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बीकानेर-5 अगस्त 2024 सोमवार आज का पंचांग व राशिफल आज सावन के तीसरे सोमवार की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ जानें कुछ खास बातें पंडित नरेश सारस्वत रिड़ी के साथ

सवांददाता नरसीराम शर्मा बीकानेर श्रीडूंगरगढ़

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है।शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है।पंचांग में सूर्योदय सूर्यास्त, चद्रोदय-चन्द्रास्त काल, तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त, योगकाल, करण, सूर्य-चंद्र के राशि, चौघड़िया मुहूर्त दिए गए हैं।

जय जय श्री राधै कृष्णा

*दिनांक:- 05/08/2024, सोमवार* प्रतिपदा, शुक्ल पक्ष, श्रावण “””””””(समाप्ति काल)
तिथि———- प्रतिपदा 18:02:48 तक
पक्ष———————— शुक्ल
नक्षत्र————— आश्लेषा 15:20:21
योग————— व्यतिपत 10:36:32
करण——————– बव 18:02:48
वार———————– सोमवार
माह———————– श्रावण
चन्द्र राशि————— कर्क 15:20:21
चन्द्र राशि—————— सिंह
सूर्य राशि—————— कर्क
रितु————————– वर्षा
आयन———————– दक्षिणायण
संवत्सर——————– क्रोधी
संवत्सर (उत्तर)————- कालयुक्त
विक्रम संवत—————- 2081
गुजराती संवत————– 2080
शक संवत——————- 1946
कलि संवत—————– 5125
सूर्योदय——————— 05:45:59
सूर्यास्त———————- 19:03:59
दिन काल——————– 13:17:59
रात्री काल——————- 10:42:31
चंद्रोदय———————– 06:15:24
चंद्रास्त———————– 19:54:34
लग्न———– कर्क 18°53′, 108°53′
सूर्य नक्षत्र——————– आश्लेषा
चन्द्र नक्षत्र——————– आश्लेषा
नक्षत्र पाया——————- रजत

*🚩💮🚩 पद, चरण 🚩💮🚩*

डे—- आश्लेषा 08:48:55

डो—- आश्लेषा 15:20:21

मा—- मघा 21:53:30

मी—- मघा 28:28:20

*💮🚩💮 ग्रह गोचर 💮🚩💮*

ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद
==========================
सूर्य= कर्क 18°05, अश्लेषा 1 डी
चन्द्र= कर्क 25°30 , अश्लेषा 3 डे
बुध =सिंह 09°53′ मघा 3 मू
शु क्र= सिंह 05°05, मघा ‘ 2 मी
मंगल=वृषभ 16°30 ‘ रोहिणी’ 2 वा
गुरु=वृषभ 20°30 रोहिणी , 4 वु
शनि=कुम्भ 24°10 ‘ पू o भा o ,2 सो
राहू=(व) मीन 15°15 उo भा o, 4 ञ
केतु=(व) कन्या 15°15 हस्त , 2 ष

*🚩💮🚩 शुभा$शुभ मुहूर्त 💮🚩💮*

राहू काल 07:26 – 09:05 अशुभ
यम घंटा 10:45 – 12:25 अशुभ
गुली काल 14:05 – 15:44
अभिजित 11:58 – 12:52 शुभ
दूर मुहूर्त 12:52 – 13:45 अशुभ
दूर मुहूर्त 15:31 – 16:24 अशुभ
वर्ज्यम 28:28* – 30:14* अशुभ
प्रदोष 19:04 – 21:14 शुभ

🚩गंड मूल अहोरात्र अशुभ

💮चोघडिया, दिन
अमृत 05:46 – 07:26 शुभ
काल 07:26 – 09:05 अशुभ
शुभ 09:05 – 10:45 शुभ
रोग 10:45 – 12:25 अशुभ
उद्वेग 12:25 – 14:05 अशुभ
चर 14:05 – 15:44 शुभ
लाभ 15:44 – 17:24 शुभ
अमृत 17:24 – 19:04 शुभ

🚩चोघडिया, रात
चर 19:04 – 20:24 शुभ
रोग 20:24 – 21:45 अशुभ
काल 21:45 – 23:05 अशुभ
लाभ 23:05 – 24:25* शुभ
उद्वेग 24:25* – 25:46* अशुभ
शुभ 25:46* – 27:06* शुभ
अमृत 27:06* – 28:26* शुभ
चर 28:26* – 29:47* शुभ

