संवाददाता:-हर्षल रावल
सिरोही/राज.
सिरोही के झाड़ोली वीर में विराजते हैं काशी के विश्वनाथ, यहां की महिमा अपरम्पार हैं।।

सिरोही। जिले के शिवगंज तहसील में बसा झाड़ोली वीर ग्राम में अतिप्राचीन एवं लोकप्रिय महादेव का तीर्थ स्थल है। काशी विश्वनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंग में काशी विश्वनाथ का बडा विशेष महत्व दिया गया हैं।
वही महत्व वोवेश्वर महादेव का है, जो पुण्य फल सौमवती अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा, शिवरात्री, श्रावण मास में शिव आराधना का फल काशी में प्राप्त होता है, वही महात्म वोवेश्वर महादेव पुण्य धाम का है। मंदिर की प्रसिद्धि में महान पुण्यात्मा निरंजन तपोपुरीजी का योगदान हैं।
साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप सुहाय, सार-सार तो लेयले, और थोडा देय उडाये, करणी ऐसी कीजिये कि नाम अमर हो जाए।।
ऐसे ही महान् सिद्ध पुरुष हुए निरजंन तपोपुरीजी झाडो़ली वीर की सुरम्य पहाड़ियों में कल-कल बहते झरने, घनी अंधेरी काली रातें, हाङ-मांस को कंपाने वाली ठंडी हवाएं, भीषण गर्मी शेर चीतों के दहाङने की भयावनी आवाजें नाना प्रकार के कष्टों को झेलते हुए तपोपुरीजी ने महादेव की कठोर तपस्या की। साधु के तप की सिद्धि कुंभ मेले में परख के पश्चात सिद्ध होती है। संपूर्ण एक युग शिव तपस्या कर तपोपुरीजी प्रयागराज के कुंभ मेले में पैदल महिनों तक चलकर गये। कुंभ में जाकर उन्होंने अपने गुरुओं, संत महात्माओं आचार्यों, शंकराचार्यों को अपना जीवन परिचय दिया तथा अपने कर्म स्थली झाडोली वीर वोवेश्वरजी महादेव के बारे में वृतांत सुनाया तो काशी के पंडितों-ब्राह्मणों ने एवं सिद्ध योगी, संत-महात्माओं एवं धर्म गुरुओं ने अपनी दिव्य दृष्टि से वोवेश्वरजी महादेव जी का सारा वृतांत इस प्रकार बखान कर सुनाया किः-

१). गांव झाडो़ली वीर व मणादर के खेतों का नाम वीर है, जहाँ गेहुँ-चने की उपज होती है।
२). झाडो़ली के झाडो़ला पहाड में निर्मल झरने की राह में भोलेनाथ काशी विश्वनाथ श्री वोवेश्वरजी महादेवजी का अति प्राचीन मंदिर स्थित है।
३). महादेव जी के श्री चरणों में दुग्ध वर्णनी गंगा बहती है।
४). जिस पर्वत में भगवान भोलेनाथ शिवशंकर श्री वोवेश्वर महादेवजी विराजमान है, वह तांबे का पहाड है।
५). मंदिर में स्थित पीपल के वृक्ष पर स्वर्ण (सोने) के पत्ते हैं।
*तपोपुरीजी निरंजन महाराज ने काशी के महात्माओं
की क्रम संख्या १ व २ की बातें तो सत्य मानी, किंतु ३, ४, ५ के लिए उन्होंने फरमाया कि, मैंने उपरोकत चमत्कार नहीं देखे है। तब शांत स्वभाव से आदरपूर्वक काशी के महात्माओं ने निरंजन तपोपुरीजी से आग्रह किया कि आप पुनः अपने कर्म स्थान वोवेश्वर महादेव जी पधारे और एक तुम्बी में वहां की गंगा का जल पहाड के कंकर और पीपल के दो पत्ते डाल कर तुम्बी पर कपडा बांध कर अपनी छडी सहित कुण्ड में विसर्जित कर दिखावें।
