“बाप की जमीन” पर कब्जे का खेल, प्रशासन बना ‘मौन तपस्वी’
मैहर ब्यूरो चीफ
सुरेन्द्र कुमार शर्मा

मैहर तहसील में प्रशासन और भू-माफियाओं की ‘मिलीजुली सरकार’ का अनोखा नमूना देखने को मिला है। मामला एक आदिवासी महिला का है, जो अपने ही पिता की जमीन पर हक पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है, लेकिन सरकारी मशीनरी इतनी ‘व्यस्त’ है कि उसे सुनने का समय ही नहीं मिल पा रहा!
कहानी एक ‘दस्तावेजी न्याय’ की!
दस्तावेजों में साफ लिखा है कि जमीन महिला के पिता की थी और उनकी अकेली वारिस वही है। लेकिन भाईसाहब, जब मैहर में भू-माफिया और पटवारी एक ही टीम में खेलते हों, तो दस्तावेज की क्या बिसात! पटवारी जी ने ‘कलम घुमाई’, कागजों का ‘मेकओवर’ किया और देखते ही देखते जमीन किसी और की हो गई!
प्रशासन की “अद्भुत” तटस्थता
अब प्रशासन से जब पूछा जाए कि आदिवासी महिला को न्याय क्यों नहीं मिला, तो वहां से जवाब आता है—”देखते हैं, जांच करेंगे, विचार कर रहे हैं।” साहब, विचार कब पूरा होगा? या फिर जब तक विचार पूरा होगा, तब तक जमीन पर आलीशान बिल्डिंग खड़ी हो जाएगी? या भू कारोबारी किसी और को बेच देगा!
भू-माफियाओं का जलवा और प्रशासन की मजबूरी
मैहर का राजस्व विभाग इतनी ‘अकड़’ में है कि महिला की पहले की गई शिकायतें भी ठंडे बस्ते में डाल दी गईं। नामांतरण भी हो गया और गरीब आदिवासी महिला की आवाज को सत्ता की ‘भारी-भरकम कुर्सियों’ ने कुचल दिया। आखिर, आम आदमी की चीख से ज्यादा ताकत तो रसूखदारों की ‘फुसफुसाहट’ में होती है!
आखिर कब जागेगा प्रशासन?
अब देखना यह होगा कि प्रशासन अपनी ‘गहरी नींद’ से जागता है या फिर गरीब आदिवासी महिला का न्याय भी ‘विकास की तेज रफ्तार’ में कहीं गुम हो जाता है। सवाल बड़ा है—क्या कानून सिर्फ रसूखदारों की रक्षा के लिए ही लिखा गया है?
मैहर ब्यूरो चीफ
सुरेन्द्र कुमार शर्मा
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