कटनी में सरकारी जमीनों का काला कारोबार: भूमाफिया की लूट, किसानों की सिसकियां, शासन की चुप्पी!
खेती की हरी धरती अब कंक्रीट और घोटालों के दलदल में; जिले के ग्रामीण इलाकों में 3,500 से घटकर 2,800 हेक्टेयर बची कृषि भूमि, नगर निगम सीमा में महज 1,200 हेक्टेयर, राजनीतिक संरक्षण वाले माफिया टेंडरों से अरबों कमा रहे

कटनी, 4 अक्टूबर 2025 ( विशेष संवाददाता)। आजादी के दौर में कटनी जिले की उपजाई मिट्टी—चाहे ग्रामीण खेतों की लहरें हों या नगर निगम सीमा के आसपास के खलिहान—फसलों की लहरों से झूमती थी, किसानों के स्वर में खुशी की धुन गूंजती थी। लेकिन 78 बसंत बीतते-बीतते वही धरती कंक्रीट के जंगलों और भ्रष्टाचार के काले साये में सिसक रही है। एक ताजा सर्वे की मार्मिक तस्वीर बयां करती है कि 1947 में कटनी जिले के ग्रामीण इलाकों में खेती का रकबा करीब 3,500 हेक्टेयर था, जो 2025 तक महज 2,800 हेक्टेयर पर सिमट गया, जबकि नगर निगम सीमा के अंतर्गत शहर का हिस्सा 1,200 हेक्टेयर पर सिकुड़ गया। ये आंकड़े न केवल छोटे किसानों की बेबसी की दर्दभरी दास्तां हैं, बल्कि मध्य प्रदेश शासन की सरकारी जमीनों के कुप्रबंधन का भी आईना दिखाते हैं—ग्रामीण पंचायतों से लेकर शहरी विकास प्राधिकरण तक। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भूमाफिया—जो खुद राजनीति के ऊंचे पदों पर विराजमान हैं—टेंडर प्रक्रिया के बहाने चरपाटी दामों पर सरकारी संपदा हड़पकर अरबों का काला व्यापार चला रहे हैं। शासन इन्हें स्कूल, अस्पताल या किसानों के पुनर्वास के लिए इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन लापरवाही ने गरीबों को सड़क पर ला खड़ा किया। जनसंख्या के बोझ तले बेतरतीब निर्माण ने ग्रामीण खेतों और शहरी सीमाओं की जमीनें निगल लीं, जबकि सत्ता के गलियारों में सांठगांठ की आहटें गूंज रही हैं।
कृषि का कत्लेआम: हरी क्रांति से कंक्रीट क्रांति तक, सरकारी जमीनें माफिया के निशाने पर
कटनी—चूना पत्थर की खदानों और खेती के सुनहरे संगम का जिला—आज शहरीकरण व भूमि घोटालों की चपेट में तड़प रहा है। 1947 में जिले के 4,950 वर्ग किमी क्षेत्र में खेती का दबदबा था, जहां ग्रामीण इलाकों में गेहूं, चावल, चना व दालें लहलहातीं, सालाना 50,000 टन अनाज पैदा होता। लेकिन 2023-24 के सरकारी आंकड़े चेतावनी देते हैं: जिले का कुल फसल क्षेत्र 4,35,730 हेक्टेयर है, जिसमें ग्रामीण भागों का हिस्सा 2,800 हेक्टेयर और नगर निगम सीमा में मात्र 1,200 हेक्टेयर। कारण? कृषि भूमि का आवासीय-व्यावसायिक परिवर्तन, और सरकारी जमीनों का गैर-उपयोग—ग्रामीण पंचायत भूमि से लेकर शहरी प्लॉटिंग तक।
सर्वे उजागर करता है कि 2015-2025 के दहाई में ग्रामीण इलाकों में 700 हेक्टेयर और नगर निगम सीमा में 100 हेक्टेयर कृषि भूमि बिकी, 70 प्रतिशत रिहायसी मकानों के लिए। लेकिन सरकारी संपदा का काला खेल इससे कहीं गहरा है। मध्य प्रदेश में साहारा ग्रुप जैसे घोटालों में कटनी जिले की ग्रामीण व शहरी 310 एकड़ जमीन चुटकी भर में 98 करोड़ में बिकी, जबकि बाजार मूल्य 1,000 करोड़ से ऊपर। राजनीतिक छत्रछाया वाले भूमाफिया टेंडरों का दुरुपयोग कर रहे—ई-टेंडरिंग में डेटा फंसिंग व निम्नतम बोली में हेराफेरी से 80,000 करोड़ का काला कारोबार। कटनी के खनन बैरनों व हवाला नेटवर्क से जुड़े नेताओं ने ग्रामीण पंचायतों और नगर निगम की सरकारी जमीनों को निजी फायदे के लिए हथियाया। शासन इन्हें जनहित में लगा सकता था—ग्रामीण किसानों को वैकल्पिक खेत, शहरी गरीबों को आवास—लेकिन भ्रष्टाचार ने सब लील लिया। बुजुर्ग किसान श्यामलाल (नाम गोपनीय, ग्रामीण क्षेत्र से) की सिसकी: “हमारी जमीन गई, सरकारी खजाना भी माफिया की जेब में। अब मजदूरी ही रोजी।”
