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भारत का ‘दिल’ करौंदी गांव उपेक्षा का शिकार: पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की यादों से जुड़ा स्थल खो रहा है अपनी पहचान

भारत का ‘दिल’ करौंदी गांव उपेक्षा का शिकार: पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की यादों से जुड़ा स्थल खो रहा है अपनी पहचान

कटनी (मध्य प्रदेश), 16 दिसंबर 2025
लेखक: हरिशंकर पाराशर

(मध्य प्रदेश के कटनी जिले में विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा गांव करौंदी – भारत का भौगोलिक केंद्र बिंदु। यह गांव न केवल देश का ‘दिल’ कहलाता है, बल्कि कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ कैंसर) का गुजरना इसे राष्ट्रीय महत्व प्रदान करता है। 1987 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने यहां पहुंचकर स्मारक का शिलान्यास किया और इसे पर्यटन स्थल बनाने की घोषणा की। लेकिन आज दशकों बाद भी विकास योजनाएं कागजों पर अटकी हुई हैं, स्मारक बदहाली का शिकार है और प्रशासन की उदासीनता से यह अनोखा स्थल अपनी पहचान खोता जा रहा है।)

मध्य प्रदेश के कटनी जिले की ढीमरखेड़ा तहसील में बसा छोटा सा गांव करौंदी, जिसे भारत का भौगोलिक केंद्र बिंदु माना जाता है, आज विकास की कमी और प्रशासन की उदासीनता से जूझ रहा है। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा यह गांव न केवल देश का ‘दिल’ कहलाता है, बल्कि कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ कैंसर) का गुजरना इसे और भी विशेष बनाता है। लेकिन दशकों पुरानी योजनाएं और पर्यटन विकास के वादे आज भी कागजों पर ही सिमटे हुए हैं।
ऐतिहासिक खोज और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का विशेष योगदान


करौंदी गांव की इस अनोखी विशेषता की खोज 1956 में हुई थी, जब जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज (अब जीईसी जबलपुर) के संस्थापक प्राचार्य एस.पी. चक्रवर्ती और उनके छात्रों ने सर्वेक्षण के दौरान इसे भारत के भौगोलिक केंद्र के रूप में चिह्नित किया। स्वतंत्रता के बाद देश के नक्शे के केंद्र बिंदु के रूप में इसकी मान्यता मिली। गांव की आबादी करीब 200 है, लेकिन कर्क रेखा का यहां से गुजरना इसे राष्ट्रीय महत्व प्रदान करता है। यह रेखा भारत के आठ राज्यों से होकर गुजरती है और करौंदी इसका प्रमुख पड़ाव है।
इस स्थान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 1987 में, जब उन्हें इस गांव के महत्व की जानकारी मिली, तो वे व्यक्तिगत रूप से यहां पहुंचे। दिसंबर 1987 में उन्होंने यहां एक स्मारक का शिलान्यास किया, जो उसी वर्ष 15 दिसंबर को पूरा हुआ। इस स्मारक में भारत का राष्ट्रीय चिह्न (अशोक स्तंभ) लगा हुआ है। चंद्रशेखर ने इस स्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की और यहां एक बड़ा पार्क तथा स्मारक बनवाया, जिससे इसे पर्यटन का दर्जा मिला।
उनकी यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों ने बताया कि चंद्रशेखर ने इस गांव को ‘भारत का हृदय’ कहते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय आदर्श कृषि नगर बनाने की योजना बनाई। उन्होंने यहां आधा एकड़ में एक आश्रम भी स्थापित किया, जिसका प्रबंधन बाद में भारत यात्रा केंद्र ट्रस्ट को सौंपा गया। हालांकि, जमीन की उपलब्धता न होने और अन्य कारणों से यह योजना पूरी नहीं हो सकी। आज भी यह आश्रम बदहाली का शिकार है। पूर्व प्रधानमंत्री की इस पहल ने गांव को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी, लेकिन विकास कार्यों की कमी से उसकी यादें धुंधली पड़ रही हैं।
पर्यटन की अपार संभावनाएं, लेकिन विकास शून्य
कटनी जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर करौंदी को ‘देश का भौगोलिक केंद्र’ के रूप में प्रमुख पर्यटन स्थल बताया गया है। इसे पर्यटन मेगा सर्किट में शामिल किया गया, जिसमें जबलपुर संभाग के ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थलों का विकास होना था। 2013 में तत्कालीन विधायक ने आधारशिला रखी, और 2018 में ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा (आरईएस) ने कलेक्टर फंड से 61 लाख रुपये की सुंदरीकरण योजना बनाई।


लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। स्मारक के आसपास कचरा बिखरा रहता है, रखरखाव का अभाव है, और विकास कार्य अधर में लटके हैं। ग्रामीण रामलाल पटेल जैसे लोग कहते हैं कि ‘राष्ट्रीय महत्व का यह स्थल केवल सजावटी पत्थरों तक सीमित रह गया।’ पर्यटक आते हैं, लेकिन सड़क, प्रकाश, बोर्ड और गाइड की कमी से निराश लौट जाते हैं।
प्रशासन की उदासीनता और स्थानीय मांगें
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट की कमी और प्रशासनिक उदासीनता मुख्य कारण हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने कई स्थलों को विकसित किया, लेकिन करौंदी जैसे राष्ट्रीय महत्व के स्थल उपेक्षित रहे। नागपुर का जीरो माइल स्टोन आज भी प्रसिद्ध है, जबकि विभाजन के बाद नया केंद्र बना करौंदी भुला दिया गया।
स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि सरकार इस स्थल को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दे और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की स्मृति में इसे उचित सम्मान प्रदान करे। यदि यहां बुनियादी सुविधाएं, इको-टूरिज्म और प्रचार होता, तो यह देशभर के पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बन सकता था।
करौंदी गांव की बदहाली एक बड़ा सवाल उठाती है – क्या हम अपने राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जैसी हस्तियों से जुड़े स्थलों की रक्षा करने में सक्षम हैं? प्रशासन को अब जागना होगा, वरना यह अनमोल धरोहर समय की धूल में खो जाएगी।

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