इड़ा और पिंगला है जो जब भी संतुलित होती है तो सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होती है।
शक्ति एक प्राण ऊर्जा के रूप में, हमारी नाड़ी से बहती है जो हमारी नासाग्र दाहिने और बाएं स्वर से पता चलता है।
माता शक्ति का हमारे शरीर के 7 चक्र और 2 नाड़ी में संचरण करके अंत मे सुषुम्ना से प्रवाहित होकर सन्तुलन बनाती है हमारे जीवन के सभी पहलुओं का।
नवरात्र में पहले दिन यह शक्ति प्राण ऊर्जा को मूलाधार चक्र में उर्ध्व गमन किया जाता है।
प्रथम दिन – मूलाधार चक्र
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं।
जानिए मूलाधार चक्र के बारे में मूलाधार या मूल चक्र प्रवृत्ति, सुरक्षा, अस्तित्व और मानव की मौलिक क्षमता से संबंधित है। यह केंद्र गुप्तांग और गुदा के बीच अवस्थित होता है। इस क्षेत्र में एक मांसपेशी होती है, जो यौन क्रिया में स्खलन को नियंत्रित करती है। मूलाधार चक्र का प्रतीक लाल रंग और चार पंखुडिय़ों वाला कमल है। इसका मुख्य विषय कामवासना और लालसा है। शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है।
कैसी होती है इसकी प्रकृति?
काम प्रधान/ सिर्फ देह ही दिखती है। व्यक्ति अक्सर सिर्फ खुद के बारे में सोचता है। विचारों और कल्पनाओं में खोया रहता है।
दूसरा दिन- स्वाधिष्ठान चक्र
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। ब्रह्मशक्ति अर्थात तप की शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।
जानिए स्वाधिष्ठान चक्र के बारे में स्वाधिष्ठान चक्र त्रिकास्थि (कमर के पीछे की तिकोनी हड्डी) में अवस्थित होता है और अंडकोष या अंडाश्य के परस्पर के मेल से विभिन्न तरह का यौन अंत:स्राव उत्पन्न करता है, जो प्रजनन चक्र से जुड़ा होता है। त्रिक चक्र का प्रतीक छह पंखुडिय़ों और उससे परस्पर जुदा नारंगी रंग का एक कमल है। स्वाधिष्ठान का मुख्य विषय संबंध, हिंसा, व्यसनों, मौलिक भावनात्मक आवश्यकताएं और सुख है। शारीरिक रूप से स्वाधिष्ठान प्रजनन, मानसिक रूप से रचनात्मकता, भावनात्मक रूप से खुशी और आध्यात्मिक रूप से उत्सुकता को नियंत्रित करता है।
कैसी होती है प्रकृति?
स्वाधिष्ठान चक्र अगर जागृत ना हो तो व्यक्ति की रचनात्मकता बाधित होती है। वो नीरसता से काम करता है। नए विचारों और रचनात्मकता दोनों ही दिमाग में प्रवेश नहीं पा सकते।
तीसरा दिन- मणिपुर चक्र
नवरात्रि का तीसरा दिन माता चंद्रघंटा को समर्पित है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र से जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
जानिए मणिपुर चक्र के बारे में मणिपुर या मणिपुरक चक्र चयापचय और पाचन तंत्र से संबंधित है। ये चक्र नाभि स्थान पर होता है। ये पाचन में, शरीर के लिए खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसका प्रतीक दस पंखुडिय़ों वाला कमल है। मणिपुर चक्र से मेल खाता रंग पीला है। मुख्य विषय जो मणिपुर द्वारा नियंत्रित होते हैं, वे हैं- निजी बल, भय, व्यग्रता और सहज या मौलिक से लेकर जटिल भावना तक के परिवर्तन। शारीरिक रूप से मणिपुर चक्र पाचन, मानसिक रूप से निजी बल, भावनात्मक रूप से व्यापकता और आध्यात्मिक रूप से सभी उपादानों के विकास को नियंत्रित करता है।
चौथा दिन- अनाहत चक्र
चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवी मां कूष्मांडा हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। मां कूष्मांडा के पूजन से हमारे शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है।
जानिए अनाहत चक्र के बारे में
अनाहत चक्र बाल्य ग्रंथि से संबंधित है, यह सीने में स्थित होता है। बाल्य ग्रंथि प्रतिरक्षा प्रणाली का तत्व है, इसके साथ ही यह अंत:स्त्रावी तंत्र का भी हिस्सा है। यह चक्र तनाव के प्रतिकूल प्रभाव से भी बचाव का काम करता है। अनाहत का प्रतीक बारह पंखुडिय़ों का एक कमल है। अनाहत हरे या गुलाबी रंग से संबंधित है। अनाहत से जुड़े मुख्य विषय जटिल भावनाएं, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, संतुलन, अस्वीकृति और कल्याण है। शारीरिक रूप से अनाहत संचालन को नियंत्रित करता है, भावनात्मक रूप से अपने और दूसरों के लिए समर्पित प्रेम, मानसिक रूप से आवेश और आध्यात्मिक रूप से समर्पण को नियंत्रित करता है।
कैसी होती है प्रकृति?
