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पांढुर्णा जिला: क्या पाया, क्या खोया — अधूरा प्रशासन और अधूरी उम्मीदें

पांढुर्णा जिला: क्या पाया, क्या खोया — अधूरा प्रशासन और अधूरी उम्मीदें

संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश

दो वर्ष बाद भी अधिकांश विभाग छिंदवाड़ा पर निर्भर: जनता को अब भी नहीं मिला पूर्ण जिले का लाभ

पांढुरना – पांढुरना, जो कभी छिंदवाड़ा जिले का एक महत्वपूर्ण उपखंड हुआ करता था, अब मध्यप्रदेश का 55वां जिला है।5 अक्टूबर 2023 दिन गुरुवार को आखिरकार वो ऐतिहासिक पल भी आ गया जब पांढुरना को जिला मुख्यालय का तमगा मिला और जन जन के लाडले और सबके प्रिय मामाजी शिवराज सिंह चौहान तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वयं पांढुरना पधारे , और उनके स्वागत सत्कार के लिए पांढुरना की जनता ने पलक पांवड़े बिछा दिए। स्थानीय कृषि उपज मंडी प्रांगण जो की जनता जनार्दन से खचाखच भरा हुआ था , इसी प्रांगण से उन्होंने पांढुरना के प्रथम कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का भी भरे मंच से जनता से परिचय कराया था। आज पांढुरना को जिला बने 2 वर्ष पूर्ण हो गए है। पर क्या सचमुच पांढुरना जिला बन पाया?
2023 में जब राज्य सरकार ने इसे छिंदवाड़ा से अलग कर स्वतंत्र जिला घोषित किया, तो क्षेत्र की जनता में उत्साह और गर्व दोनों था। लोगों को उम्मीद थी कि अब प्रशासन नज़दीक होगा, विकास योजनाएँ सीधे यहाँ से लागू होंगी और वर्षों से अटकी परियोजनाओं को नई गति मिलेगी।

लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बाद हकीकत यह है कि — जिला बनने के बाद भी पांढुर्णा अभी “पूर्ण जिला” नहीं बन पाया है।


🔹 क्या पाया — उम्मीदों की नई शुरुआत

अब पांढुर्णा का अपना कलेक्टर और एस.पी. कार्यालय है।

सरकारी दफ्तरों, स्वास्थ्य केंद्रों, शिक्षा संस्थानों और कृषि कार्यालयों का स्वरूप धीरे-धीरे आकार ले रहा है।

स्थानीय मुद्दों पर निर्णय अब जिला स्तर पर लिए जा सकते हैं।

किसानों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों के लिए योजनाओं का सीधा लाभ अब पांढुर्णा से प्राप्त हो रहा है।

साथ ही, जिले को अपनी स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव भी मिला है —
जामसवली हनुमान मंदिर, अर्धनारीश्वर मंदिर , गोटमार मेला-उत्सव, और पांढुर्णा के प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को अब राज्यस्तर पर पहचान मिल रही है।

🔹 क्या खोया — अधूरा प्रशासन, अधूरी व्यवस्था

🏛 प्रमुख विभागों का संचालन अब भी छिंदवाड़ा से

जिला घोषित होने के बावजूद अधिकांश प्रमुख विभागों के कार्य आज भी छिंदवाड़ा से ही संचालित हो रहे हैं।

RTO (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) अब तक पांढुर्णा में स्थापित नहीं हुआ।
वाहन रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस, परमिट जैसे कार्यों के लिए नागरिकों को आज भी 120 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा जाना पड़ता है।

रेलवे विभाग और ओवरब्रिज निर्माण कार्य भी छिंदवाड़ा रेलवे डिवीजन के अधीन हैं।
नगर में प्रस्तावित रेलवे ओवरब्रिज वर्षों से कागज़ों में है, जबकि जाम और दुर्घटनाओं की समस्या जस की तस है।

लोक निर्माण विभाग (PWD), जल संसाधन, राजस्व, शिक्षा, कृषि, और बिजली विभाग जैसे महत्वपूर्ण दफ्तर अभी भी छिंदवाड़ा से संचालित हैं।
पांढुर्णा में केवल शाखाएँ या अस्थायी कार्यालय काम कर रहे हैं।