प्राचीन समय में आवागमन के कोई साधन नहीं थे। अतः पैदल चल कर धीरे-धीरे वर्ष-छःमास में पुनः वोवेश्वर महादेव जी झाडो़ली वीर पहुँचे और काशी के महात्माओं के बताए अनुसार वैसा ही कर अपनी तुम्बी व छडी कुण्ड में विसर्जित कर दी और वहीं कर्म धीरे-धीरे पुनः काशी की तरफ प्रस्थान कर दिया।
कालान्तर में समय विचरण होने पर काशी पहुंचे और अपने घाट पर जाकर महात्माओं सहित देखा तो वर्ष भर पूर्व झाडो़ली वीर वोवेश्वरजी महादेव के कुण्ड में प्रवाहित की हुई छडी अत्यंत तरोताजा निकली तथा तुम्बी से वस्त्र हटाकर देखा तो ताजा गाय का निकाला हुआ दूध तथा तांबे के कंकर व सोने के पत्ते निकले यह चमत्कार देखकर निरंजन तपोपुरी जी आश्चर्य चकित रह गये और काशी विश्वनाथ श्री वोवेश्वर महादेव की जय-जयकार करने लगे। तब काशी के महात्माओं ने फरमाया कि देखा- तपोपुरीजी वोवेश्वरजी महादेव का पर्चा देखा। कितना अद्भुत चमत्कारी है,

आपका काशी विश्वनाथ वोवेश्वर महादेव की वस्तु स्वतः ही काशी पहुँच गयी, काशी के महात्माओं ने कहा कि- जो पुण्य आपको यहाँ आने से मिला है, वह तो आपको वोवेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन पूजा-अर्चना से ही प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार तपोपुरीजी ने चार फेरे काशी के किए एवं अपनी भक्ति के संचय कर कुछ भ्रम हुआ कि मेरी आराधना अधूरी थी।
जिसमें मैं इन दिव्य वस्तुओं को नहीं पहचान पाया और घोर तपस्या में लीन हो गये। कहते है कि काशी में मृत्यु से सीधा मोक्ष मिलता है। काशी में प्रतिदिन महाकाल, उज्जैन में नये कंकाल की भस्म चढती है एवं भस्म श्रृंगार होता है। तो यहाँ श्री वोवेश्वर महादेव जी के चरणों में भी ३६ कोम की जाति के मुक्ति-धाम है।
तदुपरांत तपोपुरीजी ने चमत्कारी शिवलिंग का रहस्य जाना कि वोवेश्वर महादेव के शिवलिंग के अभिषेक के जल से हाईड्रोफोबिया का उपचार संभव है। अर्थात् पागल कुत्ता काटने के उपचार हेतु महान तपस्वी निरंजन तपोपुरीजी ने मंत्र उच्चारण से छोटी कुण्डी की स्थापना की। जिसमें शिवलिंग के अभिषेक का जल एकत्रित होता है। उसको मंत्रों द्वारा उपचारित किया गया, उस कुण्ड के जल के आचमन से कुत्ता काटने का उपचार संभव होता है। इसका जल ग्रहण करने
के लिए दूर प्रदेशों से यात्री एवं यहां तक प्रतिदिन आते रहते हैं। मैने स्वयं ने यहां डॉक्टरों को आते देखा है और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर जाते हैं।

महान योगीराज तपस्वी निरंजन तपोपुरीजी महाराज ने
मानव मात्र को अपने अहंकार को मन से निकालने के लिए स्वयं
का चेहरा शिवशंकर के चरणों में उत्कीर्ण करवाया। जहाँ दर्शन के समय यात्रीयों के चरण रहते हैं। धन्य है ऐसे महापुरुषों को कोटि-कोटि वंदन निरजंन तपोपुरीजी को।
वर्तमान मंदिर का जिर्णोद्धार निर्माण:-
संवत् २०००, अष्टमी, शुक्ल पक्ष, माघ, में बजरंग पुरिजी की वार में महाराजा स्वरुप सिंहजी द्वारा २८/०२/१९४४ में करवाया गया।
मंदिर में विराजमान देवता:-
