नैतिकता का संघर्ष: अनैतिक संसार में साधना का मार्ग
हरिशंकर पाराशर
आज का युग ऐसा है जहां नैतिकता एक दुर्लभ गुण बन चुकी है। हम एक ऐसे संसार में जी रहे हैं जहां लाभ, शक्ति और स्वार्थ की होड़ में इंसानियत कहीं पीछे छूट जाती है। लेकिन इसी अनैतिकता के घने बादलों के बीच नैतिक बने रहना न केवल एक चुनौती है, बल्कि सबसे बड़ी साधना भी है। यह साधना आत्मा की शुद्धि से जुड़ी है, जहां व्यक्ति अपने अंतर्मन से लड़ता है और विजयी होकर निकलता है। नैतिकता की परिभाषा हर व्यक्ति की अपनी होती है—किसी के लिए यह सत्य का पालन है, तो किसी के लिए करुणा और न्याय। लेकिन एक साझा सत्य यह है कि जब हम रात को सोते हैं और हमारे दिल पर कोई बोझ नहीं होता, दिमाग में कोई उथल-पुथल नहीं होती, तो समझिए कि दिन नैतिकता के साथ गुजरा है।
नैतिकता की व्यक्तिगत परिभाषा
नैतिकता कोई बाहरी नियमावली नहीं है; यह आंतरिक अनुभूति है। जब हम कुछ गलत करते हैं, तो उसका एहसास हमें खुद होता है। वह कचोट, वह असहजता, वह अंतर्मन की पुकार हमें बताती है कि हमने अपनी आत्मा के साथ विश्वासघात किया है। मैंने अपने 63 वर्षों के जीवन अनुभव से सीखा है कि जीवन को सीमित करके, अनावश्यक तनावों से दूर रहकर, हम इस कचोट से बच सकते हैं। अब जो शेष जीवन है, उसे द्रष्टा भाव में, साक्षी भाव में गुजारने का अभ्यास कर रहा हूं। यह अभ्यास आसान नहीं है। इसमें ध्यान, आत्म-निरीक्षण और निरंतर प्रयास की आवश्यकता है। लेकिन जब हम सफल होते हैं, तो जीवन एक तमाशा बन जाता है—जहां हम निर्लिप्त होकर सब कुछ देखते हैं, बिना प्रभावित हुए।
यह साधना हमें सिखाती है कि नैतिकता बाहरी दुनिया की बजाय आंतरिक शांति से जुड़ी है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग सफलता के पीछे भागते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि असली सफलता वह है जो रात की नींद को अक्षुण्ण रखे। नैतिकता का यह मार्ग व्यक्तिगत है, लेकिन इसका प्रभाव सामाजिक होता है। जब एक व्यक्ति नैतिक रहता है, तो वह समाज के लिए एक उदाहरण बनता है।
राजनीति: अनैतिकता का शीर्ष
इस देश में यदि सबसे अनैतिक कोई क्षेत्र है, तो वह राजनीति है। राजनीति, जो मूलतः जनसेवा का माध्यम होनी चाहिए, आज भ्रष्टाचार, झूठ और सत्ता की लालसा का पर्याय बन चुकी है। हमारे समय की जनता को राजनीति ने संवेदनहीन और क्रूर बना दिया है। लोग अब हिंसा, अन्याय और असमानता को सामान्य मानने लगे हैं। एक संगठित भ्रष्ट तंत्र दिन-ब-दिन मजबूत हो रहा है, जो लोकतंत्र के सभी स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—को अपने ब्लैकहोल में समाहित कर रहा है। ये स्तंभ अपने मूल अर्थ को भूलते जा रहे हैं। वे अब जनता की सेवा के बजाय सत्ता के गुलाम बन चुके हैं।
राजनीति की यह अनैतिकता समाज पर गहरा प्रभाव डाल रही है। युवा पीढ़ी अब नैतिक मूल्यों से दूर होती जा रही है। वे देखते हैं कि ईमानदारी से जीने वाले संघर्ष करते हैं, जबकि भ्रष्ट लोग ऐशो-आराम में जीते हैं। इससे समाज में नैतिक क्षरण हो रहा है। लेकिन क्या हम सिर्फ दोषारोपण करके बैठ जाएं? नहीं। नैतिकता का संघर्ष व्यक्तिगत स्तर से शुरू होता है। यदि हम खुद नैतिक रहें, तो धीरे-धीरे यह लहर फैलेगी।
प्रकृति का रहस्यमय खेल
प्रकृति सब कुछ को किस दिशा में ले जा रही है, यह समझना मुश्किल है। क्या यह अनैतिकता का अंत करने के लिए कोई बड़ा परिवर्तन लाएगी? या यह मनुष्य को उसके कर्मों का फल दिखाने का माध्यम है? हमें नहीं मालूम। लेकिन इतना तय है कि हम निर्लिप्त होकर इस तमाशे को देख सकते हैं। साक्षी भाव में रहना ही सच्ची साधना है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की अनैतिकता हमें प्रभावित न करे; हम अपनी नैतिकता की रक्षा करें।
निष्कर्ष: नैतिकता की जीत
अनैतिक संसार में नैतिक बने रहना आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं। यह एक सतत अभ्यास है, जो हमें आंतरिक शांति प्रदान करता है। हमें याद रखना चाहिए कि नैतिकता की रोशनी कभी बुझती नहीं; वह हमेशा हमें सही मार्ग दिखाती है। यदि हम सभी अपने अंतर्मन की सुनें, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा। राजनीति जैसी अनैतिक शक्तियों के सामने झुकने के बजाय, हमें अपनी साधना जारी रखनी चाहिए। आखिरकार, जीवन का असली अर्थ यही है—नैतिक रहकर जीना और निर्लिप्त होकर देखना।
यह लेख प्रकाशन के लिए प्रेषित है। यदि कोई संशोधन या अतिरिक्त विवरण की आवश्यकता हो, तो कृपया सूचित करें।
– *लेखक:* हरिशंकर पाराशर
– *दिनांक:* 25 नवंबर, 2025
















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