💮होरा, दिन
चन्द्र 05:46 – 06:52
शनि 06:52 – 07:59
बृहस्पति 07:59 – 09:05
मंगल 09:05 – 10:12
सूर्य 10:12 – 11:18
शुक्र 11:18 – 12:25
बुध 12:25 – 13:31
चन्द्र 13:31 – 14:38
शनि 14:38 – 15:44
बृहस्पति 15:44 – 16:51
मंगल 16:51 – 17:57
सूर्य 17:57 – 19:04

🚩होरा, रात
शुक्र 19:04 – 19:58
बुध 19:58 – 20:51
चन्द्र 20:51 – 21:45
शनि 21:45 – 22:38
बृहस्पति 22:38 – 23:32
मंगल 23:32 – 24:25
सूर्य 24:25* – 25:19
शुक्र 25:19* – 26:12
बुध 26:12* – 27:06
चन्द्र 27:06* – 27:59
शनि 27:59* – 28:53
बृहस्पति 28:53* – 29:47

*🚩 उदयलग्न प्रवेशकाल 🚩*

कर्क > 03:34 से 05:52 तक
सिंह > 05:52 से 08:02 तक
कन्या > 08:02 से 10:12 तक
तुला > 10:12 से 12: 38 तक
वृश्चिक > 12:28 से 14:46 तक
धनु > 14:46 से 16:52 तक
मकर > 16:52 से 18:40 तक
कुम्भ > 18:40 से 20:12 तक
मीन > 20:12 से 21:40 तक
मेष > 21:40 से 23:16 तक
वृषभ > 23:16 से 01:12 तक
मिथुन > 01:12 से 03:30 तक

*🚩विभिन्न शहरों का रेखांतर (समय)संस्कार*

(लगभग-वास्तविक समय के समीप)
दिल्ली +10मिनट——— जोधपुर -6 मिनट
जयपुर +5 मिनट—— अहमदाबाद-8 मिनट
कोटा +5 मिनट———— मुंबई-7 मिनट
लखनऊ +25 मिनट——–बीकानेर-5 मिनट
कोलकाता +54—–जैसलमेर -15 मिनट

*नोट*- दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है।
प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार॥
रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार।
अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार॥
अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें।
उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें।
शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें।
लाभ में व्यापार करें।
रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें।
काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है।
अमृत में सभी शुभ कार्य करें।

*💮दिशा शूल ज्ञान——————पूर्व*
परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो घी अथवा काजू खाके यात्रा कर सकते है l
इस मंत्र का उच्चारण करें-:
*शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु चl*
*भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय:ll*

*🚩 अग्नि वास ज्ञान -:*
*यात्रा विवाह व्रत गोचरेषु,*
*चोलोपनिताद्यखिलव्रतेषु।*
*दुर्गाविधानेषु सुत प्रसूतौ,*
*नैवाग्नि चक्रं परिचिन्तनियं।।*
*महारुद्र व्रतेSमायां ग्रसतेन्द्वर्कास्त राहुणाम्*
*नित्यनैमित्यके कार्ये अग्निचक्रं न दर्शायेत्।।*

1 + 2 + 1 = 4 ÷ 4 = 0 शेष
मृत्यु लोक पर अग्नि वास हवन के लिए शुभ कारक हैl

*🚩💮 ग्रह मुख आहुति ज्ञान 💮🚩*

सूर्य नक्षत्र से अगले 3 नक्षत्र गणना के आधार पर क्रमानुसार सूर्य , बुध , शुक्र , शनि , चन्द्र , मंगल , गुरु , राहु केतु आहुति जानें । शुभ ग्रह की आहुति हवनादि कृत्य शुभपद होता है

सूर्य ग्रह मुखहुति

*💮 शिव वास एवं फल -:*

1 + 1 + 5 = 7 ÷ 7 = 0 शेष

शमशान वास = मृत्यु कारक

*🚩भद्रा वास एवं फल -:*

*स्वर्गे भद्रा धनं धान्यं ,पाताले च धनागम:।*
*मृत्युलोके यदा भद्रा सर्वकार्य विनाशिनी।।*

*💮🚩 विशेष जानकारी 🚩💮*

*श्रावण वन सोमवार

*रोटक व्रत

*सोमेश्वर पूजन

*💮🚩💮 शुभ विचार 💮🚩💮*

विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधार्तो भयकातरः।
भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत्।।
।। चा o नी o।।