⏱ जनता को प्रशासनिक असुविधा

नागरिकों को ज़मीन रिकॉर्ड, वाहन टैक्स, भवन स्वीकृति, पासपोर्ट सत्यापन, ड्राइविंग लाइसेंस और कई अन्य कार्यों के लिए अभी भी छिंदवाड़ा की यात्रा करनी पड़ती है।

सरकारी कर्मचारियों को भी दोहरी प्रक्रिया झेलनी पड़ रही है — आदेश पांढुर्णा में बनते हैं, मंजूरी छिंदवाड़ा से आती है।

यह स्थिति “जिला बना, पर पूरी ताक़त नहीं मिली” जैसी महसूस होती है।

🔹 विकास कार्यों की स्थिति

सड़कें, पुल, अस्पताल और शिक्षा भवन निर्माणाधीन हैं, परंतु कार्य गति धीमी है।

रेलवे ओवरब्रिज, मंडी परिसर का विस्तार, और औद्योगिक क्षेत्र के विकास जैसी परियोजनाएँ अभी कागज़ों में हैं।

जिला मुख्यालय के लिए स्थायी भवनों का निर्माण भी प्रारंभिक चरण में है।

🔹 जनता की अपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की मांग

स्थानीय संगठनों और नेताओं की यह पुरानी मांग है कि
पांढुर्णा में स्वतंत्र RTO कार्यालय,
रेलवे समन्वय इकाई,
PWD मुख्यालय,
और सभी प्रमुख विभागों के जिला-स्तरीय नियंत्रण शीघ्र स्थापित किए जाएँ।

तभी जिला बनने का वास्तविक लाभ जनता को मिल पाएगा।

वर्तमान में जिला मुख्यालय के अधिकांश कार्य अस्थायी भवनों से संचालित हो रहे हैं, जिससे शासन-प्रणाली प्रभावित होती है।जिला मुख्यालय की मुख्य पहचान कलेक्टर कार्यालय कहा बनेगा ये भी अब विवादों के घेरे में है।

वृहद जलाशय की सबसे ज्यादा आवश्यकता, पेयजल और सिंचाई के लिए जरूरी है । जिससे जिले की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि क्षेत्र को गति मिले।

ओवरलोड डंपरों के कारण क्षेत्र की आंतरिक और बाहरी सड़के खस्ताहाल हो चुकी है, इन डंपरों पर कोई कार्यवाही नहीं होना भी शक के घेरे में है, शहर के मध्य से होके ये डंपर धडल्ले से बनगांव चेक पोस्ट आराम से पार करके महाराष्ट्र में प्रवेश करते है। इनपर किसकी कृपा दृष्टि है?

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का उन्नयन होके सिविल अस्पताल का दर्जा तो मिला किंतु सुविधाएं आज भी सिफर है। आए दिन अस्पताल की अव्यवस्थाओ की खबरें अखबारों के माध्यम से आती रहती है।

🔹 भविष्य की दिशा

पांढुर्णा का भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व मध्यप्रदेश में किसी भी पूर्ण जिले से कम नहीं है।
यह क्षेत्र संतरे की खेती, वन संपदा, धार्मिक स्थलों और व्यापारिक गतिविधियों के कारण पहले ही आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर है।
यदि राज्य सरकार अगले दो वर्षों में सभी विभागों को स्वतंत्र रूप से कार्यशील बना दे,
तो पांढुर्णा वास्तव में एक मॉडल जिला बन सकता है।

🟣 अंततः

> “नाम का जिला नहीं, काम का जिला बने — यही पांढुर्णा की जनता की असली उम्मीद है।”

जिला बनने के दो साल बाद जनता अब प्रतीक्षा में है कि
जब RTO, रेलवे, और अन्य विभाग वास्तव में यहाँ से काम करेंगे,
जब हर सरकारी सेवा यहीं उपलब्ध होगी —
तभी कहा जा सकेगा कि पांढुर्णा ने न केवल नया दर्जा पाया, बल्कि नई दिशा भी पाई।

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