इस चक्र के बाधित होने से व्यक्ति थोड़ा डरपोक हो जाता है। वो अपनी बात कहने में हिचकने लगता है तथा कई बार सही बात का भी समर्थन नहीं कर पाता।
पांचवा दिन- विशुद्ध चक्र
चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए, जिससे कि ध्यान वृत्ति एकाग्र हो सके। यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है।
जानिए विशुद्ध चक्र के बारे में
यह चक्र गलग्रंथि, जो गले में होती है, के समानांतर है और थायरॉयड हारमोन उत्पन्न करता है, जिससे विकास और परिपक्वता आती है। इसका प्रतीक सोलह पंखुडिय़ों वाला कमल है। विशुद्ध की पहचान हल्के या पीलापन लिये हुए नीला या फिरोजी रंग है। यह आत्माभिव्यक्ति और संप्रेषण जैसे विषयों को नियंत्रित करता है। शारीरिक रूप से विशुद्ध संप्रेषण, भावनात्मक रूप से स्वतंत्रता, मानसिक रूप से उन्मुक्त विचार और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है।
कैसी होती है प्रकृति?
इस चक्र के बाधित होने पर व्यक्ति निस्तेज होने लगता है। बीमारियां घेरती हैं और वाणी का प्रभाव लगभग समाप्त हो जाता है।
छठा दिन- आज्ञा चक्र
चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के कात्यायनी रूप की पूजा की जाती है। इनकी उपासना करने से आसुरी प्रवृत्ति व शत्रुता का नाश होता है, जो कि जीवन प्रबंधन का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इस दिन साधक का मन आज्ञा (ललाट) चक्र में अवस्थित होता है।
जानिए आज्ञा चक्र के बारे में
आज्ञा चक्र दोनों भौहों के मध्य स्थित होता है। आज्ञा चक्र का प्रतीक दो पंखुडिय़ों वाला कमल है और यह सफेद, नीले या गहरे नीले रंग से मेल खाता है। आज्ञा का मुख्य विषय उच्च और निम्न अहम को संतुलित करना और अंतरस्थ मार्गदर्शन पर विश्वास करना है। आज्ञा का निहित भाव अंतरज्ञान को उपयोग में लाना है। मानसिक रूप से, आज्ञा दृश्य चेतना के साथ जुड़ा होता है। भावनात्मक रूप से, आज्ञा शुद्धता के साथ सहज ज्ञान के स्तर से जुड़ा होता है।
कैसी होती है प्रकृति?
इस चक्र में बाधा के कारण व्यक्ति पुराने मान-अपमान, अपराध बोध आदि से ग्रसित रहता है। सिर दर्द, तनाव आदि बने रहते हैं। क्षमाशीलता का अभाव होता है।
आध्यात्मिक प्रभाव क्या?
अज्ञात भय से मुक्ति। परमात्मा की झलक अधिक समय के लिए।
प्रोफेशनल प्रभाव क्या?
