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मथुरा , केशव कृपा धाम सतघड़ा में भगवान नरसिंह की लीला का हुआ मंचन

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गोपाल चतुर्वेदी मथुरा ,

केशव कृपा धाम सतघड़ा में भगवान नरसिंह की लीला का हुआ मंचन

www. Satyarath.comसप्त पुरियां मैं श्रेष्ठ मथुरा पुरी मै भगवान कृष्ण की बाल लीलाएं देखने और सुनने को मिलती है साथ ही मथुरा पुरी मै भगवान नरसिंह अवतार की लीला बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत की जाती रही है भगवान नरसिंह की लीला का मंचन मथुरा के पुण्य तीर्थ विश्राम घाट के पास केशव कृपा धाम सतघड़ा मै बहुत सुंदर तरीके से किया गया। जिसमे भगवान नरसिंह की भूमिका राघव चतुर्वेदी ने की भगवान नरसिंह का स्वरूप वही धारण कर पाता है जो नियम संयम का भली भांति पालन कर सके। भगवान नरसिंह लीला मै ताड़का, गणेश,महादेव, ब्रह्म जी के भी स्वरूप का अभिनय किया जाता है भक्तो मै खास कर युवा वर्ग गर्म जोशी के साथ गगनभेदी स्वर मै नरसिंहा नाचे गली गली जैसे गीतों को भी गाते रहते है भगवान नरसिंह के अवतार के बारे मैं सनातन धर्म में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं जिसमें भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लिए हैं. भगवान श्री हरी विष्णु ने हर युग में अपने भक्तों को मुसीबत से उबारने और धर्म की रक्षा करने के लिए अवतार लिए हैं. उन्हीं में से एक है नरसिंह अवतार नरसिंह अवतार भगवान विष्णु के मुख्य दस अवतारों में से एक है. भगवान नरसिंह को शक्ति और पराक्रम के देवता के रूप में जाना जाता है. पुराणों में उल्लेख मिलता है की वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान नरसिंह ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था. तो चलिए जानते है कौन है भक्त प्रह्लाद और क्यों भगवान विष्णु को लेना पड़ा नरसिंह अवतार।

हिन्दू पौराणिक मान्यतों में दो अतिबलशाली दैत्यों के बारे में उल्लेख मिलता है. जिनका नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप था. हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर वध किया था, और उसी के वध का बदला लेने के लिए हिरण्यकश्यप ने कठोर तप कर ब्रम्हाजी से वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई देवता, देवी, नर, नारी, असुर, यक्ष या कोई अन्य जीव, न दिन में, न रात में, न दोपहर में, न घर में, न बाहर, न आकाश में और न ही पाताल में, न ही अस्त्र से और न ही शस्त्र से मार पाए. ऐसा वरदान ब्रम्हा जी से पाकर वह खुद को तीनों लोकों का स्वामी समझने लगा।
इसी हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था बालक प्रहलाद जो भगवान विष्णु का परम भक्त था. हिरण्यकश्यप जब खुद को भगवान मानने लगा तो उसने अपने राज्य में लोगों को स्वयं की पूजा करने को कहा, लेकिन प्रहलाद ने अपने पिता की बात नहीं सुनी और वो भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहा, जब यह बात हिरण्यकश्यप को पता लगी तो उसने अपने पुत्र को समझाया कि उसका पिता ही ईश्वर है वो उसकी भक्ति करे उसकी ही पूजा करे. हिरण्यकश्यप के कई बार मना करने पर भी भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी. इस बात को हिरण्यकश्यप ने अपना अपमान जान कर अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को मारने के लिए आदेश दिया. जलती अग्नि में वह प्रहलाद को लेकर बेठ जाये. होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती, लेकिन जब होलिका भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठी तो भगवान विष्णु की कृपा से वह खुद उस आग में जलने लगी और भक्त प्रहलाद का आग बाल भी बांका नहीं कर पाई।इस बात से हिरण्यकश्यप क्रोधित हो गया और क्रोध में आकर बालक प्रहलाद को मारने के लिए उसे खम्बे से बांध कर तलवार उठा ली और भक्त प्रहलाद से बोला- मैं आज तेरा अंत करने जा रहा हूँ. बता तेरा भगवान कहाँ है, भक्त प्रहलाद ने शांत भाव से अपने पिता से बोले वो हर जगह है, वो इस खम्बे में है. क्रोधित हिरण्यकश्यप ने जैसे ही उस खम्बे पर तलवार से वार किया वैसे ही खंभा फटा और नरसिंह भगवान अवतरित हुए. उनका रूप देख हिरण्यकश्यप कांप उठा. नरसिंह देव, ना पूरे पशु थे और ना पूरे मनुष्य, उन्होंने हिरण्यकश्यप का वध अस्त्रों या शस्त्रों से नहीं बल्कि अपनी गोद में बिठाकर अपने नाखूनों से उसकी छाती चीर कर किया था, उस समय न सुबह थी न रात थी. नरसिंह भगवान ने भक्त प्रहलाद को अर्शीवाद दिया कि जो भी आज के दिन मेरा व्रत रखेगा वह सभी प्रकार के कष्टों से दूर रहेगा. जीवन में सुख शांति बनी रहेगी। केशव कृपा धाम सतघड़ा मै हुई भगवान नरसिंह की लीला मै प्रसिद्ध कथा वाचक हिमेश शास्त्री का विशेष योगदान रहा साथ ही युवा समाजसेवी कान्हा चर्तुवेदी के साथ गौरव,अनिरुद्ध,अनुराग,राहुल,हन्नू,ध्रुव, आदि का भी विशेष योगदान रहा लीला का मंचन देखने आए भक्तो की ठंडे शरबत की भी व्यवस्था कराई गई।

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