दांयी बाजू से अखण्ड ज्योति… श्री गणपति, माता पार्वती जी, भगवान विष्णु जी, महालक्ष्मी जी, ब्रह्मा जी। मध्य में स्वयं भू स्वयं काशी विश्वनाथ श्री वोवेशवर जी महादेव चरणों में तपोपुरिजी का चेहरा उत्कीर्ण किया हुआ सन्मुख-दण्ड, त्रिशुल-दो नन्दी, चरण पादुकाओं में गंगाजल, कुण्ड जिसका जल किसी भी परिस्थिति में समाप्त नहीं हुआ है।
अन्य मंदिर:-
सिद्धि विनायक गणपति, वैद्यनाथ महादेव, नौग्रह शनिदेवता, सूर्य भगवान, श्री हनुमान जी, गणपति जी, एकाम्ब्रेश्वर महादेवजी चेन्नई वाले, पाँचो पाण्डव, शेषनाग, द्वारकाधीश, निरंजन तपोपुरीजी की जीवित समाधि, भण्डारा, अंदर कोठर में साधुओं की हिंगलाज माता मंदिर जो वर्ष में दो बार दोनो नवरात्री में खुलता है। मंदिर में महंतों की धूणी व पूजनीय पाट चौक में शोभायमान अखण्ड सौभाग्य व आयुष्मान पीपल का विशाल वृक्ष जो युग युगांतर इसी रूप में वर्षों पुरानी शाखाएं सूखने पर नई तैयार होती है, इस प्रकार अविरलरूप अनव्रत धारा से चलता रहता है, पीपल के सोने पत्ते आज भी विद्यमान है जो भक्तों को शिव मेलों पर दर्शन में दिखते हैं।
अन्य :-
वटवृक्ष बरगद व नीम नारायण के पेड है। विभिन्न जाति धर्म की धर्मशालाएं बनी हुई हैं और बन रही है, यहाँ दरवाजे में अति मनमोहक हवा आती है। जो प्रत्येक यात्री को हर्षाती है। मंदिर में सुंदर महल, झरोखे अतिप्रिय लगते हैं। उपरोक्त समस्त दर्शन आप स्वयं पधारकर भी अनुभव कर सकते हैं। आगे विशाल चौक मेला त्यौहारों के लिए है। मंदिर में पूजा-अर्चना झाडोली एवं मनादर गावं के दो ब्राह्मण पंडित जी मिलकर किया करते हैं। मुख्य मेले सबसे बडा मेला प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को लगता है, शिवरात्री में निर्जला एकादशी के दिन, हरियाली अमावस्या को, संपूर्ण श्रावण मास में मेले जैसा ही वातावरण बना रहता है। प्रति सोमवार को साप्तताहिक मेला लगता है, प्रत्येक पूर्णिमा को महिलाएं अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए नारियल व कलश चढाने बडी संख्या में आती रहती है। इस प्रकार १२ मास मंदिर में रेल-पेल रहती है।
भण्डारा :-
बाहर गांव से आने वाले यात्रीयों के लिए भण्डारा सदा आरंभ रहता है। संपूर्ण गांव से भण्डारे के लिए दो बार अनाज एकत्रित होता है। भण्डारे की वर्ष का निर्माण संवत् १८२४ में ठाकुर जालम सिंहजी द्वारा करवाया गया था।
गुफाएं :-
यहाँ अन्तर्ध्यान हेतु मंदिर बाहर पहाड में गुफा भी बनी हुई है। जहाँ ओमकार भारती जी व देवानंद ब्रह्मचारी जी सियाणा वालों ने यहाँ कठोर तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की हुई है। यहाँ के सिद्ध पुरुष साधु महन्त दरियापुरजी, बजरंगपुरीजी, जोरावरपुरीजी व अन्य महात्मा अत्यंत प्रसिद्ध व सिद्ध हुए है। वर्तमान में महंत श्री रूपपुरीजी, अन्य कैलाशपुरीजी, मगनपुरीजी व मंगलपुरी जी साधु मंदिर में विराजमान है।
‘इस प्रकार श्री वोवेश्वरजी महादेव जी का वर्णन अपार है जो कोई सत्य मन से आकर आराधना करता है। उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।
विवेक और बुध्दि के प्राप्ति के अनुसार श्री वोवेश्वर महादेव जी के स्थापना की कोई प्रमाणित तिथि संवत् मिलना संभव नहीं हुई। जब