एग्रेसिवनेस और फीयरलेसनेस आएगा।
क्षमा कर पाएंगे। तनावमुक्त काम कर सके
सातवां दिन- भानु पिंगला चक्र
महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप है कालरात्रि। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। ये दिन भानु चक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। वास्तव में भानु चक्र न होकर नाड़ी है। इसे सूर्य अथवा पिंगला नाड़ी भी कहते हैं।
जानिए क्या है भानु चक्र यानी सूर्य नाड़ी मनुष्य के शरीर में दहिनी ओर इच्छा शक्ति है। इसे ही पिंगला नाड़ी भी कहते हैं। यही नाड़ी इच्छा पूर्ति के लिए कार्य करने की शक्ति देती है। यह नाड़ी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्य करने वाली है। यह नाड़ी शरीर के संपूर्ण दाएं हिस्से को प्रभावित करती है।
यह चक्र भविष्य काल, अतिद्नेय चेतन व रजोगुण का प्रतीक है। इसके सूक्ष्म गुण स्वाभिमान, कृति, शारीरिक एवं मानसिक हलचल व शारीरिक एवं बौद्धिक कार्य हैं। इसमें बाधा होने पर अहंकार, हठयोग, जिद्दी स्वभाव, भविष्य के बारे में बहुत ज्यादा सोचना, बेशर्मी आदि अवगुण आ जाते हैं।
आठवां दिन- इड़ा चंद्र नाड़ी
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। नवरात्रि का आठवां दिन हमारे शरीर का सोम चक्र जागृत करने का दिन है।
श्री महागौरी की आराधना से सोम चक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती हैं।
वास्तव में सोम चक्र न होकर नाड़ी है। इसे चंद्र व इडा नाड़ी भी कहते हैं।
जानिए क्या है सोम चक्र यानी चंद्र नाड़ी?
यह नाड़ी मनुष्य के शरीर में अधिभौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की बांई ओर इच्छा शक्ति है। इसे इडा नाड़ी भी कहते हैं। यह नाड़ी शरीर के संपूर्ण बाएं हिस्से को प्रभावित करती है। यही नाड़ी भूतकालीन स्मृतियों को सचेतन करती है और उस वजह से क्रिया करने में आसानी होती हैं। जब तक यह शक्ति कार्यरत रहती है, तब तक मनुष्य में जीवन जीने की अभिलाषा रहती है।
भूतकाल, सुप्त चेतन, प्रति अहंकार इसके गुण हैं। इस नाड़ी के सूक्ष्म गुण भावना, पवित्रता, अस्तित्व, आनंद, इच्छा व मांगल्य है। इन नाड़ी में किसी भी प्रकार की बाधा होने पर आलस, अंधश्रद्धा, अंधविश्वास, अपराध की भावना, अश्लील लेखन या वाचन करना आदि अवगुण आ जाते हैं।
नौवां दिन- सहस्रार चक्र
चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। अंतिम दिन भक्तों को पूजा के समय अपना सारा ध्यान सहस्रार (निर्वाण) चक्र, पर लगाना चाहिए।
ऐसा करने पर देवी की कृपा से इस चक्र से संबंधित शक्तियां स्वत: ही भक्त को प्राप्त हो जाती हैं।
जानिए सहस्रार चक्र के बारे में सहस्रार को आमतौर पर शुद्ध चेतना का चक्र माना जाता है।
यह शरीर से बाहर ऊपर की ओर स्थित होता है।
जैसे कि किसी भी भगवान के सर के पीछे की आभा।
इसका प्रतीक कमल की एक हजार पंखुडिय़ां हैं और यह सिर के शीर्ष के ऊपर अवस्थित होता है। सहस्रार चक्र बैंगनी रंग का प्रतिनिधित्व करता है और यह आतंरिक बुद्धि और दैहिक मृत्यु से जुड़ा होता है। सहस्रार का आतंरिक स्वरूप कर्म के निर्मोचन से, दैहिक क्रिया ध्यान से, मानसिक क्रिया सार्वभौमिक चेतना और एकता से और भावनात्मक क्रिया अस्तित्व से जुड़ा होता है।
कैसी होती है प्रकृति?
यह चक्र सारे चक्रों में श्रेष्ठतम है। इसकी सुप्त अवस्था के कारण परमात्मा की परमशक्ति को समझ ना पाना। मस्तिष्क का कम काम करना, याददाश्त का कम रहना आदि समस्याएं रहती हैं।हम जिंदा भी इसीलिए है कि शक्ति रूपी प्राण ऊर्जा इड़ा पिंगला नाड़ी में सन्तुलन बनाकर सुषुम्ना से प्रवाहित हो रही है।जिस चक्र पर भी ब्लॉकेज होगा , उस चक्र से जुड़ी परेशानियां ज्यादा होंगी।
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