इन सातो को जगा दे यदि ये सो जाए…
१. विद्यार्थी
२. सेवक
३. पथिक
४. भूखा आदमी
५. डरा हुआ आदमी
६. खजाने का रक्षक
७. खजांची

*🚩💮🚩 सुभाषितानि 🚩💮🚩*

गीता -: अक्षरब्रह्मयोग अo-08

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।,
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌॥,

हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है (गीता अध्याय 9 श्लोक 4 में देखना चाहिए), वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य (गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में इसका विस्तार देखना चाहिए) भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है ॥,22॥,

*💮🚩 दैनिक राशिफल 🚩💮*

देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत।।

🐏मेष-विद्यार्थी वर्ग सफलता हासिल करेगा। पार्टी व पिकनिक का आनंद मिलेगा। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। रोजगार की चिंता रह सकती है। स्वास्थ्य ठीक रहेगा। मानसिक दृढ़ता से निर्णय लेकर कार्य करना चाहिए। व्यापार में लाभकारी परिवर्तन होंगे।

🐂वृष-शत्रु परास्त होंगे। भूमि व भवन की खरीद-फरोख्त हो सकती है। रोजगार मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। नवीन गतिविधियां लाभकारी रहेंगी। व्यापार में नई योजनाओं का प्रारंभ होगा। पराक्रम के प्रति निष्क्रियता के कारण मन अप्रसन्न रहेगा।

👫मिथुन-परिवार की चिंता रहेगी। जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। कानूनी अड़चन दूर होगी। व्यवसाय ठीक चलेगा। परोपकार करके मानसिक सुख अर्जित करेंगे। व्यापारिक स्थिति आशाजनक रहेगी। पारिवारिक, मांगलिक कार्य की योजना बनेगी। कर्ज लेने से बचना चाहिए।

🦀कर्क-व्यर्थ भागदौड़ होगी। लाभ के अवसर टलेंगे। विवाद न करें। कार्य निर्णय बहुत शांति से विचार करके करना ही शुभ है। स्वास्थ्य की ओर ध्यान दें। रुका धन मिलेगा। दु:खद समाचार मिल सकता है। विरोध होगा।

🐅सिंह-फालतू खर्च होगा। अतिथियों का आगमन होगा। शुभ समाचार मिलेंगे। मान बढ़ेगा। विवाद न करें। आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना है। व्यापार में नए अनुबंध होंगे। व्ययों में कमी करना चाहिए। व्यापार अच्छा चलेगा। जीवनसाथी से मतभेद।

🙍‍♀️कन्या-पुराना रोग उभर सकता है। चोट, चोरी व विवाद आदि से हानि संभव है। आय में कमी रहेगी। धैर्य रखें। स्वास्थ्य की समस्या हल होगी। ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ेगी। जीवनसाथी की भावनाओं को समझें। आर्थिक निवेश लाभकारी रहेगा।

⚖️तुला-नई योजना बनेगी। कार्य का विस्तार होगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। अपनी वस्तुएं संभालकर रखें। काम के प्रति दृढ़ता से कार्य में अनुकूल सफलता मिल सकेगी। पारिवारिक सुख व धन बढ़ेगा। वाणी संयम आवश्यक है।

🦂वृश्चिक-धर्म-कर्म में रुचि रहेगी। कानूनी अड़चन दूर होगी। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। समाज के कामों में उत्साहपूर्वक भाग लेंगे। नौकरी में तबादला तथा पदोन्नति के योग हैं। अनावश्यक क्रोध न करें। धन संबंधी काम पूरे होंगे।

🏹धनु-कुसंगति से बचें। लेन-देन में सावधानी रखें। शारीरिक कष्ट संभव है। व्ययवृद्धि से तनाव रहेगा। विवाद न करें। सार्वजनिक कार्यों में समय व्यतीत होगा। संतान की ओर से शुभ समाचार मिलेंगे। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। रोजगार के क्षेत्र में उन्नति होगी।

🐊मकर-व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। नेत्र पीड़ा संभव है। विवाद न करें। रोजगार मिलेगा। भेंट व उपहार की प्राप्ति होगी। आपकी मिलनसारिता व धैर्यवान प्रवृत्ति आपके जीवन में आनंद का संचार करेगी। स्थायी संपत्ति में वृद्धि होगी।

