सत्यार्थ न्यूज श्रीडूंगरगढ़-सवांददाता ब्यूरो चीफ
भारत में अलग-अलग धार्मिक त्योहार के दौरान कुछ अनोखे रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है, जिनमें से एक खास पर्व है बासोड़ा यह पर्व विशेष रूप से शीतला माता की पूजा के रूप में मनाया जाता है और इस दिन बासी भोजन का प्रसाद अर्पित किया जाता है। हर साल होली के ठीक बाद,जब रंगों का त्योहार समाप्त होता है,तब शीतला अष्टमी (बासोड़ा) का पर्व आता है। यह एक ऐसा खास दिन है। जब शीतला माता की पूजा होती है और भक्त उन्हें बासी भोजन का भोग अर्पित करते हैं। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है और यह माना जाता है कि शीतला माता का पूजन करने से व्यक्ति को बीमारियों से छुटकारा मिलता है और वह स्वस्थ रहता है। आइए जानते हैं इस साल बासोड़ा कब है। इसकी महत्ता और इस दिन से जुड़ी खास परंपराओं के बारे में
माहात्म्य
प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी शीतला का वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश,सूप मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। चेचक का रोगी व्यग्रतामें वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत:कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है,साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है।
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
अर्थात
गर्दभ पर विराजमान,दिगम्बरा,हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली,सूप से अलंकृत मस्तकवालीभगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत:स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी [झाडू] होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता अनुसार इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर पीतज्वर,विस्फोटक दुर्गन्धयुक्त फोडे,नेत्रों के समस्त रोग शीतलाकी फुंसियों के चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं।
विधान
शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलता है। आज भी लाखों लोग इस नियम का बड़ी आस्था के साथ पालन करते हैं। शीतला माता की उपासना अधिकांशत वसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में होती है। शीतला (चेचक रोग) के संक्रमण का यही मुख्य समय होता है। इसलिए इनकी पूजा का विधान पूर्णत सामयिक है। चैत्र,कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है। इसलिए यह दिन शीतला सप्तमी और शीतलाष्टमी के नाम से विख्यात है। आधुनिक युग में भी शीतला माता की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा देने के कारण सर्वथा प्रासंगिक है। भगवती शीतला की उपासना से स्वच्छता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा मिलती है।
शीतला अष्टमी का क्या है महत्व
अब शीतला अष्टमी का महत्व क्या है ये भी जान लेते हैं। इस दिन बासी खाना बनाकर मां शीतला को उसका भोग लगाया जाता है। कहा जाता है कि शीतला अष्टमी के दिन आग नहीं जलाई जाती इसलिए रात में ही खाना बना लिया जाता है जिसका अगले दिन भोग लगाया जाता है। इसके पीछे की एक वजह ये भी बताई जाती है कि ठंडा खाना खाने से पेट को ठंडक मिलती है और पाचन तंत्र भी ठीक रहता है। शास्त्रों के अनुसार,मां शीतला अपने भक्तों की रोगों से रक्षा करती है,इसलिए लोग रोग-दोष से मुक्ति के लिए सच्चे मन से पूजा-अर्चना करते हैं।
कैसे करें पूजा
अब ये जान लेते हैं कि मां शीतला की पूजा कैसे करनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले एक दिन पहले ही खाना तैयार कर लें। पूजा के लिए थाली में मीठी रोटी,चावल,मूंग की दाल,रोली,मोली,चावल,दही, चीनी,और जल लें। अब इन सभी सामग्री से मां शीतला की पूजा करें। शीतला स्त्रोत का पाठ करें जिससे रोग दूर हो जाएं। पूजा में इस्तेमाल किया हुआ जल सभी की आंखों में लगाएं। इस तरह से पूजा करने से सुख,समृद्धि एवं धन, वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। शीतला सप्तमी के दिन माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और उनकी विधिवत पूजा की जाती है। कुछ जगहों पर शीतला अष्टमी पर मां शीतला को बासी भोजन का भोग लगाकर बासौड़ा मनाते है।
शीतला सप्तमी और अष्टमी कब है,पूजन मुहूर्त-
इस वर्ष शीतला सप्तमी का प्रसाद 20 मार्च गुरुवार को बनाया जाएगा शीतला पूजा एवं बासोड़ा 21 मार्च शुक्रवार को किया जाएगा।
शुभ मुहूर्त –
चर – सामान्य: 06:24 am से 07:55 am
लाभ – उन्नति: 07:55 am से 09:26 am
अमृत – सर्वोत्तम: 09:26 am से 10:57 am
शुभ – उत्तम: 12:28 pm से 02:00 pm
पंचांग के अनुसार,21 मार्च, शुक्रवार को मनाई जा रही है। इसका समय सुबह 2 बजकर 45 मिनट से लेकर 4 बजकर 23 मिनट तक होगा। इस दिन शीतला माता की पूजा का मुहूर्त सुबह 5:37 से 6:40 बजे तक है। वहीं,शीतला अष्टमी 22 मार्च, शनिवार को होगी,जिसका समय सुबह 4:23 से लेकर 23 मार्च,रविवार को सुबह 5:23 बजे तक रहेगा इन दोनों तिथियों में से कोई भी तिथि जो व्यक्ति के लिए सुविधाजनक हो,उसे पूजा करने के लिए चुना जा सकता है।
नोट-अधिक जानकारी के लिए आप ज्योतिषाचार्य पण्डित बनवारीलाल पारीक से संपर्क कर सकते है।
📱➡️+9194611 10599


















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