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धार्मिक आस्था : गीता कहती है क्षिप्रं भवति धर्मात्मा। नवे अध्याय का 31 वां श्लोक है।

• गीता कहती है क्षिप्रं  भवति धर्मात्मा। नवे अध्याय का 31 वां श्लोक है।

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अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: || 30||

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति || 31||

क्षिप्रं का अर्थ होता है *तत्काल*। क्षिप्रं इतना समय होता है कि एक पान का पत्ता हो उसमें आप सुई डालें। तो सुई उसको टच करेगी, उसका भेदन करेगी और पान के दूसरी तरफ जाएगी। कितना समय लगता है इस काम मैं , एक क्षण से भी कम!

इतने समय में, आप धर्मात्मा हो जाते हैं। कौन धर्मात्मा हो जाता है! ,पापी से पापी व्यक्ति भी। तत्काल प्रभाव से अति पापी भी हाथों-हाथ उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है। अब बताओ ऐसी गीता की अलोकिक कृपा है मानव जाति पर जीवो पर आत्माओं पर प्राणियों पर। ऐसे ऐसे तरीके बताएं गीता ने। और हम श्रवण मनन , गीता /भागवत मैं ये लिखा हुआ है वो लिखा हुआ है आत्मा ही परमात्मा है ये है वो है ये सब करते रहते है। पूरे जन्म निकल जाते हैं , सज्जनों। सतयुग में भी हम थे। त्रेता में भी हम थे। द्वापर में भी हम थे ,अभी भी हम है , हमारा उद्धार नहीं हुआ है। 

क्यों? क्योंकि? *गीता को धारण नहीं किया। समझा नहीं*। यह तो तत्काल होने वाली वस्तु है। अभी यह बिजली का बटन दबाया यह ट्यूब लाइट जली! गीता के 9 अध्याय के ३० और 31 श्लोक के बारे में बात कर रहा था। तो भगवान ने कहा कि “क्षिप्रं भवति धर्मात्मा” तत्काल यू चुटकी बजाते ही। तो वो कैसे होता है?

वह ऐसे होता है। कि जीव यह मान्यता कर लेता है। कि *मैं भगवान का हूं, भगवान मेरे हैं और कोई मेरा नहीं है*। वह ऐसा मान लेता है जड़ता से। तो भगवान कहते हैं कि वो कैसा भी पापी से पापी हो उसके मानने से कोई पाप होने बंद तो नहीं हो गए । उसका अंतःकरण कोई शुद्ध नहीं हो गया। कुछ नहीं हुआ। लेकिन उसने मान लिया। “भजते मामनन्यभाक् ” अब मैं तो केवल भगवान का हूँ। भगवान मेरे हैं। तो “सम्यग्व्यवसितो ” तो उसने निश्चय बड़ा बढ़िया कर लिया और यह निश्चय बुद्धि नहीं कर रही है सज्जनो। अध्याय ९ श्लोक 29 के अंदर यह जो ज्ञान योग में अहम् ब्रह्मास्मि पर जाते हैं ना ,तो अहम ब्रह्मास्मि जो निश्चय करती है, वह उनकी बुद्धि करती है। यहां जो निश्यय कर रहा है ना वह उनकी बुद्धि नहीं कर रही है। यह निश्चय स्वयं शुद्ध चेतन आत्मा कर रही है। मान्यता में क्रिया नहीं होती। आपने अपने पिता को अपना माना उसमें आपने क्रिया क्या की ? क्रिया कुछ नहीं मान लिया।

एक छोटा दो 2 महीने का बालक भी मां को अपना मान लेता है। उसमें कौन सा भजन किया है। कौन सा अंतःकरण शुद्ध किया है। कौन सा जाना है क्या जाना मान लिया बस मान लिया तो मान लिया बस ।

तो वो ये मान लेता है कि “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” अब मानने में कितना समय लगता है “क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |”। यह भगवान के दिव्य वचन है दिव्य वचन। अलौकिक वाणी है। क्षिप्रं – हाथो हाथ तो आप अभी नक्की कर ले

 कि मैं शरीर नहीं हूं, शरीर मेरा नहीं है। तो अब भी आप इसी क्षण मुक्त हैं। जब आप शरीर नहीं है। तो कामना किस बात की? आप शरीर नहीं है, संसार नहीं है। शरीर संसार आपका नहीं है। आप शरीर संसार के नहीं है। आपके भगवान हैं। आप भगवान के हैं यह आपने जड़ता पूर्वक मान लिया जो सच्ची बात। अब मुझे बताइए कि आपने यह मान लिया। अब आपके कामना किस बात की रही ?

भूख लगी है तो शरीर को चाहिए जिसने शरीर दिया और वह पालेगा नहीं तो अपना शरीर वापिस लेगा । आपको क्या फर्क पड़ा? आप तो मरोगे नहीं जिओगे नहीं! है ना? अहंकार किस बात का रहा ? जब आपका कुछ है ही नहीं? तो आपमैं अहंकार किस बात का?

घमंड किस बात का रहा? आपका कुछ है ही नहीं। तो घमंड किस बात का? मोह किस बात का रहा ? *कोई अपना है ही नहीं तो मोह किसका? ममता किस बात की रही आपमैं* ? शरीर आपका नहीं है ममता8ई ची ममता टिकेगी कहां पर जाकर?

• आपका कोई है ही नहीं अब ममता किससे ?

ईर्ष्या किस बात की रही आप मैं ? आप मैं कोई दुर्गुण नहीं रहा, कोई दुर्गुण नहीं रहा। *क्योंकि सारे दुर्गुण! सारी आसुरी संपदा इस शरीर को मैं और मेरा मानने से आती हैं*। लिख लीजिए इस बात को। अब आप शरीर को अपना मान ही नहीं रहे तो भाई किस बात का डर किस बात का?

चिंता किस बात की? मोह किस बात का क्रोध किस बात का जब कोई कामना नहीं है तो क्रोध किस बात का लोभ किस बात का कुछ है ही नहीं आपका तो लोभ किस बात का? तो आप उसी क्षण धर्मात्मा हो गए। धर्मात्मा किसको बोलते हैं जिसमें कोई दुर्गुण नहीं हो?

 कोई बुरी बात नहीं हो जिसमें उसको धर्मात्मा बोलते।अब आप में क्या बुरी बात रही है आप बताओ आप खुद सोच कर बताओ कि आपने अगर अभी यह निश्चय कर लिया। “सम्यग्व्यवसितो ” तो उसने निश्चय बड़ा अच्छा कर लिया। “अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्” भगवान कहते हैं उसको साधु ही मान लो , अरे उसने अभी पाप कर्म किया है। भगवान कहते है नहीं ,तुम उसको साधु ही मान लो , क्यों मान लो, क्योंकि उसने मान्यता बहुत सही कर ली है। सही रास्ते चल गया है कि मैं तो मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई कितनी बढ़िया बात कितनी विलक्षण बात कितनी मार्मिक बात कैसी संतों की कृपा है मानव जाति पर। कैसी गीता की कृपा है हम लोगों पर?

और ये सच्ची बात है। इसमें कोई हां आप यह पूछ सकते हैं कि मानना कैसे होता है? मानने में क्या-क्या चीजें होती है वह एक अलग बात है। लेकिन मानने में कोई क्रिया नहीं होती और कोई समय नहीं लगता। “क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति” तुरंत शांति को प्राप्त हो जाता है।

राम राम राम!

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