🍯कुंभ-सुख के साधन जुटेंगे। प्रयास सफल रहेंगे। मान-सम्मान मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। प्रसन्नता रहेगी। नौकरी में मनचाही पदोन्नति मिलने के योग बनेंगे। धर्म के कार्यों में रुचि आपके मनोबल को ऊंचा करेगी। अजनबियों पर विश्वास न करें।

🐟मीन -वैवाहिक प्रस्ताव मिल सकता है। बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। यात्रा सफल रहेगी। लाभ होगा। उत्तम मनोबल आपकी सभी समस्याओं को हल कर देगा। प्रतिष्ठित जनों से मेलजोल बढ़ेगा। व्यापार में नए प्रस्ताव मिलेंगे।

🙏आपका दिन मंगलमय हो🙏

क्यों करते हैं प्रसाद वितरण
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‘पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।’
अर्थ : जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप में प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। – श्रीकृष्ण
प्रासाद चढ़ावें को नैवेद्य, आहुति और हव्य से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन प्रसाद को प्राचीन काल से ही नैवेद्य कहते हैं जो कि शुद्ध और सात्विक अर्पण होता है। हवन की अग्नि को अर्पित किए गए भोजन को हव्य कहते हैं। यज्ञ को अर्पित किए गए भोजन को आहुति कहा जाता है। दोनों का अर्थ एक ही होता है। हवन किसी देवी-देवता के लिए और यज्ञ किसी ईश्वर को अर्पित करने लिए।
प्राचीनकाल से ही प्रत्येक हिन्दू भोजन करते समय देवी-देवताओं को समर्पित करते आया है। यज्ञ के अलावा वह घर-परिवार में भोजन अग्नि को सपर्पित करता था। अग्नि उस हिस्से को देवताओं तक पहुंचा देता था। चढा़ए जाने के उपरांत नैवेद्य द्रव्य निर्माल्य कहलाता है। यज्ञ, हवन, पूजा और अन्न ग्रहण करने से पहले भगवान को नैवेद्य एवं भोग अर्पण की शुरुआत वैदिक काल से ही रही है। ‘शतपत ब्राह्मण’ ग्रंथ में यज्ञ को साक्षात भगवान का स्वरूप कहा गया है। यज्ञ में यजमान सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं हविरूप से अर्पण कर देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है।
शास्त्रों में विधान है कि यज्ञ में भोजन पहले दूसरों को खिलाकर यजमान करेंगे। वेदों के अनुसार यज्ञ में हृविष्यान्न और नैवेद्य समर्पित करने से व्यक्ति देव ऋण से मुक्त होता है। प्राचीन समय में यह नैवेद्य (भोग) अग्नि में आहुति रूप में ही दिया जाता था, लेकिन अब इसका स्वरूप थोड़ा-सा बदल गया है। पूजा-पाठ या आरती के बाद तुलसीकृत जलामृत व पंचामृत के बाद बांटे जाने वाले पदार्थ को प्रसाद कहते हैं। पूजा के समय जब कोई खाद्य सामग्री देवी-देवताओं के समक्ष प्रस्तुत की जाती है तो वह सामग्री प्रसाद के रूप में वितरण होती है। इसे नैवेद्य भी कहते हैं।
कौन से देवता को कौन सा चढ़ता नैवेद्य
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प्रत्येक देवी या देवता का नैवेद्य अलग-अलग होता है। यह नैवेद्य या प्रसाद जब व्यक्ति भक्ति-भावना से ग्रहण करता है तो उसमें विद्यमान शक्ति से उसे लाभ मिलता है।

1. ब्रह्माजी को कमल गट्टा एवं सिंघाड़ा।
2. विष्णुजी को खीर या सूजी का हलवे का नैवेद्य बहुत पसंद है।
3. शिव को भांग और पंचामृत का नैवेद्य पसंद है।
4. सरस्वती को दूध, पंचामृत, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू तथा धान का लावा पसंद है।
5. लक्ष्मीजी को सफेद रंग के मिष्ठान्न, केसर भात बहुत पसंद होते हैं।
6. दुर्गाजी को खीर, मालपुए, पूरणपोली, केले, नारियल और मिष्ठान्न बहुत पसंद हैं।
7. गणेशजी को मोदक या लड्डू का नैवेद्य अच्छा लगता है।
8. श्रीरामजी को केसर भात, खीर, धनिए का प्रसाद आदि पसंद हैं।
9. हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर भात बहुत पसंद है।
9. श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री का नैवेद्य बहुत पसंद है।

