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दुर्गूकोंदल क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया लोक आस्था का पर्व छेर-छेरा पुन्नी

सुरज मंडावी                                             दुर्गूकोंदल क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया लोक आस्था का पर्व छेर-छेरा पुन्नी

 

 

कांकेर जिले के विकासखंड दुर्गूकोंदल अंचल में छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध लोक पर्व छेर-छेरा धूमधाम से मनाया गया। यह पर्व विशेष रूप से पौष महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो कि नई फसल की कटाई के बाद का समय होता है। यह त्यौहार अन्नदान और समाज में समरसता की भावना को प्रोत्साहित करने का पर्व है। हर साल की तरह इस बार भी दुर्गूकोंदल के विभिन्न क्षेत्रों में बच्चे और युवाओं की टोली घर-घर पहुंचकर छेर-छेरा पुन्नी गीत गाते हुए डंडा नृत्य कर रहे थे और अन्नदान की मांग कर रहे थे।

 

पारंपरिक महत्व और कृषि प्रधान संस्कृति का प्रतीक

 

छेर-छेरा पुन्नी त्यौहार छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे अन्नदान के महापर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें किसान अपनी पूरी सालभर की मेहनत से उपजाए गए धान का दान करते हैं। इस दिन लोग अपने घरों में अन्न का दान करते हैं, जिसे पवित्र कार्य माना जाता है। यह पर्व न केवल दान देने के महत्व को दर्शाता है, बल्कि समाज में एकता और समरसता को भी बढ़ावा देता है।

 

सामाजिक समरसता और लोक परंपरा का पालन

 

दुर्गूकोंदल क्षेत्र में इस दिन की विशेषता यह थी कि लोग घर-घर जाकर “छेरछेरा कोठी के धान ला हेरते हेरा” कहते हुए अन्न दान की मांग करते हैं। इस अवसर पर घरवाले उन्हें धान, चावल और नकद राशि देकर दान करते हैं। इसके साथ ही, डंडा नृत्य करने वाली टोली को गांव-गांव में बडी मात्रा में दान मिलती है। विशेष रूप से, इस दिन ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों के युवक और युवतियां पारंपरिक डंडा नृत्य कर समाज में एकता और खुशहाली का संदेश फैलाते हैं।

 

धार्मिक मान्यता और पुण्य लाभ

 

धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह दिन महत्वपूर्ण है। इस दिन हर किसान अन्नपूर्णा देवी और मां शाकंभरी देवी की पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति बच्चों को अन्न दान करते हैं, वे जीवन के सभी बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

 

त्योहार की खासियत और उल्लास

 

छेर-छेरा पुन्नी के दिन पूरे दुर्गूकोंदल अंचल में उत्सव का माहौल होता है। घर-घर अन्न दान देने की परंपरा के साथ-साथ लोग एक दूसरे के घरों में व्यंजन भी तैयार करते हैं। इस दिन मुर्रा, लाई, तिल के लड्डू समेत अन्य पारंपरिक खाद्य सामग्री की बिक्री जोरों पर होती है। लोग खीर और खिचड़ा का भंडारा भी आयोजित करते हैं, जिसमें हजारों लोग प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

 

समाज में समरसता और एकता का प्रतीक

 

संजय वस्त्रकार, एक वरिष्ठ व्याख्याता ने बताया कि छेर-छेरा पुन्नी क पर्व छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति में दानशीलता की परंपरा को याद दिलाता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ में सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का एक माध्यम बन चुका है, जो लोगों को आपसी भाईचारे और सहयोग की भावना से जोड़ता है।

 

इस प्रकार, छेर-छेरा पुन्नी केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपराओं और एकता का जीवंत उदाहरण है। इस दिन अन्न दान के साथ-साथ समाज में भाईचारे और समरसता का संदेश भी फैलता है, जो समाज की शक्ति और एकता को प्रगाढ़ बनाता है।

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