुप्ता कहती हैं।
उनके अनुसार, बच्चों के लिए योग, ध्यान, कला, हमारे शास्त्रों का ज्ञान, मंत्र साधना सिर्फ अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मविश्वास, अनुशासन, संस्कार, एकाग्रता और संपूर्ण व्यक्तित्व विकास का आधार है। मंत्रोच्चारण बच्चों में श्रद्धा, संयम और सांस्कृतिक जुड़ाव बढ़ाता है।
मोनिका गुप्ता ने समाज से अपील की—
“गुरुकुल की आत्मा और आधुनिक शिक्षा—दोनों को साथ लाकर ही हम एक शक्तिशाली पीढ़ी गढ़ सकते हैं।”
अंत में वे कहती हैं—
“जिस बचपन में योग, ध्यान और शास्त्र हैं, वह जीवनभर सही दिशा और दिव्य ऊर्जा से भरा रहता है।”














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