नैवेद्य चढ़ाए जाने के नियम
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1.नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है।
.नैवेद्य में नमक की जगह मिष्ठान्न रखे जाते हैं।
3.प्रत्येक पकवान पर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।
4.नैवेद्य की थाली तुरंत भगवान के आगे से हटाना नहीं चाहिए।
5.शिवजी के नैवेद्य में तुलसी की जगह बेल और गणेशजी के नैवेद्य में दूर्वा रखते हैं।
6.नैवेद्य देवता के दक्षिण भाग में रखना चाहिए।
कुछ ग्रंथों का मत है कि पक्व नैवेद्य देवता के बाईं तरफ तथा कच्चा दाहिनी तरफ रखना चाहिए।
7.भोग लगाने के लिए भोजन एवं जल पहले अग्नि के समक्ष रखें। फिर देवों का आह्वान करने के लिए जल छिड़कें।
8.तैयार सभी व्यंजनों से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा अग्निदेव को मंत्रोच्चार के साथ स्मरण कर समर्पित करें। अंत में देव आचमन के लिए मंत्रोच्चार से पुन: जल छिड़कें और हाथ जोड़कर नमन करें।
9.भोजन के अंत में भोग का यह अंश गाय, कुत्ते और कौए को दिया जाना चाहिए। इसे बलि कहते है। जिसका अर्थ बाद में चार्वाको द्वारा बदलकर पशु हिंसा का प्रारुप दे दिया गया था।
10.पीतल की थाली या केले के पत्ते पर ही नैवेद्य परोसा जाए। देवता को निवेदित करना ही नैवेद्य है। सभी प्रकार के
प्रसाद में निम्न प्रदार्थ प्रमुख रूप से रखे जाते हैं
दूध-शकर, मिश्री, शकर-नारियल, गुड़-नारियल, फल, खीर, भोजन इत्यादि पदार्थ।

आखिर क्या फायदा होगा नैवेद्य अर्पित कर उसे खाने से
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मन और मस्तिष्क को स्वच्छ, निर्मल और सकारात्मक बनाने के लिए हिन्दू धर्म में कई रीति-रिवाज, परंपरा और उपाय निर्मित किए गए हैं। सकारात्मक भाव से मन शांतचित्त रहता है। शांतचित्त मन से ही व्यक्ति के जीवन के संताप और दुख मिटते हैं। लगातार प्रसाद वितरण करते रहने के कारण लोगों के मन में भी आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है। इससे किसी के भी मन में आपके प्रति राग-द्वेष नहीं पनपता और आपके मन में भी उसके प्रति प्रेम रहता है।
लगातार भगवान से जुड़े रहने से चित्त की दशा और दिशा बदल जाती है। इससे दिव्यता का अनुभव होता है और जीवन के संकटों में आत्मबल प्राप्त होता है। देवी और देवता भी संकटों के समय साथ खड़े रहते हैं।
भजन, कीर्तन, नैवेद्य आदि धार्मिक कर्म करने से जहां भगवान के प्रति आस्था बढ़ती है वहीं शांति और सकारात्मक भाव का अनुभव होता रहता है। इससे इस जीवन के बाद भगवान के उस धाम में भगवान की सेवा की प्राप्ति होती है और अगला जीवन और भी अच्छे से शांति व समृद्धिपूर्वक व्यतीत होता है।
मंदिर में रोज प्रसाद वितरित हो और इसके लिए समृद्धिशाली लोग आगे आये तो मंदिर के आसपास रहने वाले गरीव लोगो को खाना मिलता है और भगवान का दिया हुआ समझकर सब खुशी खुशी ग्रहण भी करते है। इसमे किसी के स्वाभिमान को भी ठेस नही पंहुचती।
श्रीमद् भगवद् गीता (7/23) के अनुसार अंत में हमें उन्हीं देवी-देवताओं के स्वर्ग, इत्यादि धामों में वास मिलता है जिसकी हम आराधना करते रहते हैं।
श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन के माध्यम से हमें यह भी बताते हैं कि देवी-देवताओं के धाम जाने के बाद फिर पुनर्जन्म होता है अर्थात देवी-देवताओं का भजन करने से, उनका प्रसाद खाने से व उनके धाम तक पहुंचने पर भी जन्म-मृत्यु का चक्र खत्म नहीं होता है। (श्रीगीता )
अतएव प्रथम श्रद्धा युक्त हृदय से ईश्वर को अर्पित करना है। इसके उपरांत अतिथि एवं परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरण करने के पश्चात स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिए है।
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