जनसंख्या का कहर: मकान उगे, किसान उजड़े; सरकारी जमीनें लुप्त हो रही
1947 में जिले की आबादी मात्र 20,000 थी (मुख्यतः ग्रामीण), 2011 तक 2,21,875 व 2025 तक 3,22,000 का अनुमान (जिसमें नगर निगम सीमा में 1,50,000 शहरी आबादी)। इस उछाल ने 15,000 से ज्यादा मकान जमा दिए, लेकिन 80 प्रतिशत अमीरों के लिए—ग्रामीण सीमाओं पर फैलते कॉलोनियों और शहरी प्लॉटिंग में। गरीब किसानों की 2,300 हेक्टेयर भूमि (60 प्रतिशत छोटे किसानों की, ज्यादातर ग्रामीण) आवासीय उपयोग में तब्दील, 500 परिवार भूमिहीन। सरकारी जमीनों पर डिजिटल रिकॉर्डों में फर्जीवाड़ा—ग्रामीण राजस्व रिकॉर्ड से लेकर नगर निगम के लैंड बैंक तक बड़े घोटाले। विधवा राधा बाई की फरियाद (नगर निगम सीमा से): “जमीन बिकी, योजनाओं में घर न मिला। माफिया सरकारी खजाना लूट रहे।”
भूमाफिया का साम्राज्य: राजनीतिक कवच, टेंडर जाल, अरबों का लालच
एक एकड़ कृषि भूमि 5-8लाख में बिकती (ग्रामीण में), परिवर्तन के बाद 7-10 करोड़(शहरी सीमा में)। सरकारी जमीनों में टेंडर घोटाले—साहारा केस में चरपाटी खरीद, बाजार मूल्य दबाया। ई-टेंडरिंग स्कैम में सॉफ्टवेयर फंसिंग से निजी कंपनियों को फायदा। कटनी के खनन-हवाला कांड में राजनीतिक कनेक्शन वालेनों ने ग्रामीण और शहरी दोनों सरकारी जमीनों का दुरुपयोग। मुनाफा 300-500 प्रतिशत, लेकिन किसान भूखे। शासन सही उपयोग कर सकता था—ग्रामीण पुनर्वास, शहरी विकास—लेकिन सांठगांठ ने बर्बाद कर दिया।
प्रशासन की पोल: भूमि राजस्व संहिता 1959 के तहत कलेक्टर की मंजूरी जरूरी, लेकिन 70 प्रतिशत बिना
तहसीलदार-राजस्व विभाग की लापरवाही (ग्रामीण में), पंचायतें चुप, UDA का मास्टर प्लान गुम (शहरी में)। डिजिटल रिकॉर्ड घोटाले से हालत पतली।
योजनाओं का ढोंग: वादे हवा-हवाई, सरकारी जमीनें माफिया के हवाले
आवास योजनाएं चलीं, लेकिन संरक्षण नदारद—ग्रामीण पंचायतों से लेकर नगर निगम तक। बिंदुवार:
PMAY-U: 13,000 घर (शहरी फोकस), लेकिन टेंडर अनियमितताएं।
मुख्यमंत्री आवास: प्लॉट वादा (ग्रामीण-शहरी), माफिया हड़पाई।
MPHIDB: सस्ते मकान, कम प्रीमियम—माफिया लाभ (शहरी सीमा में)।
अन्य: ATMA खेती बढ़ावा (ग्रामीण), लेकिन घोटाले रोक न पाए।
90 प्रतिशत किसानों का आरोप: लाभ अमीरों को। 20 प्रतिशत संरक्षण नियम तोड़ा।
गरीबों की चीख: लूट की आग में जलते किसान, न्याय की आस बाकी
किसान मजदूर बने, आय 65 प्रतिशत गिरी—ग्रामीण महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित। सरकारी घोटालों से बेबसी गहरी। लेकिन विरोध की लौ जल रही—अदालतों में लड़ाई। प्रशासन जागे: ग्रामीण-शहरी मास्टर प्लान लागू, माफिया पर शिकंजा, टेंडर जांच। सरकार दे: आजीविका, मुआवजा, सख्त कानून। वरना कटनी जिले की मिट्टी हमेशा दबेगी, गरीबों की सिसकियां अनसुनी रहेंगी।
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( सर्वे: मध्य प्रदेश कृषि विभाग एवं जिला कलेक्टर कार्यालय के आंकड़ों पर आधारित, जिसमें ग्रामीण पंचायत और नगर निगम सीमा के अलग-अलग आंकड़े शामिल। कॉपीराइट: उपयोग बिना अनुमति निषिद्ध।
















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