हिमालय का पुत्र मैनाक (नंदीवर्धन) (आयु) की ब्रह्म खाई को पाटने के लिए आबूराज भेजा गया होगा। तब मैनाक (नंदीवर्धन) द्वारा ३३ करोड
देवी-देवताओं को अपने मस्तिष्क पर विराजमान होने का अर्बुदा वचन लिया। तत्कालिन समय में आबूराज पर ३३ करोड देवी-देवता विराजमान हुए तथा आबू एवं सिरोही जिले में करीब-करीब अधिकांश
पहाड़ियों में भगवान भोलेनाथ शिवशंकर विराजमान हुए। झाडोली (वीर) स्थित श्री वोवेश्वरजी महादेव जी मंदिर
श्री आबूराज संत सेवा मंडल में आज भी गिना जाता है। यह मंदिर आबू व सिरोही जिले के अंतिम छोर पर है, यहाँ से १४ कि.मी. पर जालोर जिला प्रारंभ हो जाता है। गुरू शिखर, दांतराई, श्री हमीरपुर (गुजरात) बिल्लेश्वर व झाडोली वीर के वोवेश्वर जी ये पाँचों मुख्य मठाधीश आबू में मुख्य कर्णधार है। आदिकाल से दृष्टि डाले तो यहाँ पाँचों पाण्डवों के देवालय हैं। जो स्पष्ट जाहिर है। पांडवो ने भी यहाँ अपना अल्प कालीन पडाव रखा है (किवदंती के अनुसार) कहते हैं कि पांडवों ने १२ वर्ष तक वावेश्वर महादेव जी झाडो़ली वीर में तपस्या की। किंतु यह सिद्ध नहीं माना जाता। क्योंकि पांडवों के कुल १३ वर्ष का ही वनवास था। उन्होने और भी कई स्थानों पर विचरण किये है। अतः यह माना जाता है कि अज्ञात दास के दौरान सोमवती अमावस्या को यहाँ काशी के कुण्ड के जल से स्नान का विशेष महत्व होने से यहाँ रुके किंतु सोमवती नहीं आने से सोमवती को कलयुग में बेकद्र होने का श्राप देकर प्रस्थान हो गए।
पांडवों के देवालयों से यह अनुमान लगया जाता है कि द्वापयुग में भी यह शिवालय दुर्गम और सुरम्य पहाडियों में था।
झाडो़ली वीर के माल की पहाडियों में सोलंकी व परमार का साम्राज्य १३वी सदी में करीब ८०० वर्ष पूर्व रहा हैं, इसका उल्लेख माल (पर्वत) के खण्डहरों से मिलता हैं तथा बड़वों की बहियों में भी मिलता हैं।
गांव झाड़ोली वीर की स्थापना १६वीं सदी में हुई है। सवंत् १६१० में वजाजी देवडा़ हुए। सवंत् १७०१ में ठाकुर कृष्णदास वजावत को झाडो़ली वीर पाट में मिली। तब से श्री वोवेश्वर महादेव जी को कुलदेवता मानने लगे।
नामकरण:- वोवेश्वर महादेव जी
प्रभु के पचास नाम, हरि के नाम, साँवरिया शेष नाम, महादेव के अनंत नाम इसी प्रकार महादेव काशी विश्वनाथ का नामकरण हुआ श्री वोवेश्वर महादेव जी
कहते हैं कि गांव मनादर के वोवरिया जाति के पुरोहित महादेव भक्त थे और वो दर्शन के लिए आते रहते थे। एक दिन शिवलिंग को देखकर वावरिया जाति के लोगों के मन में मंछा हुई कि शिवलिंग को यहा से निकाल दे, तथा आस-पास से अनंत बिच्छू निकलने लगे तथा आकाशवाणी हुई कि- “इसे खोदो मत और यहां महादेव मंदिर बनाओ” वोवरिया जाति को प्रकट होने पर से श्री वोवेश्वर महादेव जी नामकरण हुआ।
✅ यह जानकारी अत्यंत कठिनाई से संग्रह की गयी हैं। यह चमत्कारी श्री वोवेश्वर महादेव जी झाडो़ली वीर की जानकारी समस्त भक्तजनों तक पहुंचाऐं।
















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